उन्होंने आगे कहा, "इसके जन्म के समय ही मेरी पत्नी रागिनी की मौत हो गई थी। चिराग का जन्म समय से बहुत पहले हुआ था। जन्म से ही उसे कई गंभीर समस्याएँ थीं। उसकी शारीरिक बनावट और मानसिक विकास सामान्य बच्चों की तरह नहीं हो पाया। डॉक्टरों ने बहुत कोशिश की, लेकिन उसकी हालत में कोई खास सुधार नहीं हुआ।"
उनकी आवाज़ भर्रा गई।
"रागिनी की मौत के बाद मैं पूरी तरह टूट गया था। एक तरफ पत्नी को खोने का दर्द था और दूसरी तरफ अपने बच्चे को इस हालत में देखकर बेबसी। मैं उसे मरने के लिए नहीं छोड़ सकता था। वह जैसा भी था, मेरा बेटा था।"
मैंने पहली बार ठाकुर साहब की आँखों में वह दर्द देखा, जिसे शायद उन्होंने बरसों से किसी के सामने जाहिर नहीं होने दिया था।
"मेरे पास दौलत की कोई कमी नहीं थी, क्षितिज। मैं उसके इलाज पर जितना चाहूँ, उतना खर्च कर सकता था। लेकिन एक चीज़ थी, जो दुनिया की सारी दौलत मिलाकर भी उसे नहीं दे सकता था—एक माँ का प्यार।"
उन्होंने माँ की तरफ देखा।
"ज्योति चिराग से बड़ी है। रागिनी के जाने के बाद उसकी देखभाल के लिए भी किसी की ज़रूरत थी। मैं अकेले दोनों बच्चों को सँभालने की कोशिश कर रहा था, लेकिन चिराग की हालत देखकर मुझे लगता था कि उसे किसी ऐसे इंसान की ज़रूरत है, जो उसे अपने बच्चे की तरह प्यार कर सके।"
वह कुछ पल रुके।
"इसीलिए मैंने मोहिनी से शादी की थी। मैंने उसे बताया था कि मुझे चिराग के लिए एक माँ की ज़रूरत है। मैंने सोचा था कि मोहिनी उसे अपना लेगी और हमारे घर में फिर से खुशियाँ लौट आएँगी।"
मेरे भीतर एक अजीब-सी बेचैनी उठने लगी।
"लेकिन माँ को मुझसे दूर रखने का फैसला आपने क्यों किया? चिराग को माँ की ज़रूरत थी, तो इसका मतलब यह तो नहीं था कि आप किसी दूसरे बच्चे को उसकी माँ से अलग कर देते!"
ठाकुर साहब ने कोई जवाब नहीं दिया।
मैंने फिर कहा, "आप माँ से शादी करते, चिराग को उनका प्यार मिलता, और माँ अपने बेटे से भी मिलती रहतीं। इसमें परेशानी क्या थी?"
ठाकुर साहब ने थकी हुई आवाज़ में कहा,
"परेशानी मेरी सोच थी, क्षितिज। मुझे डर था कि अगर मोहिनी अपने पुराने परिवार से दोबारा जुड़ गई, तो वह चिराग को छोड़कर चली जाएगी। मुझे डर था कि वह अपने बेटे को चुन लेगी और मेरे बच्चों को अकेला छोड़ देगी।"
मैं उनकी तरफ देखता रह गया।
"और इस डर में आपने एक माँ से उसका बेटा छीन लिया?"
उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
"हाँ। मैंने गलत किया। मैं अपने बेटे के भविष्य को लेकर इतना डरा हुआ था कि मुझे किसी और का दर्द दिखाई ही नहीं दिया।"
माँ अब तक चुपचाप सब सुन रही थीं। उनकी आँखों में आँसू थे।
उन्होंने धीरे से पूछा, "उदय, क्या आपको सच में लगा था कि मैं चिराग को उसके हाल पर छोड़ देती? क्या आपको मुझ पर इतना भी भरोसा नहीं था?"
