Pole Star - Part 23 in Hindi Love Stories by Anamika books and stories PDF | ध्रुव की तारा - भाग 23

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ध्रुव की तारा - भाग 23

ध्रुव की तारा
भाग - २३
लेखिका "अनामिका"
​रात भर तारा की आँखों में नींद की एक बूँद तक नहीं थी। जिस इंसान को वह बचपन से चाहती आई थी, कल रात उसने अपने दिल की बात कह दी थी। यही अहसास उसके दिल को इतनी खुशी दे रहा था कि सुबह सूरज निकलने से पहले ही उसकी आँख खुल गई।
​वह झटपट उठकर तैयार हुई और सीधा अपनी खिड़की के पास पहुँची। सामने ध्रुव के कमरे की खिड़की बंद थी। तारा गालों पर हाथ रखे सोचने लगी—'क्या वह सो रहा होगा? कल रात के बारे में सोचकर क्या वह भी मेरी तरह बेचैन है?'
​उधर ध्रुव का भी यही हाल था। पूरी रात करवटें बदलते बीती थी। सुबह होते ही उसने सबसे अच्छी शर्ट निकाली, खुद को शीशे में सँवारा और दिल में धक-धक लिए तारा के घर की तरफ कदम बढ़ा दिए। वह बस यह देखने के लिए बेताब था कि तारा उठी है या नहीं।
​तारा खिड़की से झांक ही रही थी कि अचानक उसके फोन की स्क्रीन जगमगा उठी। ध्रुव का मैसेज था—"दरवाज़े पर खड़ा हूँ, बाहर आओ।"
​मैसेज पढ़ते ही तारा के हाथ-पाँव फूल गए। उसने जल्दी से शीशे में अपना चेहरा देखा, बाल ठीक किए और दबे पाँव जाकर मुख्य दरवाज़ा खोल दिया। सामने ध्रुव खड़ा था—चेहरे पर हल्की सी झिझक और आँखों में ढेरों जज्बात लिए। तारा ने बिना कोई आवाज़ किए चुपके से उसे अंदर अपने कमरे में बुला लिया।
​वैसे तो बचपन से ध्रुव का उसके कमरे में आना-जाना आम बात थी, पर आज कमरा बंद होते ही एक अजीब सी खामोशी छा गई। कल तक जो बेस्ट फ्रेंड्स थे, आज उनके बीच एक नया, खूबसूरत रिश्ता सांस ले रहा था।
​"तुम... इतनी सुबह-सुबह यहाँ?" तारा ने झेंपते हुए चुप्पी तोड़ी।
​ध्रुव मुस्कुराया, "क्यों? पहले नहीं आता था क्या?"
​"तब की बात अलग थी ध्रुव..." तारा ने नज़रें झुकाकर कहा।
​ध्रुव धीरे से उसके पास बैठा और संकोच करते हुए तारा का हाथ अपने हाथ में ले लिया। दोनों के दिल की धड़कनें एक-दूसरे को सुनाई दे रही थीं। हाथ छूते ही तारा के चेहरे पर लाली दौड़ गई और ध्रुव भी थोड़ा घबरा गया।
​तभी अचानक कमरे का दरवाज़ा खुला और तारा की मम्मी सुधा अंदर दाखिल हुईं, "तारा उठो..."
