Money VS Me Part-26 in Hindi Human Science by fiza saifi books and stories PDF | Money Vs Me - Part 26

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Money Vs Me - Part 26

मैं घर पहुँचा तो डाइनिंग टेबल पर माँ और ठाकुर साहब बैठे हुए थे। मेरे वहाँ आते ही सविता ने खाना लगा दिया।

मैं कुर्सी खींचकर बैठा ही था कि बिना किसी भूमिका के सीधे ठाकुर साहब से पूछ बैठा,

"आप अमेरिका जा रहे हैं?"

मेरे अचानक पूछे गए सवाल पर ठाकुर साहब और माँ, दोनों ने चौंककर मेरी तरफ देखा।

कुछ पल बाद ठाकुर साहब ने जवाब दिया, "हाँ। मेरी बेटी ज्योति की इंगेजमेंट की डेट फिक्स करनी है, इसलिए हम आज रात की फ्लाइट से अमेरिका जा रहे हैं। मैं एक हफ्ते में लौट आऊँगा, लेकिन तुम्हारी आंटी वहीं रहेंगी।"

उनकी बात सुनकर मेरा दिल बैठ गया। लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ कह पाता, माँ अचानक बोल पड़ीं।

"मैंने आपसे कहा ना, आप टिकट कैंसिल करवा दीजिए! मैं अभी वापस नहीं जाऊँगी।"

उनकी आवाज़ में गुस्से से कहीं ज़्यादा बेबसी थी।

"मुझे अपनी माँ से मिलना है! आप मुझे बताते क्यों नहीं? अपनी माँ के पास एक बार लेकर क्यों नहीं जाते मुझे?"

अचानक माँ की आवाज़ इतनी तेज़ हो गई कि मैं भी चौंक उठा।

वह ज़ोर से टेबल पर हाथ मारते हुए अपनी कुर्सी से खड़ी हो गईं।

"मोहिनी!"

ठाकुर साहब ने भी नाराज़गी से उन्हें आवाज़ लगाई।

"टिकट कैंसिल नहीं होगी। जाकर अपना बैग पैक करो।"

"नहीं!"

माँ ने तुरंत जवाब दिया।

"जब तक आप मुझे मेरी माँ और मेरे बेटे से मिला नहीं देते, मैं कहीं नहीं जाऊँगी!"

मेरा बेटा...!

उनके मुँह से ये शब्द सुनते ही मेरे दिल की धड़कन जैसे एक पल के लिए थम गई।

मेरी उँगलियाँ टेबल के नीचे कसकर एक-दूसरे में उलझ गईं। मन किया कि उसी पल उठकर माँ के सामने खड़ा हो जाऊँ और कह दूँ—

माँ, मैं यहीं हूँ! आपका बेटा आपके सामने बैठा है!

लेकिन मैं अपनी जगह से हिल तक नहीं पाया।

माँ की आँखों में दर्द था। उनकी आवाज़ काँप रही थी और चेहरे पर बरसों की दबी हुई तकलीफ़ साफ नज़र आ रही थी।

"सारी ज़िंदगी मैंने आपकी मानी है, आपकी सुनी है। आपने जो कहा, मैंने किया। लेकिन अब..." कहते-कहते उनकी आवाज़ भर्रा गई, "अब मेरी एक बात भी नहीं सुन सकते आप?"

उन्होंने कुछ पल के लिए आँखें बंद कीं, जैसे अपने आँसुओं को रोकने की कोशिश कर रही हों।

फिर बेहद दर्द भरी आवाज़ में बोलीं,

"यहाँ आकर मुझे ऐसा लग रहा है, जैसे बरसों बाद मेरी ज़िंदगी मुझे वापस मिली हो। पता नहीं क्यों, लेकिन मुझे लगता है कि मेरी माँ और मेरा बेटा मुझसे बहुत दूर नहीं हैं। मैं उनसे मिलना चाहती हूँ। बस एक बार... मुझे उनसे मिलने दीजिए।"

उनकी बात सुनकर मेरे भीतर कुछ टूटने लगा।

जिस माँ को मैं इतने सालों से ढूँढ़ रहा था, वह आज मेरे सामने बैठी थी। वह अपने बेटे से मिलने के लिए तड़प रही थी, और उसे यह तक नहीं पता था कि उसका बेटा उसकी आँखों के सामने मौजूद है।

मेरे लिए उस पल से ज़्यादा तकलीफ़देह कुछ नहीं हो सकता था।

मैं कभी ठाकुर उदय प्रताप का चेहरा देखता, जो माँ की ज़िद के कारण लगातार सख़्त होता जा रहा था, तो कभी अपनी माँ की उलझन और बेबसी से भरी आँखों को।

मैं समझ नहीं पा रहा था कि आखिर क्या करूँ।

क्या मुझे अभी माँ को सच बता देना चाहिए?