ठाकुर साहब ने उनकी तरफ देखा, लेकिन कुछ बोल नहीं पाए।
माँ की आवाज़ काँपने लगी।
"मैंने कभी भेदभाव नहीं किया।
उनकी बात सुनकर ठाकुर साहब ने सिर झुका लिया।
मैंने माँ का हाथ थाम लिया।
मेरे मन में चिराग के लिए भी दुख था। वह भी तो एक बच्चा था, जिसने जन्म लेते ही अपनी माँ खो दी थी। उसकी बीमारी उसकी गलती नहीं थी। उसे भी प्यार और देखभाल की ज़रूरत थी।
लेकिन उसके दर्द को कम करने के लिए मेरी माँ से मेरा रिश्ता छीन लेना कहाँ का इंसाफ था?
मैंने ठाकुर साहब से कहा,
"मैं चिराग के दर्द को समझ सकता हूँ। मैं यह भी समझता हूँ कि आपने उसे बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की होगी। लेकिन एक बच्चे को माँ का प्यार देने के लिए दूसरे बच्चे को माँ से दूर करना कोई समाधान नहीं था। आपने चिराग को माँ देने की कोशिश में मुझे अनाथ जैसा जीवन जीने पर मजबूर कर दिया, जबकि मेरी माँ ज़िंदा थीं।"
ठाकुर साहब की आँखों से आँसू बहने लगे।
"मैं जानता हूँ, क्षितिज। मैंने बहुत बड़ी गलती की है।"
Writing
"तुम इसे मेरी गलती कहो या मेरी खुदगर्ज़ी, क्षितिज... जो समझना चाहो, समझ सकते हो। उस वक्त मैं अपने अपाहिज बेटे के दर्द और उसकी तकलीफ़ को देखकर इतना टूट चुका था कि सही और गलत का एहसास ही खो बैठा था। मुझे बस अपने बच्चों के लिए एक माँ चाहिए थी। मैं चाहता था कि कोई उन्हें प्यार करे, उनका ख्याल रखे और उन्हें वह अपनापन दे सके, जिसकी कमी उनकी ज़िंदगी में रह गई थी।"
ठाकुर साहब की आवाज़ भारी हो गई।
"लेकिन इस कोशिश में मैंने तुम्हारी ज़िंदगी बर्बाद कर दी। मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ, बेटा। तुम्हें जो सज़ा देनी है, दे सकते हो। मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं।"
फिर उन्होंने माँ की तरफ देखा।
"और मोहिनी, आज के बाद मैं तुम पर कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं करूँगा। अगर तुम क्षितिज के साथ जाना चाहती हो, तो जा सकती हो। मैं अब अपनी पुरानी गलती दोबारा नहीं दोहराऊँगा। इस बच्चे का भी तुम पर उतना ही हक़ है, जितना ज्योति और चिराग का।"
इतना कहकर ठाकुर साहब कमरे से बाहर निकल गए।
उनके जाने के बाद कमरे में एक अजीब-सी खामोशी छा गई।
मैंने माँ की तरफ देखा। उनके चेहरे पर दर्द की एक नई लकीर उभर आई थी। शायद एक पत्नी के लिए अपने पति के मुँह से यह सुनना भी तकलीफ़देह था कि वह अब उसके साथ रहना नहीं चाहता या उसे रोकना नहीं चाहता।
मैं उनकी मनःस्थिति समझ सकता था। एक तरफ उनका खोया हुआ बेटा था, जिसे वह बरसों से ढूँढ़ रही थीं, तो दूसरी तरफ वह इंसान था जिसके साथ उन्होंने अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा बिताया था।
कुछ देर बाद मैंने धीरे से उनका हाथ थामा।
"माँ..."
