उपनिषद in Hindi Spiritual Stories by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) books and stories PDF | पाशुपतोपनिषद

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पाशुपतोपनिषद

पाशुपतोपनिषद--यह उपनिषद अथर्ववेद से सम्बद्ध माना जाता है।यह मुख्यतः भगवान शिव के पाशुपत स्वरूप, शिव-तत्त्व और साधना से संबंधित है।पाशुपतब्रह्मोपनिषद् में ४६ मंत्र/श्लोक क्रमांकित हैं, और इसके बाद शान्तिपाठ तथा उपनिषद्-समाप्ति आती है।॥ १ ॥मूल पाठ—हंसात्ममालिकावर्णब्रह्मकालप्रचोदिता ।परमात्मा पुमानिति ब्रह्मसंपत्तिकारिणी ॥ १॥ हिन्दी अर्थ—हंसस्वरूप आत्मा की माला के रूप में जो वर्णमयी शक्ति है, वह ब्रह्म और काल को प्रेरित करने वाली है। वही साधक को यह बोध कराती है कि परमात्मा ही पुरुष है और यही ज्ञान ब्रह्म की प्राप्ति कराने वाला है।॥ २ ॥मूल पाठ—अध्यात्मब्रह्मकल्पस्याकृतिः कीदृशी कथा ।ब्रह्मज्ञानप्रभासन्ध्याकालो गच्छति धीमताम् ।हंसाख्यो देवमात्माख्यमात्मतत्त्वप्रजा कथम् ॥ २॥ हिन्दी अर्थ—अध्यात्म-ब्रह्म की वास्तविक आकृति और उसका स्वरूप कैसा है? विवेकशील मनुष्यों के लिए ब्रह्मज्ञान का प्रकाश संध्याकाल के समान अज्ञान का अन्धकार दूर कर देता है। ‘हंस’ नाम से प्रसिद्ध आत्मतत्त्व को किस प्रकार जाना जाए? यही इसका विचार है।॥ ३ ॥मूल पाठ—अन्तःप्रणवनादाख्यो हंसः प्रत्ययबोधकः ।अन्तर्गतप्रमागूढं ज्ञाननालं विराजितम् ॥ ३॥ हिन्दी अर्थ—अन्तःकरण में प्रणव अर्थात् ॐकार के नाद के रूप में जो हंस है, वह आत्मज्ञान का बोध कराने वाला है। उसके भीतर छिपा हुआ ज्ञान का सूक्ष्म मार्ग प्रकाशित रहता है।॥ ४ ॥मूल पाठ—शिवशक्त्यात्मकं रूपं चिन्मयानन्दवेदितम् ।नादबिन्दुकला त्रीणि नेत्रं विश्वविचेष्टितम् ॥ ४॥ हिन्दी अर्थ—उसका स्वरूप शिव और शक्ति से युक्त है और चैतन्यमय आनन्द के रूप में जाना जाता है। नाद, बिन्दु और कला—ये तीन उसके प्रतीक हैं; उसका नेत्र सम्पूर्ण विश्व की गतिविधियों को प्रकाशित करने वाला है।॥ ५ ॥मूल पाठ—त्रियङ्गानि शिखा त्रीणि द्वित्राणां संख्यमाकृतिः ।अन्तर्गूढप्रमा हंसः प्रमाणान्निर्गतं बहिः ॥ ५॥ हिन्दी अर्थ—हंस के स्वरूप में तीन अंग और तीन शिखाएँ कही गई हैं। उसके स्वरूप में संख्या और रचना का गूढ़ संकेत है। भीतर छिपा हुआ ज्ञानस्वरूप हंस ही प्रमाण के द्वारा बाहर प्रकाशित होता है।॥ ६ ॥मूल पाठ—ब्रह्मसूत्रपदं ज्ञेयं ब्राह्मं विध्युक्तलक्षणम् ।हंसार्कप्रणवध्यानमित्युक्तो ज्ञानसागरे ॥ ६।।