"मोहिनी, मैं तुम्हें बहुत बार समझा चुका हूँ, तुम समझती क्यों नहीं हो? तुम्हारी तबीयत भी ठीक नहीं है। पहले अमेरिका चलो, फिर वहाँ जाकर मैं तुम्हें सब कुछ बता दूँगा।"
ठाकुर साहब ने नरम लहजे में माँ को समझाते हुए कहा।
लेकिन माँ अब उनकी कोई बात सुनने को तैयार नहीं थीं।
"नहीं, उदय! जब तक मैं अपनी माँ और अपने बेटे से नहीं मिल जाती, मैं कहीं नहीं जाऊँगी। आप हर बार मुझे कोई न कोई बहाना देकर चुप करा देते हैं। लेकिन अब और नहीं!"
माँ की बात सुनकर मैं खुद को रोक नहीं पाया।
"जब वह नहीं जाना चाहतीं, तो आप उन्हें ज़बरदस्ती क्यों ले जाना चाहते हैं? आखिर किस बात का डर है आपको?"
मेरा बदला हुआ लहजा और तेवर देखकर ठाकुर साहब अचानक चौंक गए। उन्होंने हैरानी से मेरी तरफ देखा, लेकिन मैं अब अपने भीतर फैसला कर चुका था।
अब चाहे कुछ भी हो जाए, मैं माँ को सच बताकर ही रहूँगा।
मैंने उनकी आँखों में देखते हुए अगला सवाल किया।
"क्या आपको इस बात का डर है कि आपका दूसरा बेटा अपनी माँ को आपसे दूर कर देगा? या फिर इस बात का डर है कि आपके बच्चे एक बार फिर अपनी दूसरी माँ को न खो दें?"
"क्या बकवास कर रहे हो तुम?" ठाकुर साहब गुस्से से बोले।
लेकिन उनकी आँखों में मुझे गुस्से से कहीं ज़्यादा डर दिखाई दे रहा था।
मैंने उनकी बात अनसुनी कर दी।
"आपने अपने बच्चों को माँ का साया देने के लिए एक दूसरे बच्चे के सिर से उसकी माँ का साया छीन लिया। वह भी उस बच्चे से, जिसके पिता की मौत पहले ही हो चुकी थी!"
मेरी आवाज़ में दर्द और गुस्सा दोनों थे।
"इतने खुदगर्ज़ कैसे हो सकते हैं आप, ठाकुर साहब? अपने बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए आपने एक मासूम बच्चे की पूरी ज़िंदगी दाँव पर लगा दी। आपके बच्चों को तो माँ और बाप, दोनों का प्यार मिला। वे अमेरिका जैसे देश में आराम से बड़े हुए। लेकिन उस बच्चे का क्या, जिसे आपने उसकी माँ से हमेशा के लिए दूर कर दिया?"
मेरी बात सुनकर माँ और ठाकुर साहब, दोनों बुरी तरह चौंक गए।
"यह... यह सब तुम कैसे जानते हो?" ठाकुर साहब के मुँह से निकला।
माँ तो जैसे पत्थर की हो गई थीं। वह बस आँखें फाड़कर मुझे देखे जा रही थीं। शायद उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि मैं आखिर कहना क्या चाहता हूँ।
मैंने माँ की तरफ देखा। उनकी आँखों में आँसू थे और चेहरे पर अनगिनत सवाल।
मेरा दिल भर आया।
"हाँ, माँ! बहुत अजीब और हैरानी की बात है ना कि मैं ही आपका क्षितिज हूँ। आपका वही बेटा, जो ज़िंदगी भर यही सोचता रहा कि कैसी माँ थी उसकी, जो पति की मौत के बाद दूसरी शादी करके अपने बच्चे को देखने तक नहीं आई!"
मेरी आवाज़ भर्रा गई।
"मैंने हमेशा यही सोचा कि शायद आपको मुझसे प्यार ही नहीं था। शायद आपको अपनी नई ज़िंदगी इतनी प्यारी हो गई थी कि आपने अपने पहले बच्चे को पूरी तरह भुला दिया। मैं नहीं जानता था कि सच्चाई कुछ और थी।"
मैंने आँसू पोंछे और माँ के सामने जाकर खड़ा हो गया।
"लेकिन आज मुझे पता चला कि आप भी इतने सालों से अपने बेटे के लिए तड़प रही थीं। आपको तो यह तक नहीं बताया गया कि आपका बेटा ज़िंदा है।"
माँ के होंठ काँपने लगे।
"क्षितिज...?"