वह मेरी तरफ देखने लगीं।
"तुम मेरे साथ चलोगी ना? नानी के पास? हम सब वहीं रहेंगे। अब से तुम मेरे साथ रहोगी। मैंने बहुत दिन तुम्हारे बिना गुज़ार दिए, माँ, लेकिन अब और नहीं। अब मैं तुम्हें खुद से दूर नहीं जाने दूँगा।"
मैं बोलता जा रहा था और माँ चुपचाप मेरी बातें सुनते हुए मेरे चेहरे को देख रही थीं।
उनकी आँखों में प्यार तो था, लेकिन साथ ही एक ऐसी उलझन भी थी, जिसे मैं समझ नहीं पा रहा था। शायद इतने सालों बाद अपने बेटे को अचानक पा लेने के कारण उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि उनकी ज़िंदगी सचमुच बदल चुकी है।
कुछ देर बाद उन्होंने मेरा हाथ दबाते हुए कहा,
"क्षितिज, मुझे कल अपनी माँ से मिलाने ले चलना।"
उनकी बात सुनते ही मेरे चेहरे पर खुशी फैल गई।
"हाँ, माँ! बिल्कुल। मैं आपको कल ही नानी के पास लेकर जाऊँगा। आप उनसे मिल लेना। उन्हें भी तो पता चलना चाहिए कि उनकी बेटी का बेटा अब बड़ा हो गया है।"
माँ हल्का-सा मुस्कराईं, लेकिन अगले ही पल उनकी आँखें फिर नम हो गईं।
"पता नहीं, बेटा, इतने सालों बाद वह मुझे देखकर क्या कहेंगी। मैंने उनसे भी तो कितने सालों तक कोई संपर्क नहीं रखा।"
"माँ, आप चिंता मत करो। वह आपकी माँ हैं। आपको देखकर वह भी खुश होंगी।"
मैंने उन्हें भरोसा दिलाया, फिर उनके कंधे पर सिर रख दिया।
उस रात हम दोनों देर तक बातें करते रहे।
माँ ने मुझसे मेरे बचपन के बारे में पूछा। मैंने उन्हें बताया कि मैंने कैसे अपने पिता के बिना ज़िंदगी गुज़ारी, कैसे हर जन्मदिन पर मन ही मन अपनी माँ के लौटने की उम्मीद करता था और कैसे हर बार वह उम्मीद टूट जाती थी।
मेरी बातें सुनते हुए माँ बार-बार रो पड़तीं और मुझे अपने सीने से लगा लेतीं।
"मुझे माफ़ कर दे, बेटा। मुझे नहीं पता था कि तू इतने दर्द में जी रहा है।"
मैं हर बार उन्हें यही कहता कि उनकी कोई गलती नहीं थी। उन्हें तो सच जानने ही नहीं दिया गया था।
लेकिन उस रात माँ भी मुझे अपने जीवन के कुछ ऐसे पहलुओं के बारे में बताती रहीं, जिनके बारे में मैंने कभी सोचा तक नहीं था।
रात काफी बीत चुकी थी, मगर हम दोनों की बातें खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं।
उधर ठाकुर साहब अपने कमरे में अकेले बैठे थे। उन्होंने अपना बैग पैक किया, कुछ ज़रूरी कागज़ रखे और फिर बिना माँ को बताए ड्राइवर को गाड़ी निकालने का आदेश दे दिया।
कुछ ही देर बाद वह घर से निकल गए।
ड्राइवर ने पूछा भी, "साहब, मैडम को भी साथ ले चलना है?"
ठाकुर साहब ने भारी आवाज़ में जवाब दिया, "नहीं। मैडम यहीं रहेंगी। उन्हें अब अपने फैसले खुद लेने दो।"
और फिर वह एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गए।
मुझे इस बात की कोई खबर नहीं थी।
मैं तो बस इस खुशी में डूबा था कि इतने सालों बाद मेरी माँ मेरे पास थीं और अगली सुबह मैं उन्हें नानी से मिलाने ले जाने वाला था।