हिन्दी अर्थ—ब्रह्मसूत्र के पद को जानना चाहिए, जिसका लक्षण वेद-विधि द्वारा बताया गया है। हंस, सूर्य और प्रणव—इनके ध्यान को ज्ञान के समुद्र में प्रवेश कराने वाली साधना कहा गया है।॥ ७ ॥मूल पाठ—एतद्विज्ञानमत्रेण ज्ञानसागरपारगः स्वतः शिवः पशुपतिः साक्षी सर्वस्य सर्वदा ॥ ७॥ हिन्दी अर्थ—इस ज्ञान को जान लेने मात्र से साधक ज्ञान-सागर के पार पहुँच जाता है। स्वरूपतः शिव ही पशुपति हैं और वे सदा सबके साक्षी हैं।यहाँ “पशुपति” का अर्थ समस्त जीवों के अधिपति तथा उनके अन्तर्यामी परमात्मा के रूप में समझना चाहिए।॥ ८ ॥मूल पाठ—सर्वेषां तु मनस्तेन प्रेरितं नियमेन तु ।विषये गच्छति प्राणश्चेष्टते वाग्वदत्यपि ॥ ८॥ हिन्दी अर्थ—सब प्राणियों का मन उसी परमात्मा द्वारा प्रेरित होकर अपने-अपने विषयों की ओर जाता है। प्राण उसी की प्रेरणा से क्रिया करता है और वाणी बोलती है।॥ ९ ॥मूल पाठ—चक्षुः पश्यति रूपाणि श्रोत्रं सर्वं शृणोत्यपि ।अन्यानि कानि सर्वाणि तेनैव प्रेरितानि तु ॥ ९॥ हिन्दी अर्थ—नेत्र उसी परम सत्ता की प्रेरणा से रूपों को देखते हैं और कान सभी शब्दों को सुनते हैं। इसी प्रकार अन्य सभी इन्द्रियाँ भी उसी परमात्मा की प्रेरणा से अपने-अपने कार्य करती हैं।॥ १० ॥मूल पाठ—स्वं स्वं विषयमुद्दिश्य प्रवर्तन्ते निरन्तरम् ।प्रवर्तकत्वं चाप्यस्य मायया न स्वभावतः ॥ १०॥ हिन्दी अर्थ—सभी इन्द्रियाँ निरन्तर अपने-अपने विषयों की ओर प्रवृत्त होती रहती हैं। परन्तु उनकी प्रवृत्ति का कारण परमात्मा का अपना कोई सांसारिक स्वभाव नहीं है; माया के माध्यम से ही वह प्रवर्तक के रूप में दिखाई देता है।एक महत्वपूर्ण बात--इस उपनिषद् का मूल दर्शन यहाँ से बहुत स्पष्ट होने लगता है—शिव/पशुपति को समस्त मन, प्राण और इन्द्रियों के अन्तर्यामी साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। आगे के मंत्रों में इसी विचार से मन, इन्द्रिय, माया, आत्मा, अद्वैत और ब्रह्मज्ञान की चर्चा विकसित होती है।॥ ११ ॥मूल पाठ—श्रोत्रमात्मनि चाध्यस्तं स्वयं पशुपतिः पुमान् ।अनुप्रविश्य श्रोत्रस्य ददाति श्रोत्रतां शिवः ॥ ११॥हिन्दी अर्थ—श्रवणेन्द्रिय भी आत्मा में ही अध्यारोपित है। स्वयं भगवान् पशुपति शिव उसमें प्रवेश करके उसे सुनने की शक्ति प्रदान करते हैं। अर्थात् कान केवल बाहरी साधन है; वास्तविक श्रवण-शक्ति परमात्मा से प्राप्त होती है।॥ १२ ॥मूल पाठ—मनः स्वात्मनि चाध्यस्तं प्रविश्य परमेश्वरः ।मनस्त्वं तस्य सत्त्वस्थो ददाति नियमेन तु ॥ १२॥