मैं उनके सामने घुटनों के बल बैठ गया और उनका हाथ अपने माथे से लगा लिया।
"हाँ, माँ! मैं आपका वही बेटा हूँ। आपका क्षितिज!"
कुछ देर तक हम दोनों एक-दूसरे से लिपटकर रोते रहे।
फिर मैंने माँ को सँभालते हुए ठाकुर साहब की तरफ देखा।
"लेकिन आपकी गलती को मैं कभी नहीं भूल सकता। आपने अपनी पत्नी के बच्चों को माँ का प्यार देने के लिए दूसरे बच्चे से उसकी माँ छीन ली। आपको क्या लगा था, यह राज़ हमेशा छिपा रहेगा?"
ठाकुर साहब ने नज़रें झुका लीं।
"
ठाकुर साहब कुछ देर तक खामोश खड़े रहे। उनके चेहरे पर पछतावा था या कोई और दर्द, मैं समझ नहीं पा रहा था। फिर वह बिना कुछ कहे वहाँ से निकल गए।
मैंने माँ को सँभाला और उन्हें कुर्सी पर बैठा दिया। वह अभी तक सदमे में थीं। कभी मुझे छूकर देखतीं, कभी मेरा चेहरा अपने हाथों में लेकर निहारने लगतीं, तो कभी अपनी माँ और मामा के बारे में सवाल करने लगतीं।
"क्षितिज, मेरी माँ कैसी हैं? क्या वह ठीक हैं?
उनके सवालों का सिलसिला थम ही नहीं रहा था।
मैं बस उनके हाथों को कभी अपने होंठों से लगाता, तो कभी अपनी आँखों से। मन करता था कि वक्त को यहीं रोक दूँ। जितने साल माँ के बिना गुज़ारे थे, उन सबकी भरपाई इसी एक पल में कर लूँ।
"माँ, मैं आपको सब कुछ बताऊँगा। एक-एक बात बताऊँगा। बस आप अभी खुद को सँभालिए। आपकी तबीयत ठीक नहीं है।"
मैंने उनके हाथों को अपने हाथों में लेकर कहा।
तभी दरवाज़ा खुला और ठाकुर साहब दोबारा कमरे में दाखिल हुए।
इस बार उनके हाथ में लैपटॉप था। वह किसी से वीडियो कॉल पर बात कर रहे थे। उन्होंने लैपटॉप टेबल पर रखा और मुझे अपनी तरफ आने का इशारा किया।
मैं हैरान होता हुआ उनके पास चला गया।
लेकिन जैसे ही मेरी नज़र लैपटॉप की स्क्रीन पर पड़ी, मेरे पूरे शरीर में एक ठंडी लहर दौड़ गई।
स्क्रीन पर अस्पताल का एक कमरा दिखाई दे रहा था। कमरे में एक बेड था, जिस पर एक बेहद कमज़ोर और असामान्य शारीरिक बनावट वाला व्यक्ति लेटा हुआ था। उसके हाथ-पैर सामान्य रूप से विकसित नहीं हुए थे। उसे देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे उसका शरीर जन्म से ही किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा हो।
स्क्रीन पर मौजूद डॉक्टर ने ठाकुर साहब की तरफ देखते हुए कहा,
"डॉक्टर साहनी, चिराग की हालत अब कैसी है?" ठाकुर साहब ने पूछा।
डॉक्टर ने गंभीर आवाज़ में जवाब दिया, "ठाकुर साहब, आप तो उसकी हालत जानते ही हैं। सुधार की उम्मीद न के बराबर है। उसकी बीमारी जन्मजात है और अब तक हमने इलाज की हर मुमकिन कोशिश की है। लेकिन उसका शारीरिक और मानसिक विकास सामान्य रूप से नहीं हो पाया है।"
डॉक्टर कुछ पल रुके, फिर बोले,
"सच कहूँ तो, उसके पूरी तरह ठीक होने की उम्मीद बहुत कम है। हम उसे आराम देने और उसकी स्थिति को स्थिर रखने की कोशिश कर रहे हैं।"
मैं स्क्रीन पर उस व्यक्ति को देखता रह गया।
चिराग!
ठाकुर साहब का बेटा चिराग!
मेरा पूरा शरीर काँप उठा।
"ठीक है, डॉक्टर साहनी। आपका बहुत शुक्रिया। मैं जल्द ही आपसे मिलने आता हूँ।"
इतना कहकर ठाकुर साहब ने वीडियो कॉल काट दी।
कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।
फिर उन्होंने मेरी तरफ देखा।
"क्षितिज, यह मेरा बेटा चिराग है।"