Is it a crime to write the truth? in Hindi Spiritual Stories by Std Maurya books and stories PDF | सच लिखना क्या जुर्म है?

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सच लिखना क्या जुर्म है?

सच लिखना क्या जुर्म है?
​आज से कुछ दिन पहले, करीब 29 सितंबर 2026 को मैंने अपने कॉलेज के बारे में एक लेख लिखकर प्रकाशित करवाया था। जब वह लेख समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ और मैंने उसे अपने इंस्टाग्राम पेज पर साझा किया, तो वह हमारे कॉलेज के छात्रों तक भी पहुँच गया और परिसर में इस बात की चर्चा होने लगी कि यह खबर किसने प्रकाशित करवाई है।
​अधिकांश विद्यार्थियों ने मेरा समर्थन करते हुए कहा— "भाई, तुमने जो भी लिखा है, वह पूर्णतः सत्य है। इसमें कोई झूठी बात नहीं है।" किंतु हमारे कॉलेज के कुछ गिने-चुने छात्र केवल अपने अंक (Marks) बढ़ाने के उद्देश्य से कॉलेज प्रशासन की चापलूसी कर रहे थे और मुझे गलत ठहरा रहे थे।
​उन्हीं में से किसी छात्र ने न्यूज़ में छपे उस लेख को प्राचार्य (प्रिंसिपल) सर तक पहुँचा दिया। उसे देखने के बाद, अगले दिन प्राचार्य सर ने जूलॉजी विभाग के प्रोफेसर के माध्यम से मुझे अपने कार्यालय में बुलवाया।
​जब मैं कार्यालय पहुँचा, तो वहाँ द्वितीय वर्ष (2nd Year) की कुछ छात्राएं भी उपस्थित थीं और जूलॉजी के सर भी कुर्सी पर बैठे थे। कुछ क्षण खड़े रहने के बाद प्राचार्य सर ने मुझे अपने समीप बुलाया और कहा— "समाचार प्रकाशित करवाकर तुम जैसे गुंडे-राजनेता इस कॉलेज में 10–15 होंगे।"
​उन्होंने आगे कहा— "तुम कॉलेज की छवि क्यों खराब कर रहे हो? तुम पर मैं मानहानि का केस करूँगा।" इसके बाद उन्होंने जूलॉजी वाले सर से पूछा— "सर, इस लड़के के ऊपर क्या करें?"
​'गुंडा' शब्द सुनते ही मैंने शालीनता से किंतु सीधे शब्दों में कहा— "सर, मैं कोई नेता, राजनेता या गुंडा नहीं हूँ। मैं इस कॉलेज का एक छात्र हूँ।"
​प्राचार्य बोले— "तुम ज़्यादा मत बताओ। यह बताओ, तुम्हारे पीछे कौन है? किसके कहने पर यह सब किया है? और इसमें क्या-क्या लिखवाए हो? 6–7 महीने में कोई कॉलेज बनता है क्या?" फिर उदाहरण देते हुए कहने लगे कि अमुक स्थान पर जाकर देख लो, दो साल कॉलेज को बनाने में लगा और वह भी अभी तक पूरा नहीं हुआ है।
​मैंने तुरंत उत्तर दिया— "सर, मेरा उद्देश्य किसी को बदनाम करना नहीं है, बल्कि मैं चाहता हूँ कि मेरे क्षेत्र के कॉलेज का नाम रोशन हो।"
​प्रिंसिपल बोले— "क्या तुम्हारे पेपर में प्रकाशित करने से कॉलेज का सुधार हो जाएगा? बोलो तो मैं जो कॉलेज बन रहा है, उसका निर्माण कार्य ही रुकवा देता हूँ।"
​उनके इस प्रश्न का मैंने कोई उत्तर नहीं दिया। मैंने सोचा कि वे मुझे अज्ञानी समझ रहे हैं, जबकि उन्हें नहीं पता था कि प्रिंसिपल बिल्डिंग का निर्माण कार्य नहीं रुकवा सकते।
​इसके बाद प्राचार्य बोले कि तुम लिखते हो कि पुस्तकालय में पुस्तकें नहीं हैं।
​मैंने तुरंत स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा— "सर, मैंने ऐसा कुछ नहीं लिखवाया है। आप चाहें तो न्यूज़ में देख सकते हैं। उसमें साफ़-साफ़ लिखा गया है कि पुस्तकालय में पुस्तकें तो बहुत हैं, किंतु पुस्तकालय में नई पुस्तकें नहीं आई हैं। जितनी भी पुस्तकें अभी पुस्तकालय में हैं, वे सभी पुरानी हैं। हमने केवल नए सिलेबस (पाठ्यक्रम) की पुस्तकें रखने की मांग की है।"
​फिर वे यह भी बोलने लगे कि तुम प्रैक्टिकल के लिए लिखे हो, बताओ कहाँ जगह दिख रही है जहाँ तुम्हारा प्रैक्टिकल करा सकूँ? बताओ!