हिन्दी अर्थ—मन भी आत्मा पर ही अध्यारोपित है। परमेश्वर उसमें प्रवेश करके उसे मन के रूप में कार्य करने की शक्ति प्रदान करते हैं। इस प्रकार मन की चेतन क्रियाशीलता भी परमेश्वर के अधीन है।॥ १३ ॥मूल पाठ—स एव विदितादन्यस्तथैवाविदितादपि ।अन्येषामिन्द्रियाणां तु कल्पितानामपीश्वरः ॥ १३॥हिन्दी अर्थ—वह परमात्मा ज्ञात वस्तु से भी परे है और अज्ञात से भी परे है। कल्पित अथवा उपाधियों से युक्त अन्य सभी इन्द्रियों का भी वही ईश्वर और नियन्ता है।यहाँ उपनिषद् यह संकेत करता है कि परमात्मा किसी एक ज्ञेय वस्तु तक सीमित नहीं है।॥ १४ ॥मूल पाठ—तत्तद्रूपमनु प्राप्य ददाति नियमेन तु ।ततश्चक्षुश्च वाक्चैव मनश्चान्यानि खानि च ॥ १४॥हिन्दी अर्थ—परमेश्वर प्रत्येक इन्द्रिय के अनुरूप उसका-उसका स्वरूप और कार्य-शक्ति प्रदान करते हैं। इसलिए नेत्र, वाणी, मन तथा अन्य सभी इन्द्रियाँ उसी परम सत्ता की व्यवस्था के अनुसार अपने कार्य करती हैं।॥ १५ ॥मूल पाठ—न गच्छन्ति स्वयंज्योतिःस्वभावे परमात्मनि ।अकर्तृविषयप्रत्यक्प्रकाशं स्वात्मनैव तु ॥ १५॥हिन्दी अर्थ—परमात्मा स्वयंप्रकाशस्वरूप हैं। इन्द्रियाँ स्वयं उस परमात्मा तक नहीं पहुँच सकतीं। वह अन्तरात्मा के रूप में स्वयं प्रकाशित है और उसी के प्रकाश से समस्त विषयों का ज्ञान सम्भव होता है।भाव:जैसे सूर्य को देखने के लिए दीपक की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही परमात्मा स्वयं प्रकाशस्वरूप है।॥ १६ ॥मूल पाठ—विना तर्कप्रमाणाभ्यां ब्रह्म यो वेद वेद सः ।प्रत्यगात्मा परंज्योतिर्माया सा तु महत्तमः ॥ १६॥हिन्दी अर्थ—जो पुरुष तर्क और प्रमाण के द्वारा ब्रह्म को जानता है, वही वास्तव में ब्रह्म को जानता है। प्रत्यगात्मा ही परम ज्योति है। उसके सामने माया महान् आवरण के समान प्रतीत होती है।॥ १७ ॥मूल पाठ—तथा सति कथं मायासंभवः प्रत्यगात्मनि ।तस्मात्तर्कप्रमाणाभ्यां स्वानुभूत्या च चिद्घने ॥ १७॥हिन्दी अर्थ—यदि प्रत्यगात्मा स्वयं परम ज्योति और चैतन्यस्वरूप है, तो उस आत्मा में माया की वास्तविक उत्पत्ति कैसे हो सकती है? इसलिए तर्क, प्रमाण और अपने प्रत्यक्ष आत्मानुभव से उस चैतन्यघन आत्मा का विचार करना चाहिए।॥ १८ ॥मूल पाठ—स्वप्रकाशैकसंसिद्धे नास्ति माया परात्मनि ।व्यावहारिकदृष्ट्येयं विद्याविद्या न चान्यथा ॥ १८॥हिन्दी अर्थ—जो परमात्मा केवल अपने ही प्रकाश से सिद्ध है, उस परमात्मा में वास्तव में माया नहीं है। व्यावहारिक दृष्टि से ही विद्या और अविद्या आदि का भेद दिखाई देता है; परम सत्य की दृष्टि से ऐसा भेद नहीं है।॥ १९ ॥मूल पाठ—तत्त्वदृष्ट्या तु नास्त्येव तत्त्वमेवास्ति केवलम् ।