Bisat Ka Aakhri Mohra in Hindi Thriller by Aarti Garval books and stories PDF | बिसात का आखिरी मोहरा - 10

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बिसात का आखिरी मोहरा - 10

विक्टोरिया पुस्तकालय के ऊपर से गिरती चट्टानों और मलबे के धमाकों से पूरी जमीन हिल रही थी। छतों से धूल और पत्थरों की बारिश हो रही थी। लोहे की भारी सलाख से बंद हो चुके गुप्त दरवाजे को देखकर सबके चेहरों पर मौत का खौफ साफ छलक रहा था।

​"हम यहाँ जिंदा दफन हो जाएंगे!" अद्वैत पागलों की तरह दरवाजे को पीटने लगा।

​"हौसला मत हारो!" समीर ने चिल्लाते हुए चारों तरफ टॉर्च घुमाई। "हर पुरानी ब्रिटिश इमारत में एक इमरजेंसी एग्जिट होता है। शर्मा जी, इस तहखाने की हवा कहाँ से आ रही है?"

​केयरटेकर शर्मा जी ने हांफते हुए अपनी कांपती उंगली से सीढ़ियों के पीछे बनी एक छोटी सी हवादार जाली की तरफ इशारा किया। "साहब... वह रास्ता सीधा पहाड़ के बाहरी हिस्से में खुलता है!"

​समीर ने बिना वक्त गंवाए अपनी भारी पिस्तौल से जाली के पुराने, जंग लगे ताले पर दो गोलियां दागीं। ताला टूट कर गिर पड़ा।

​"सब लोग एक-एक करके बाहर निकलो! जल्दी!" समीर ने आदेश दिया।

​अद्वैत, तारा, शर्मा जी और गिरफ्तार डॉक्टर मीरा को धक्का देते हुए समीर ने उस तंग रास्ते से बाहर निकाला। सबसे अंत में मूक रसोइया आर्यन और अंधा वीरेंद्र सिंह बाहर आए।

​जैसे ही वे सब उस अंधेरी गुफा से बाहर पहाड़ों की खुली, बर्फीली हवा में पहुंचे, पीछे से एक जोरदार धमाका हुआ। विक्टोरिया पुस्तकालय की ऐतिहासिक इमारत और वह गुप्त तहखाना हमेशा-हमेशा के लिए मलबे के ढेर के नीचे जमींदोज हो गए।

​
​सुबह की धुंध अब छट चुकी थी। ढलान पर बर्फ की एक पतली परत जमनी शुरू हो गई थी। चारों तरफ शांति छा गई थी, लेकिन समीर का मन अभी भी एक आखिरी उलझन से जूझ रहा था।

​वे मुड़े और उन्होंने आर्यन और वीरेंद्र सिंह की तरफ देखा।

​"दीवान वीरेंद्र सिंह... अब सब खत्म हो चुका है। डॉक्टर मीरा और प्रोफेसर अय्यर को उनके पापों की सजा मिल चुकी है। लेकिन मुझे एक बात का जवाब चाहिए," समीर ने कहा।

"शतरंज की उस बिसात पर 'काली रानी' का पहला वार किसने किया था? दीवान रघुवीर सिंह के गले पर वह पहला जख्म किसने लगाया था?"

​अंधे वीरेंद्र सिंह के होठों पर एक संतोषजनक मुस्कान आ गई। उन्होंने आसमान की तरफ चेहरा किया।

​"इन्स्पेक्टर... काली रानी कोई इंसान नहीं थी। 'काली रानी' उस न्याय की प्रतीक थी जो २५ सालों से इस पुस्तकालय में भटक रहा था," वीरेंद्र सिंह ने ठंडी सांस ली। "उस रात, जब दीवान रघुवीर उस तिजोरी को खोलकर खजाना निकालने ही वाले थे, तो तिजोरी के भीतर बना २५ साल पुराना स्प्रिंग मैकेनिज्म ट्रिगर हो गया। वह 'काली रानी' का लोहे का मोहरा किसी तीर की तरह तिजोरी के भीतर से छूटा और सीधे दीवान के गले पर जा लगा।"

​समीर की आंखें फटी की फटी रह गईं। "तो... तो दीवान साहब की मौत किसी कातिल के वार से नहीं, बल्कि उस तिजोरी में सेट किए गए पुराने मैकेनिज्म से हुई थी?"

​"हाँ," वीरेंद्र सिंह ने कहा। "मेरे पिता ने वह तिजोरी बनाई ही ऐसी थी कि अगर कोई गद्दार उसे जबरदस्ती खोलने की कोशिश करे, तो वह मोहरा खुद-ब-खुद मौत बनकर निकलेगा। दीवान ने जैसे ही लालच में तिजोरी छुई, नियति ने अपना काम कर दिया। उसके बाद तो सिर्फ इंसानी लालच, डर और अपराधबोध ने बाकी सब काम कर दिया।"

​समीर सन्न खड़े रह गए। जिस रहस्य को वे किसी इंसान की चाल समझ रहे थे, वह दरअसल २५ साल पुराने पाप का कुदरती इंसाफ था। आत्मा का कोई साया नहीं था, बल्कि उन गुनहगारों का अपना डर ही उनका सबसे बड़ा कातिल बन गया था।
​
​दूर सड़क से पुलिस की गाड़ियों के सायरन की आवाजें गूंजने लगीं। लैंडस्लाइड का रास्ता साफ करके बैकअप टीम आखिरकार रुद्रपुर की इस पहाड़ी तक पहुंच चुकी थी।

​डॉक्टर मीरा को पुलिस ने अपनी कस्टडी में ले लिया। अद्वैत, तारा और शर्मा जी ने राहत की सांस ली, लेकिन उनकी आंखों में इस ऐतिहासिक पुस्तकालय और दीवान परिवार के दुखद अंत का सन्नाटा था।

​आर्यन ने अपनी डायरी समीर को सौंप दी और अपने अंधे चाचा वीरेंद्र सिंह का हाथ पकड़कर पहाड़ों के उस शांत रास्ते पर आगे बढ़ गया—अपने पिता के नाम और सम्मान को वापस पाकर।

​समीर ने हाथ में रखी उस आधी जली हुई 'काली रानी' के मोहरे को देखा और उसे पहाड़ की गहराई में फेंक दिया।

​बर्फबारी शुरू हो चुकी थी। रुद्रपुर के पहाड़ों ने उस २५ साल पुराने खूनी रहस्य को अपने भीतर हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर लिया था।