Devil ki Daastaan in Hindi Women Focused by Sonam Brijwasi books and stories PDF | Devil की दास्तान - 57

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Devil की दास्तान - 57

(सन्नाटा… बाहर बारिश धीरे-धीरे गिर रही है। कमरे में हल्की पीली लाइट जल रही है। सिमरन अब सच जान चुकी है — कि वो “सीया” नहीं बल्कि “सिमरन” है। करन उसके सामने बैठा है… उसकी आँखों में डर, पछतावा और टूटन साफ़ झलक रही है।)

(उसकी आँखों में आँसू भरे हैं, होंठ काँप रहे हैं।।वो बोलने की कोशिश करता है पर शब्द नहीं निकलते।)

करन (टूटे हुए स्वर में) बोला - 
“सिमरन… अब… अब तुम चली जाओगी ना…
तुम मुझे छोड़ दोगी…”

(वो धीरे-धीरे सिमरन के पैरों के पास बैठ जाता है, जैसे एक बच्चा गलती के बाद माफ़ी माँग रहा हो। सिमरन उसे देखती है — पहली बार इतने कमजोर रूप में। वो जो हमेशा मज़बूत, ठंडा और रहस्यमयी था, आज उसके सामने टूटा हुआ था।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“करन जी…"

करन (रोते हुए, हकलाते शब्दों में) बोला - 
“मैंने तुमसे कुछ नहीं छिपाना चाहा था…
मैं बस तुम्हे बचाना चाहता था…
तुम्हारी यादें… तुम्हारे दर्द… वो सब तुमसे दूर रखना चाहता था…
पर अब सब खत्म हो गया…”

(उसकी आवाज़ में घुटन है। वो सिमरन के हाथ पकड़ता है और उसे अपनी आँखों से लगाता है।)

करन (बच्चों जैसी लरजती आवाज़ में) बोला - 
तुम मुझे छोड़कर मत जाना, सिमरन…
मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता…
तुम ही मेरी आख़िरी उम्मीद है…”

(सिमरन का दिल जैसे पिघल गया हो। वो करन को देखती है —
वो वही आदमी नहीं जो उससे झूठ बोलता था, वो एक टूटा हुआ इंसान था, जो सिर्फ़ प्यार चाहता था।)

(सिमरन धीरे-धीरे नीचे झुकती है, और करन के चेहरे को अपने हाथों से पकड़कर उसे अपने सीने से लगा लेती है।)

सिमरन (धीरे, सुकून भरे स्वर में) बोली - 
“शांत हो जाओ करन जी…
मैं कहीं नहीं जा रही… सुन रहे हो?”

(करन उसके सीने से लगकर बच्चों की तरह सिसकने लगता है।
उसके आँसू सिमरन की साड़ी को भिगो देते हैं। वो उसे और कसकर पकड़ लेता है, जैसे अगर छोड़ा तो सब खत्म हो जाएगा।)

(सिमरन उसके बालों में हाथ फेरती है, धीरे-धीरे lullaby जैसे सुर में बोलती है —
"अब कुछ नहीं होगा…सब ठीक होगा… बस रोओ मत…”

(करन सिमरन की गोद में सिर रखे हुए धीरे-धीरे शांत होता जाता है।
उसकी साँसें अब स्थिर हो रही हैं। सिमरन की आँखों में आँसू हैं —
पर उसके चेहरे पर एक नर्मी है, एक ऐसा भाव जो प्रेम और दया के बीच का है।)

(सिमरन फर्श पर बैठी है, करन उसकी गोद में सिर रखे सो गया है।
बारिश की आवाज़ कमरे में गूंज रही है। सिमरन खिड़की की ओर देखती है, और धीरे से फुसफुसाती है —)

सिमरन (धीरे, अपने आप से) बोली - 
“कभी-कभी सच्चाई इतनी भारी होती है…
कि नफरत भी रो पड़ती है…”

(कमरे में हल्की पीली लाइट। करन सो रहा है, उसका चेहरा थोड़ा दर्द में है। उसकी साँसें धीमी लेकिन अनियमित हैं। उसके हाथ पर हल्का सा चोट का निशान है, जिसे वो महसूस नहीं कर रहा।)