व्यावहारिक दृष्टिस्तु प्रकाशाव्यभिचारितः ॥ १९॥हिन्दी अर्थ—तत्त्व की दृष्टि से दूसरा कुछ भी नहीं है—केवल तत्त्व ही है। व्यवहार की दृष्टि से अनेकता और भेद दिखाई देते हैं, लेकिन उस सबके पीछे एक ही निरन्तर प्रकाशस्वरूप सत्य विद्यमान है।॥ २० ॥मूल पाठ—प्रकाश एव सततं तस्मादद्वैत एव हि ।अद्वैतमिति चोक्तिश्च प्रकाशाव्यभिचारतः ॥ २०॥हिन्दी अर्थ—वह आत्मप्रकाश निरन्तर विद्यमान है; इसलिए वास्तविकता में अद्वैत ही है। इसे अद्वैत कहने का कारण यही है कि परम चैतन्य-प्रकाश अपने स्वरूप से कभी विचलित नहीं होता।॥ २१ ॥मूल पाठ—प्रकाश एव सततं तस्मान्मौनं हि युज्यते ।अयमर्थो महान्यस्य स्वयमेव प्रकाशितः ॥ २१॥हिन्दी अर्थ—परमात्मा निरन्तर स्वयंप्रकाश स्वरूप है। इसलिए उस परम तत्त्व के विषय में मौन ही उचित माना गया है। जिसका यह महान् तत्त्व स्वयं ही प्रकाशित हो गया है, उसे बाहरी शब्दों से समझाने की आवश्यकता नहीं रहती।भाव: आत्मसाक्षात्कार केवल शब्दों से नहीं, बल्कि स्वयं के अनुभव से होता है।॥ २२ ॥मूल पाठ—न स जीवो न च ब्रह्मा न चान्यदपि किंचन ।न तस्य वर्णा विद्यन्ते नाश्रमाश्च तथैव च ॥ २२॥हिन्दी अर्थ—परम तत्त्व न केवल जीव है, न ब्रह्मा है और न उससे अलग कोई दूसरी वस्तु है। उस परम तत्त्व का कोई वर्ण नहीं है और न ही उसके लिए आश्रमों का कोई भेद है।भाव: परमात्मा सामाजिक, जातिगत अथवा आश्रमगत सीमाओं से परे है।॥ २३ ॥मूल पाठ—न तस्य धर्मोऽधर्मश्च न निषेधो विधिर्न च ।यदा ब्रह्मात्मकं सर्वं विभाति तत एव तु ॥ २३॥हिन्दी अर्थ—परम तत्त्व के लिए धर्म-अधर्म, निषेध-विधि आदि का कोई भेद नहीं है। जब साधक को सम्पूर्ण जगत् ब्रह्मस्वरूप दिखाई देने लगता है, तब ये भेद उसी क्षण समाप्त हो जाते हैं।भाव: यह परमार्थ-दृष्टि है; इसका अर्थ यह नहीं कि व्यवहार में धर्म-अधर्म के नियम निरर्थक हो जाते हैं।॥ २४ ॥मूल पाठ—तदा दुःखादिभेदोऽयमाभासोऽपि न भासते ।जगज्जीवादिरूपेण पश्यन्नपि परात्मवित् ॥ २४॥हिन्दी अर्थ—जब सब कुछ ब्रह्मस्वरूप दिखाई देता है, तब दुःख आदि के भेदों का आभास भी नहीं रहता। परमात्मा को जानने वाला व्यक्ति संसार और जीवों के विभिन्न रूपों को देखते हुए भी उनके भीतर उसी परम तत्त्व को देखता है।॥ २५ ॥मूल पाठ—न तत्पश्यति चिद्रूपं ब्रह्मवस्त्वेव पश्यति ।धर्मधर्मित्ववार्ता च भेदे सति हि भिद्यते ॥ २५॥हिन्दी अर्थ—परमात्मज्ञानी बाहरी भेद को उस रूप में नहीं देखता; वह चैतन्यस्वरूप ब्रह्म-वस्तु को ही देखता है। धर्म और धर्मी का भेद भी तभी तक है जब तक भेद की दृष्टि बनी हुई है।॥ २६ ॥मूल पाठ—भेदाभेदस्तथा भेदाभेदः साक्षात्परात्मनः ।नास्ति स्वात्मातिरेकेण स्वयमेवास्ति सर्वदा ॥ २६॥हिन्दी अर्थ—परमात्मा के विषय में भेद, अभेद अथवा भेदाभेद जैसी कल्पनाएँ भी अन्ततः आत्मा से अलग कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं रखतीं। अपने आत्मस्वरूप के अतिरिक्त परम सत्य सदा स्वयं ही विद्यमान है।भाव: आत्मा से अलग किसी दूसरी परम सत्ता की कल्पना अद्वैत दृष्टि में नहीं रहती।॥ २७ ॥मूल पाठ—ब्रह्मैव विद्यते साक्षाद्वस्तुतोऽवस्तुतोऽपि च ।तथैव ब्रह्मविज्ज्ञानी किं गृह्णाति जहाति किम् ॥ २७॥हिन्दी अर्थ—प्रत्यक्ष रूप से तथा वस्तु-अवस्तु के सभी विचारों के पार ब्रह्म ही विद्यमान है। इसलिए जो ब्रह्म को जान चुका है, उसके लिए ग्रहण करने अथवा त्यागने के लिए अलग क्या रह जाता है?भाव: जब सबमें एक ही ब्रह्म दिखाई देता है, तब “यह मेरा है और यह छोड़ना है” जैसी द्वैत-दृष्टि समाप्त होती है।॥ २८ ॥मूल पाठ—अधिष्ठानमनौपम्यमवाङ्मनसगोचरम् ।यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रं रूपवर्जितम् ॥ २८॥हिन्दी अर्थ—वह परम तत्त्व सभी का अद्वितीय अधिष्ठान है। वह वाणी और मन की पहुँच से परे है। वह दिखाई नहीं देता, पकड़ा नहीं जा सकता, उसका कोई गोत्र अथवा सीमित पहचान नहीं है और उसका कोई भौतिक रूप नहीं है।यहाँ उपनिषद् ब्रह्म के निर्गुण और निराकार स्वरूप का वर्णन करता है।॥ २९ ॥मूल पाठ—अचक्षुःश्रोत्रमत्यर्थं तदपाणिपदं तथा ।नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूख्मं च तदव्ययम् ॥ २९॥हिन्दी अर्थ—वह ब्रह्म आँख और कान से रहित अर्थात् इन्द्रियों से परे है; उसके हाथ-पाँव जैसे भौतिक अंग नहीं हैं। वह नित्य, सर्वव्यापक, अत्यन्त सूक्ष्म और अविनाशी है।यह विचार उपनिषदों में वर्णित उस ब्रह्म से मिलता है जो इन्द्रियों से परे होते हुए भी सभी इन्द्रिय-क्रियाओं का आधार है।॥ ३० ॥मूल पाठ—ब्रह्मैवेदममृतं तत्पुरस्ताद्ब्रह्मानन्दं परमं चैव पश्चात् ।ब्रह्मानन्दं परमं दक्षिणे चब्रह्मानन्दं परमं चोत्तरे च ॥ ३०॥हिन्दी अर्थ—सामने जो कुछ है वह अमृतस्वरूप ब्रह्म ही है। पीछे भी परम ब्रह्मानन्द ही है। दक्षिण दिशा में भी वही परम ब्रह्मानन्द है और उत्तर दिशा में भी वही परम ब्रह्मानन्द है।भावार्थ:साधक को चारों दिशाओं में, आगे-पीछे, सर्वत्र एक ही ब्रह्म और ब्रह्मानन्द का दर्शन करना चाहिए। ब्रह्म किसी एक स्थान में सीमित नहीं है।