क्या मुझे सबके सामने कह देना चाहिए कि मैं ही उनका बेटा क्षितिज हूँ?

लेकिन फिर ठाकुर साहब का क्या होगा? वह कैसे रिएक्ट करेंगे? और माँ... क्या वह इस सच को सहन कर पाएँगी?

मेरे दिमाग में सैकड़ों सवाल घूम रहे थे।

तभी ठाकुर साहब ने गहरी साँस लेते हुए कहा,

"मोहिनी, तुम बेवजह ज़िद कर रही हो। तुम्हारी माँ के घर में अब कोई नहीं रहता। और जहाँ तक तुम्हारे बेटे की बात है..."

वह कहते-कहते अचानक रुक गए।

माँ ने बेचैनी से उनकी तरफ देखा।

"क्या हुआ? मेरे बेटे की बात क्या है? आप हमेशा बात अधूरी क्यों छोड़ देते हैं? आखिर मुझसे क्या छिपा रहे हैं आप?"

इस बार उनकी आवाज़ में गुस्से के साथ शक भी शामिल था।

ठाकुर साहब कुछ पल चुप रहे। फिर उन्होंने बेहद सख़्त लहजे में कहा,

"मैंने कह दिया ना, आज रात हम अमेरिका जा रहे हैं। इस बारे में अब कोई बहस नहीं होगी।"

"लेकिन मैं नहीं जाऊँगी!"

माँ ने एक बार फिर साफ़ शब्दों में कहा।

"मुझे अपने बेटे से मिलना है!"

और इस बार उन्होंने जो कहा, उसने मेरे भीतर चल रहे तूफ़ान को और भड़का दिया।

"पता नहीं क्यों, लेकिन मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरा बेटा ज़िंदा है। वह कहीं न कहीं मेरा इंतज़ार कर रहा है। मेरा दिल कहता है कि मैं उसके बहुत करीब हूँ।"

यह कहते हुए माँ की आँखों से आँसू बह निकले।

मैंने अपना सिर झुका लिया।

अब मुझसे और बर्दाश्त नहीं हो रहा था।

आखिर कब तक मैं अपनी ही माँ के सामने अजनबी बनकर बैठा रहता?

मैंने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया। मेरी नज़र माँ पर जाकर ठहर गई।

इस बार मैंने मन ही मन एक फैसला कर लिया था।

आज चाहे कुछ भी हो जाए, मैं माँ को सच बताकर ही रहूँगा।

क्योंकि अगर आज भी मैं चुप रहा, तो शायद ज़िंदगी मुझे दोबारा यह मौका कभी नहीं देगी।

Writing

मैंने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। अब मुझसे और चुप नहीं बैठा जा रहा था। माँ की आँखों में अपने बेटे से मिलने की तड़प देखकर मेरा दिल बुरी तरह दर्द कर रहा था।

जिस बेटे को वह इतने सालों से ढूँढ़ रही थीं, वह उनके सामने बैठा था। बस फ़र्क इतना था कि वह मुझे पहचान नहीं पा रही थीं और मैं चाहकर भी उन्हें सच बताने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

"माँ..."

शब्द मेरे होंठों तक आकर रुक गया।

मैंने तुरंत अपनी नज़रें झुका लीं।

नहीं, अब और नहीं!

मैंने गहरी साँस ली और आखिरकार बोल ही पड़ा।

"ठाकुर साहब, अगर आंटी अभी अमेरिका नहीं जाना चाहतीं, तो आपको उन्हें ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए। कम से कम उनकी बात तो सुन लीजिए।"

मेरी बात सुनकर दोनों ने मेरी तरफ देखा।

ठाकुर साहब की आँखों में नाराज़गी साफ़ झलक रही थी।

"क्षितिज, यह हमारे परिवार का मामला है। तुम्हें बीच में बोलने की ज़रूरत नहीं है।"

मैंने उनकी बात सुनी, लेकिन इस बार चुप रहना मेरे लिए मुमकिन नहीं था।

"मैं समझता हूँ, सर। लेकिन आंटी सिर्फ़ अपनी माँ और बेटे से मिलना चाहती हैं। इसमें गलत क्या है? अगर वह इतने सालों बाद अपने परिवार से मिलने के लिए बेचैन हैं, तो उन्हें एक मौका मिलना चाहिए।"

माँ मेरी तरफ देख रही थीं। उनकी आँखों में एक अजीब-सी चमक थी, जैसे मेरी बातों में उन्हें कोई अपना दिखाई दे रहा हो।

"तुम्हारा नाम क्षितिज है ना?"