(सिमरन धीरे-धीरे उसके पास आती है। वो करन का हाथ देखती है।
उसके चेहरे पर चिंता झलकती है। वो अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर हल्के से करन के हाथ पर बांध देती है।)

सिमरन (धीमे स्वर में, अपने आप से) बोली - 
“ये दर्द… ये चोट… और तुम कुछ महसूस तक नहीं कर रहे…
मैं तुम्हें ऐसे दर्द में नहीं छोड़ सकती…”

(सिमरन हल्के से करन के हाथ को चूमती है। करन, नींद में ही, उसे अपनी ओर खींच लेता है। वो उसे अपने सीने से लगा लेता है।
सिमरन धीरे से अपने आँसू छुपाती है।)

सिमरन (धीरे से, फुसफुसाते हुए) बोली - 
“इतना डरते हो आप… मुझे खोने से…
कि मुझे कुछ याद ही नहीं आने दिया…
आप ऐसा कैसे सोच सकते हैं कि मैं आपसे दूर चली जाऊँगी?”

(करन नींद में भी उसके हाथ को कसकर पकड़ता है। उसका चेहरा अब हल्का शांत है, लेकिन उसके सपनों में भी उसका डर और प्यार दोनों झलक रहे हैं।)

(सिमरन उसके सीने से लगी रहती है, उसके आँसू उसकी साँसों के साथ गहराई से मिलते हैं। कमरा सन्नाटा है, सिर्फ़ उनके साँसों की आवाज़ और हल्की बारिश की आवाज़ बाहर से आती है।)

करन के हाथ में सिमरन का पल्लू बंधा हुआ है। सिमरन उसके चेहरे के पास सिर रखती है। दोनो का साइलेंट मोमेंट — प्यार और चिंता से भरा।

 (सिमरन करन के पास बिस्तर पर बैठी है। करन अब आधा जाग चुका है। उसका चेहरा अभी भी दर्द में है, लेकिन वो धीरे-धीरे सिमरन की आँखों में देखता है। सिमरन उसके हाथ से पल्लू हल्के से हटाती है और उसके हाथ पर हल्के से थपकी देती है।)

करन (धीमे स्वर में, नींद और दर्द के बीच) बोला - 
“सिम… तुम… क्यों…?”

सिमरन (धीरे से मुस्कुराते हुए, हल्की आवाज़ में) बोली - 
“क्योंकि मैं आपको अकेला नहीं छोड़ सकती।
आपका दर्द… आपकी चोट… ये सब मैं अपने सीने में नहीं सह सकती। और आपको डर लगता है कि मैं दूर चली जाऊँगी… मैं कभी दूर नहीं जाऊँगी। मैं आपके साथ हूँ।”

(करन अपने सिर को उसके कंधे पर रखता है। सिमरन उसके सिर पर हल्का हाथ फेरती है। कमरे में सन्नाटा है, सिर्फ़ हल्की बारिश की आवाज़ और उनके साँसों की धड़कनें।)

करन (धीमे से, फुसफुसाते हुए) बोला - 
“सिमरन… तुम हमेशा… इतनी मासूम हो…
और मैं… कभी भी… तुम्हें खोना नहीं चाहूंगा।”

सिमरन (धीरे से, अपने आप को उसके करीब कसते हुए) बोली - 
“और मैं भी… तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूंगी।
आप मेरी जिंदगी हो, करन जी…”

(करन अब पूरी तरह जाग जाता है। वो सिमरन की आँखों में देखता है। धीरे-धीरे उसका गुस्सा भी पिघल गया है। वो सिमरन को अपने सीने से कसकर लगाता है। सिमरन अब पूरी तरह शांत है, और धीरे-धीरे उसके आँसू सुख जाते हैं।)

सिमरन और करन एक-दूसरे से चिपके हुए हैं। बाहर बारिश रुक चुकी है, चाँदनी कमरे में हल्की रोशनी डाल रही है। दोनों के चेहरे पर राहत और प्यार की झलक है।