२१–३० का सारइन दस मंत्रों में पाशुपतब्रह्मोपनिषद् की अद्वैत-दृष्टि अत्यन्त स्पष्ट होती है:स्वयंप्रकाश ब्रह्म → मौन → भेदों का अतिक्रमण → आत्मा और ब्रह्म की एकता → निराकार, इन्द्रियातीत, सर्वव्यापक ब्रह्म → सर्वत्र ब्रह्मानन्द। अगले मंत्र ३१–४० में आत्मज्ञानी की मुक्ति, परा विद्या, स्वयंज्योति, आहार-शुद्धि और चित्तशुद्धि का वर्णन आता है। ॥ ३१ ॥मूल पाठ—स्वात्मन्येव स्वयं सर्वं सदा पश्यति निर्भयः ।तदा मुक्तो न मुक्तश्च बद्धस्यैव विमुक्तता ॥ ३१॥अर्थ—जो साधक अपने ही आत्मस्वरूप में सम्पूर्ण जगत् को देखता है, वह सदा निर्भय रहता है। उस अवस्था में वह मुक्त है; वास्तव में उसके लिए बन्धन और मुक्ति का भेद भी नहीं रह जाता। बन्धन केवल अज्ञान के कारण था, इसलिए ज्ञान होने पर उसी की मुक्ति होती है।॥ ३२ ॥मूल पाठ—एवंरूपा परा विद्या सत्येन तपसापि च ।ब्रह्मचर्यादिभिर्धर्मैर्लभ्या वेदान्तवर्त्मना ॥ ३२॥अर्थ—इस प्रकार की परा विद्या सत्य, तप, ब्रह्मचर्य आदि धर्मों के पालन तथा वेदान्त के मार्ग से प्राप्त होती है।भाव: केवल बौद्धिक ज्ञान पर्याप्त नहीं; सत्यनिष्ठा, संयम और साधना भी आवश्यक हैं।॥ ३३ ॥मूल पाठ—स्वशरीरे स्वयंज्योतिःस्वरूपं पारमार्थिकम् ।क्षीणदोषः प्रपश्यन्ति नेतरे माययावृताः ॥ ३३॥अर्थ—जिसके दोष क्षीण हो गए हैं, वह अपने ही शरीर में स्थित परम, स्वयंप्रकाश आत्मज्योति को देखता है। जो माया से आवृत हैं, वे उस परम तत्त्व को नहीं देख पाते।॥ ३४ ॥मूल पाठ—एवं स्वरूपविज्ञानं यस्य कस्यास्ति योगिनः ।कुत्रचिद्गमनं नास्ति तस्य संपूर्णरूपिणः ॥ ३४॥अर्थ—जिस योगी को अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो गया है, उसके लिए कहीं जाने को शेष नहीं रहता, क्योंकि उसका स्वरूप ही सर्वत्र पूर्ण है।॥ ३५ ॥मूल पाठ—आकाशमेकं संपूर्णं कुत्रचिन्न हि गच्छति ।तद्वद्ब्रह्मात्मविच्छ्रेष्ठः कुत्रचिन्नैव गच्छति ॥ ३५॥अर्थ—जैसे सम्पूर्ण आकाश कहीं आता-जाता नहीं है, उसी प्रकार ब्रह्मात्मा को जानने वाला श्रेष्ठ ज्ञानी भी कहीं जाने वाला नहीं है।भाव: आत्मा सर्वव्यापक है; इसलिए आत्मज्ञान की दृष्टि से “मैं यहाँ से वहाँ जाऊँ” जैसी सीमित भावना समाप्त हो जाती है। ॥ ३६ ॥मूल पाठ—अभक्ष्यस्य निवृत्त्या तु विशुद्धं हृदयं भवेत् ।आहारशुद्धौ चित्तस्य विशुद्धिर्भवति स्वतः ॥ ३६॥अर्थ—अनुचित अथवा अभक्ष्य आहार से निवृत्त होने पर हृदय शुद्ध होता है। आहार की शुद्धि से चित्त की शुद्धि भी स्वाभाविक रूप से होती है।यहाँ आहार का अर्थ केवल भोजन ही नहीं, साधक के जीवन में ग्रहण की जाने वाली वस्तुओं के व्यापक अनुशासन से भी समझा जा सकता है।॥ ३७ ॥मूल पाठ—चित्तशुद्धौ क्रमाज्ज्ञानं त्रुट्यन्ति ग्रन्थयः स्फुटम् ।अभक्ष्यं ब्रह्मविज्ञानविहीनस्यैव देहिनः ॥ ३७॥अर्थ—चित्त शुद्ध होने पर क्रमशः ज्ञान उत्पन्न होता है और अज्ञान की गांठें स्पष्ट रूप से टूटने लगती हैं। ब्रह्मज्ञान से रहित देहधारी के लिए ही वास्तविक अर्थ में “अभक्ष्य” की स्थिति कही गई है।भाव: बाहरी शुद्धि का उद्देश्य अन्ततः अन्तःकरण की शुद्धि और ब्रह्मज्ञान है। ॥ ३८ ॥मूल पाठ—न सम्यग्ज्ञानिनस्तद्वत्स्वरूपं सकलं खलु ।अहमन्नं सदान्नाद इति हि ब्रह्मवेदनम् ॥ ३८॥अर्थ—सम्यक् ज्ञान प्राप्त व्यक्ति के लिए समस्त स्वरूप का वास्तविक ज्ञान हो जाता है। “मैं अन्न हूँ और सदा अन्न का भोक्ता हूँ”—इस प्रकार का बोध ब्रह्मज्ञान की ओर संकेत करता है।यहाँ “अन्न” और “अन्नाद” का प्रयोग व्यापक दार्शनिक अर्थ में है—सृष्टि और उसके अनुभव/भोगकर्ता के अद्वैत सम्बन्ध को दिखाने के लिए।॥ ३९ ॥मूल पाठ—ब्रह्मविद्ग्रसति ज्ञानात्सर्वं ब्रह्मात्मनैव तु ।ब्रह्मक्षत्रादिकं सर्वं यस्य स्यादोदनं सदा ॥ ३९॥अर्थ—ब्रह्मज्ञानी ज्ञान के द्वारा सम्पूर्ण जगत् को ब्रह्मात्मस्वरूप ही देखता है। उसके लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सम्पूर्ण जगत् मानो भोजन के समान है।भाव: यहाँ “ग्रसति” और “ओदन” का अर्थ भौतिक रूप से खाना नहीं, बल्कि ज्ञान द्वारा समस्त नाम-रूपों को ब्रह्म में अभिन्न रूप से देखना है।॥ ४० ॥मूल पाठ—यस्योपसेचनं मृत्युस्तं ज्ञानी तादृशः खलु ।ब्रह्मस्वरूपविज्ञानाज्जगद्भोज्यं भवेत्खलु ॥ ४०॥अर्थ—जिस ज्ञानी के लिए मृत्यु भी भोजन के साथ प्रयुक्त होने वाले उपसेचन के समान हो जाती है, वह ऐसा ब्रह्मज्ञानी है। ब्रह्मस्वरूप के ज्ञान से सम्पूर्ण जगत् उसके लिए “भोज्य” के समान प्रतीत होता है।भाव: मृत्यु भी ब्रह्म से बाहर कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं रह जाती।॥ ४१ ॥मूल पाठ—जगदात्मतया भाति यदा भोज्यं भवेत्तदा ।ब्रह्मस्वात्मतया नित्यं भक्षितं सकलं तदा ॥ ४१॥अर्थ—जब सम्पूर्ण जगत् आत्मस्वरूप दिखाई देने लगता है, तब वह “भोज्य” प्रतीत होता है। और जब सब कुछ ब्रह्मस्वरूप आत्मा ही है, तब सम्पूर्ण जगत् मानो ब्रह्म में ही आत्मसात् हो गया।॥ ४२ ॥मूल पाठ—यदाभासेन रूपेण जगद्भोज्यं भवेत् तत् ।मानतः स्वात्मना भातं भक्षितं भवति ध्रुवम् ॥ ४२॥अर्थ—जिस आभास या रूप में जगत् “भोज्य” दिखाई देता है, जब वही अपने आत्मस्वरूप के रूप में प्रकाशित होता है, तब निश्चय ही वह आत्मज्ञान में आत्मसात् हो जाता है।॥ ४३ ॥