उन्होंने अचानक मुझसे पूछा।

मेरी साँसें थम-सी गईं।

"जी..."

"पता नहीं क्यों, बेटा, लेकिन तुम्हें देखकर मुझे बहुत अपनापन महसूस होता है। ऐसा लगता है जैसे मैं तुम्हें बहुत पहले से जानती हूँ।"

मेरी आँखें नम हो गईं।

बेटा!

आज इतने सालों बाद माँ ने मुझे बेटा कहकर पुकारा था, भले ही वह यह नहीं जानती थीं कि मैं सच में उनका बेटा हूँ।

मैं किसी तरह अपनी भावनाओं को काबू में रखते हुए बोला, "कभी-कभी दिल उन रिश्तों को भी पहचान लेता है, जिन्हें आँखें नहीं पहचान पातीं, आंटी।"

मेरी बात सुनकर माँ कुछ पल तक मुझे देखती रहीं।

फिर अचानक उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया।

"एक बात पूछूँ, क्षितिज?"

"जी, पूछिए।"

"अगर तुम्हारी माँ तुमसे बिछड़ गई होती और तुम्हें पता चलता कि वह ज़िंदा है, तो क्या तुम उससे मिलने नहीं जाते? क्या तुम उसे अपने सामने देखकर भी चुप रह पाते?"

उनका सवाल मेरे सीने में तीर की तरह लगा।

मैंने उनकी आँखों में देखा। अब अपने आँसू रोकना मुश्किल हो रहा था।

"नहीं, आंटी। मैं तो सबसे पहले उसके पास जाता। उसे बताता कि मैं उससे कितना प्यार करता हूँ। और अगर वह मुझसे दूर जाने की कोशिश करती, तो मैं उसे रोक लेता।"

माँ की आँखों से आँसू बहने लगे।

"तो फिर मैं भी अपने बेटे से मिलूँगी। चाहे कुछ भी हो जाए!"

उन्होंने मेरा हाथ और कसकर पकड़ लिया।

"मुझे नहीं पता कि वह कहाँ है, कैसा है, किस हाल में है... लेकिन मेरा दिल कहता है कि वह ज़िंदा है। और जब तक मैं उससे मिल नहीं लेती, मुझे चैन नहीं मिलेगा।"

मैंने अपना दूसरा हाथ उनके हाथ पर रख दिया।

"आप उनसे ज़रूर मिलेंगी, आंटी। मैं वादा करता हूँ।"

ठाकुर साहब अचानक अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए।

"बस बहुत हो गया! मोहिनी, तुम अपने कमरे में जाओ। और क्षितिज, तुम भी इस मामले से दूर रहो।"

उनकी आवाज़ इतनी सख़्त थी कि सविता तक सहमकर रुक गई।

लेकिन माँ इस बार पीछे हटने को तैयार नहीं थीं।

"नहीं, उदय! आज मैं अपनी बात पूरी करके रहूँगी। हर बार आपने मुझे चुप करा दिया। हर बार आपने कहा कि जो हो चुका है, उसे भूल जाओ। लेकिन कोई माँ अपने बच्चे को कैसे भूल सकती है?"

उनकी आवाज़ टूट गई।

"आपको क्या लगता है, मैं अपने बेटे को भूल गई हूँ? मैं हर दिन उसके बारे में सोचती हूँ। हर रात उसके लिए रोती हूँ। और आज जब यहाँ आकर मुझे ऐसा लग रहा है कि शायद मैं उसके करीब हूँ, तो आप मुझे फिर से दूर ले जाना चाहते हैं!"

मैंने ठाकुर साहब की तरफ देखा।

उनका चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था, लेकिन उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जिसे मैं समझ नहीं पा रहा था।

डर?

या कोई ऐसा राज़, जिसे वह इतने सालों से अपने सीने में दबाए बैठे थे?

तभी माँ ने मेरा हाथ छोड़कर ठाकुर साहब की तरफ देखा और एक ऐसा सवाल पूछा, जिसने पूरे कमरे में सन्नाटा फैला दिया।

"उदय, सच-सच बताइए... क्या आपको मेरे बेटे के बारे में कुछ पता है? क्या वह ज़िंदा है?"

ठाकुर साहब एकदम खामोश हो गए।

और मैं...

मैं अपनी जगह पर बैठा बस उनके जवाब का इंतज़ार करता रह गया।

क्योंकि अब मुझे भी जानना था कि आखिर इतने सालों से माँ से क्या छिपाया जा रहा था।