​इसके बाद उन्होंने जूलॉजी वाले सर से कहा— "इसे ले जाओ और 4 बजे तक अकेले बैठाकर प्रैक्टिकल कराओ।"
​इतना ही नहीं, मुझे "बेशर्म", "गुंडे" और "राजनेता" जैसे शब्दों से संबोधित किया गया। फिर भी मैंने मर्यादा में रहकर उन्हें 'सॉरी' बोला, किंतु बार-बार मुझे मानहानि और टी.सी. (Transfer Certificate) की कार्रवाई करने की धमकियाँ दी जाती रहीं। इसके साथ ही मुझसे पूछा जा रहा था कि इसमें किसका-किसका हाथ है। मैंने स्पष्ट मना कर दिया कि किसी का हाथ नहीं है, क्योंकि मैं स्वयं लिखकर प्रकाशित करवाता हूँ।
​मेरे एक साथी से भी मेरे बारे में जानकारी पूछी गई थी, किंतु उसने भी मेरे बारे में कोई गलत जानकारी नहीं दी।
​दूसरे दिन भी मुझे और मेरे साथी को जूलॉजी वाले सर अपने ऑफिस में बुलाते हैं और बोलते हैं— "बताओ, तुम्हारे साथ क्या करें? तुम लोग देख ही रहे हो, जगह नहीं है। तुम अपने कॉलेज की छवि खराब कर रहे हो। कोई सुनेगा तो बोलेगा कि कॉलेज में कुछ नहीं है।"
​हमने कहा— "सर, मैंने कुछ भी गलत नहीं बोला है।"
​जब मेरे दोस्त ने बताया कि मैं कहानी और कविताएँ भी लिखता हूँ, तो वे बोलने लगे कि प्रतियोगिता में भाग लो, इनाम मिलेगा। मैंने इस बात का भी कोई जवाब नहीं दिया।
​मेरी बात आज भी वही है—हमारी कक्षाएं आज भी पूरी तरह से गंदी हैं। दीवारों पर काले-काले धब्बे बने हैं और छत से पानी टपकता है। कक्षा में हर तरफ धूल जमी रहती है, मानो हफ्तों में एक बार झाड़ू-पोंछा लगता हो।
​पेयजल स्थल के पास गुटखे के निशान बने हुए हैं, सफाई नाम की कोई चीज नहीं है। इतना ही नहीं, वॉशरूम के पानी में छोटे-छोटे कीड़े तैर रहे हैं। आप स्वयं सोच सकते हैं कि जब छात्र कॉलेज में यह सब देखेंगे, तो उनमें साफ-सफाई की आदत और संस्कार कैसे विकसित होंगे? क्योंकि कॉलेज से ही सही सीख मिलती है।
​मुझे बस इतना कहना है कि जिस समय प्रिंसिपल ने मुझे गुंडा और राजनेता कहकर दबाने की कोशिश की, यदि उसी समय वे परिसर की साफ-सफाई और इन समस्याओं पर ध्यान दे देते, तो आज मुझे इस विषय पर पुनः लिखने की आवश्यकता ही न पड़ती।
​मैं तो केवल तीन बुनियादी चीजों की मांग कर रहा हूँ:
​पुस्तकालय में नए सिलेबस की पुस्तकें रखी जाएँ।
​कॉलेज परिसर और कक्षाओं की साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाए।
​प्रैक्टिकल केवल कागजों पर न होकर वास्तव में कराए जाएँ और प्रैक्टिकल कराने का उचित इंतजाम किया जाए।
​मेरा मकसद कॉलेज को बदनाम करना नहीं, मैं चाहता हूँ कि मेरे क्षेत्र के कॉलेज का नाम हो और यहाँ पढ़ने वाले विद्यार्थियों को बेहतर सुविधाएँ मिलें।
​अगर अपने ही कॉलेज की कमियों को उजागर करना गलत है, तो फिर सुधार की शुरुआत कैसे होगी?
​
​— एसटीडी मौर्य
(कटनी, मध्य प्रदेश)