मूल पाठ—स्वस्वरूपं स्वयं भुङ्क्ते नास्ति भोज्यं पृथक् स्वतः ।अस्ति चेदस्तितारूपं ब्रह्मैवास्तित्वलक्षणम् ॥ ४३॥अर्थ—आत्मा स्वयं अपने ही स्वरूप का अनुभव करता है; उससे अलग कोई स्वतंत्र “भोज्य” वस्तु नहीं है। यदि किसी वस्तु की सत्ता है, तो उसकी अस्तित्व-सत्ता का मूल स्वरूप ब्रह्म ही है।॥ ४४ ॥मूल पाठ—अस्तितालक्षणा सत्ता सत्ता ब्रह्म न चापरा ।नास्ति सत्तातिरेकेण नास्ति माया च वस्तुतः ॥ ४४॥अर्थ—जिसे हम “अस्तित्व” कहते हैं, उसकी वास्तविक सत्ता ब्रह्म ही है; ब्रह्म से अलग कोई स्वतंत्र परम सत्ता नहीं है। उस परम सत्य से अलग माया की भी स्वतंत्र वास्तविक सत्ता नहीं है।॥ ४५ ॥मूल पाठ—योगिनामात्मनिष्ठानां माया स्वात्मनि कल्पिता ।साक्षिरूपतया भाति ब्रह्मज्ञानेन बाधिता ॥ ४५॥अर्थ—आत्मनिष्ठ योगियों की दृष्टि में माया आत्मा में ही कल्पित प्रतीत होती है। वह साक्षी के रूप में दिखाई देती है, लेकिन ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने पर उसका स्वतंत्र अस्तित्व बाधित हो जाता है।॥ ४६ ॥मूल पाठ—ब्रह्मविज्ञानसंपन्नः प्रतीतमखिलं जगत् ।पश्यन्नपि सदा नैव पश्यति स्वात्मनः पृथक् ॥ ४६॥अर्थ—ब्रह्मज्ञान से सम्पन्न ज्ञानी सम्पूर्ण दिखाई देने वाले जगत् को देखता हुआ भी उसे अपने आत्मस्वरूप से पृथक् नहीं देखता।मुख्य भाव:जगत् दिखाई देता है, व्यवहार चलता है, परन्तु ज्ञानी की अन्तिम दृष्टि में आत्मा और ब्रह्म से अलग कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। ॥ उपनिषद्-समाप्ति ॥इत्युपनिषत् ॥इसके बाद पुनः शान्तिपाठ आता है—ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः ।व्यशेम देवहितं यदायुः ॥स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥हरिः ॐ तत्सत् ।इति पाशुपतब्रह्मोपनिषत्समाप्ता ॥शान्तिपाठ का अर्थहे देवगण! हम अपने कानों से कल्याणकारी वचन सुनें और अपनी आँखों से मंगलमय दृश्य देखें। स्वस्थ और दृढ़ अंगों से आपकी स्तुति करते हुए अपनी आयु देवहित में व्यतीत करें। इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति हमारा कल्याण करें। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।पाशुपतब्रह्मोपनिषद् का अंतिम संदेशइन अंतिम मंत्रों में उपनिषद् क्रमशः आत्मज्ञान → चित्तशुद्धि → ब्रह्मदर्शन → माया का अतिक्रमण → सर्वत्र ब्रह्म-दृष्टि तक ले जाता है। अंतिम मंत्र ४६ का केंद्रीय संदेश है कि ब्रह्मज्ञानी जगत् को देखता तो है, लेकिन उसे अपने आत्मस्वरूप से अलग नहीं मानता। -------×------×--------×--------×--