​सुधा की नज़र जैसे ही बेड पर पास-पास बैठे ध्रुव और तारा पर पड़ी, उनके शब्द वहीं थम गए। तारा ने तुरंत अपना हाथ पीछे खींच लिया और ध्रुव हड़बड़ाकर खड़ा हो गया।
​"ध्रुव बेटा... तुम इतनी सुबह यहाँ?" सुधा ने आश्चर्य से पूछा।
​ध्रुव ने जल्दी से बात संभालते हुए कहा, "अरे आंटी... वो... हम लोग वापस कॉलेज जा रहे हैं न, तो मैं बस तारा से टिकट के समय के बारे में पूछने आया था कि किस टाइम की बुकिंग सही रहेगी।"
​सुधा ने दोनों के घबराए चेहरे देखे। उनके होठों पर एक समझदार मुस्कान आई, पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। "अच्छा ठीक है, बातें बाद में कर लेना... पहले नीचे आकर नाश्ता कर लो," कहकर सुधा वापस चली गईं। सुधा आंटी के जाते ही ध्रुव ने राहत की सांस ली और मुस्कुराते हुए चुपके से वहाँ से निकल गया, जबकि तारा अपना लाल पड़ता चेहरा छुपाने में लग गई।
​नाश्ते के बाद कमरे में तारा का सूटकेस खुला पड़ा था और वह सामान व्यवस्थित कर रही थी, तभी मम्मी 'सुधा' हाथों में डब्बे और दवाइयों के कुछ पैकेट लेकर अंदर आईं।
​"तारा, ये मेथी के लड्डू और नमकीन डब्बे में बंद करके रख दिए हैं," सुधा ने सूटकेस में जगह बनाते हुए कहा, "और ध्यान से सुनो, ये हरा वाला डब्बा तुम्हारे लिए है और ये लाल वाला ध्रुव के लिए। उसे मीठा बहुत पसंद है न, तो उसके लिए उसकी पसंद का सामान अलग से रख दिया है। और हाँ, ये दवाइयों का पैकेट... इसमें से बुखार वाली गोलियाँ ध्रुव को दे देना, मौसम बदलते ही उसे जुकाम हो जाता है।"
​तारा मम्मी का यह दुलार देखकर मुस्कुरा दी। वह समझ रही थी कि भले ही माँ कुछ कह न रही हों, पर ध्रुव की परवाह उनके दिल में भी बेटी जितनी ही है।
​उधर ध्रुव के घर में भी ठीक ऐसा ही माहौल था। ध्रुव की माँ 'सुमन' उसके सूटकेस पर जबरदस्ती दबाव बनाकर ज़िप बंद करने की कोशिश कर रही थीं।
​"मम्मी, इतना सारा सामान? मैं हॉस्टल जा रहा हूँ, किसी जंग पर नहीं!" ध्रुव ने हँसते हुए कहा।
​सुमन ने उसे घूरते हुए डांटा, "चुप करो! इसमें आधा सामान तारा का है। तुम्हें तो अपनी सुध रहती नहीं, तारा बेचारी पढ़ाई के चक्कर में खाने का ध्यान नहीं रखती। ये मखाने और ड्राई फ्रूट्स के डब्बे तारा को दे देना और कहना कि रोज़ सुबह खाए। और सुन, ट्रेन में स्टेशन पर उतरते या चढ़ते वक्त तारा का ध्यान रखना, भीड़ बहुत होती है। और इस बार तो तुम्हारा फाइनल ईयर है, तो पढ़ाई के साथ-साथ तारा का भी ख्याल रखना।"
​ध्रुव ने अपनी माँ की बात सुनकर मन ही मन मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। माताओं का यह निस्वार्थ प्यार और दोनों के लिए बराबरी की फ़िक्र देखकर यह साफ़ था कि उनके नए रिश्ते को बिना कहे ही अपनों का आशीर्वाद मिल चुका था।
​सामान पैक होने के बाद दोनों अपने सूटकेस उठाकर बाहर निकले। दोनों माताओं सुधा और सुमन ने भरी आँखों से अपने बच्चों को गले लगाया और ढेरों हिदायतें देकर अलविदा कहा।
​ट्रेन स्टेशन पर पहुँचकर ध्रुव ने फुर्ती से दोनों के सूटकेस संभाले और प्लेटफ़ॉर्म की भीड़ को चीरते हुए तारा को सुरक्षित अपने पीछे-पीछे चलने का रास्ता दिया। ट्रेन की बोगी में अपनी सीटों पर बैठते ही दोनों ने राहत की सांस ली।
​खिड़की से बाहर देखते हुए ट्रेन ने धीरे से रेंगना शुरू किया और साथ ही ध्रुव ने तारा का हाथ हौसले से थाम लिया—अपने फाइनल ईयर की चुनौतियों और प्यार के इस नए एहसास के साथ हॉस्टल वापसी का यह सफर उनके लिए बेहद खास होने वाला था।
ट्रेन की पटरियों के साथ-साथ उनके सपनों ने भी तेज़ रफ्तार पकड़ ली थी, जहाँ अब इस नए सफर में तारा के सेकंड ईयर और ध्रुव के फाइनल ईयर की चुनौतियाँ उनका इंतज़ार कर रही थीं।
तेईसवाँ भाग समाप्त, कहानी जारी है....