सिमरन करन के पास बिस्तर पर बैठी है। करन अब पूरी तरह जाग चुका है। सिमरन उसकी आँखों में देखती है, हल्की झिझक के साथ।)
सिमरन (हल्की आवाज़ में, जिज्ञासु और डरते हुए) बोली -
"पर… उस रात जब आपने मेरा खून पिया… उसके बाद मैं नहीं जागी। तो फिर… आपने मुझे कैसे ठीक किया?”
(करन उसके हाथ को अपने हाथ में लेता है। उसकी आँखों में गंभीरता और प्यार दोनों झलक रहे हैं।)
करन (धीमे और गंभीर स्वर में) बोला -
“सिम्मी… उस रात जब मैं तुम्हें जगाने की कोशिश कर रहा था,
और हर बार तुमने मना किया, मैं तुम्हें अपने सीने से लगाकर रो रहा था…तभी एक परछाई आई…”
(सिमरन हैरान होकर करन की ओर देखती है।)
करन (धीमे स्वर में, याद करते हुए) बोला -
“उसने कहा… कि वो तुम्हें ठीक कर देगी,
लेकिन तुम्हारी यादें… सब खत्म हो चुकी होंगी।
तुम्हें बचाने का कोई और तरीका नहीं था…
इसलिए मैंने माना… और उसने तुम्हें ठीक कर दिया।
लेकिन तुम्हें कुछ याद नहीं रहा… और मैंने भी नहीं चाहा कि तुम कुछ याद रखो।”
(सिमरन धीरे-धीरे करन की आँखों में देखती है। उसके चेहरे पर हल्का डर और फिर राहत की झलक है।)
सिमरन (धीरे से, भावुक होकर) बोली -
“तो… सब कुछ… आपने मेरे लिए किया… और मैं… कुछ भी नहीं जानती थी।”
करन (धीमे स्वर में, प्यार भरी आवाज़ में) बोला -
“हां… क्योंकि मैं कभी नहीं चाहता कि तुम्हें दर्द हो…
तुम्हारी मासूमियत… तुम्हारा प्यार…मेरे लिए सबसे कीमती है, सिम।
और मैं हमेशा तुम्हें बचाऊँगा, चाहे कुछ भी हो जाए।”
(सिमरन धीरे-धीरे उसके गले लग जाती है। करन उसे कसकर पकड़ लेता है। कमरे में सन्नाटा, सिर्फ़ हल्की बारिश की आवाज़ और उनके साँसों की धड़कनें। दोनों के चेहरे पर राहत और प्यार की झलक है।)
करन और सिमरन एक-दूसरे से चिपके हुए हैं। बाहर बारिश रुक चुकी है। चाँदनी कमरे में हल्की रोशनी डाल रही है।
हवा में अजीब सन्नाटा है। चाँद बादलों के पीछे छिपा है।
करन बालकनी में खड़ा है, हाथ में कॉफ़ी का मग है, और सामने आसमान की ओर देख रहा है। सिमरन कमरे में है, बिस्तर पर बैठी — जैसे किसी गहरे सोच में डूबी हुई।)
सिमरन (धीरे से खुद से) बोली -
“तो ये है मेरा अतीत…वही साया… वही खून… वही दर्द…
और वही करन जी… जिन्होंने मुझे मरने नहीं दिया…”
(उसकी आँखों में आँसू हैं, पर एक सुकून भी है। वो धीरे-धीरे खिड़की के पास आती है और करन को देखती है।)
सिमरन (धीरे से) बोली -
“अब जब सब याद आ गया है, तो डर लगता है कि कहीं ये शांति फिर तूफ़ान में न बदल जाए…”
( दूर पेड़ों की ओट में कुछ परछाइयाँ हिलती दिखती हैं। उनकी आँखें लाल हैं। वो करन की तरफ़ देख रही हैं।)
(एक अंधेरे जंगल में, पाँच–छह वैंपायर जैसे लोग खड़े हैं।
उनकी आँखें चमक रही हैं, और आवाज़ में नफ़रत झलक रही है।
सामने एक बूढ़ा वैंपायर बैठा है, जिसका नाम विक्रांत है — करन की बिरादरी का प्रमुख।)
विक्रांत (भारी आवाज़ में) बोला -
“तो करन ने फिर वही गलती दोहराई…”
दूसरा वैंपायर बोला -
“हाँ, उसने इंसान को बचाया… और वो भी उसे चूमकर उसकी यादें लौटा दीं…”
तीसरा वैंपायर (गुस्से में) बोला -
“अब वो लड़की सब जानती है… हमारे बारे में भी… उसके होने से हमारा रहस्य खतरे में है।”
विक्रांत (ठंडी मुस्कान के साथ) बोला -
“लड़की को मारने की ज़रूरत नहीं…
पहले उसके रक्षक को इतना तोड़ दो कि वो किसी को बचा ही न सके।”
(सब हँसते हैं — एक ठंडी, भयानक हँसी। उनकी आँखें और चमकने लगती हैं।)
विक्रांत बोला -
“करन को सज़ा मिलेगी — अतीत जानने की सज़ा।
अब उसे वो दर्द महसूस होगा…
जो उसने हमसे छिपाकर रखा था।”
(बिजली की गड़गड़ाहट। आसमान में लाल बादल।
विक्रा हाथ उठाकर कोई मंत्र बोलता है। उसकी हथेली से धुआँ निकलता है — जो आसमान की तरफ़ उड़ जाता है, सीधे करन की ओर।)
(करन बालकनी में खड़ा है। अचानक हवा का तेज़ झोंका आता है। उसके कपड़े उड़ते हैं, और उसकी आँखों में अजीब-सी चमक फैल जाती है। वो अपना सिर पकड़ लेता है, दर्द से कराह उठता है।)
करन (पीड़ा में) बोला -
“आह… ये… ये क्या हो रहा है…”
(सिमरन भागकर बाहर आती है।)
सिमरन (घबराकर) बोली -
“करन जी! क्या हुआ आपको? बोलो!”
(करन का शरीर काँप रहा है, उसकी नसें नीली पड़ गई हैं। उसकी आँखों से हल्की लपटें निकलने लगती हैं।)
करन (दर्द में) बोला -
“वो… वो लोग… आ गए…”
सिमरन (डर से काँपते हुए) बोली -
“कौन लोग?”
करन (कमज़ोर आवाज़ में) बोला -
“मेरी… बिरादरी… अब मुझे सज़ा देने आई है…”
(वो ज़मीन पर गिर पड़ता है। सिमरन उसे अपनी गोद में लेती है।
उसकी आँखों से आँसू गिर रहे हैं।)
सिमरन (रोते हुए) बोली -
“नहीं! आपने कुछ गलत नहीं किया करन जी!
आपने सिर्फ़ मुझे बचाया है… ये पाप नहीं, ये तो प्यार है!”
(बिजली चमकती है। बादलों के बीच में कई लाल आँखें झलकती हैं,
जो करन और सिमरन को देख रही हैं।)
टेक्स्ट स्क्रीन पर आता है -
“अब शुरू होगी सज़ा – अतीत जानने की सज़ा…”
(बाहर तेज़ बारिश हो रही है। कमरे में हल्की नीली रोशनी जल रही है। करन बिस्तर पर पड़ा है — पूरी तरह बेहोश। सिमरन उसके पास बैठी है, उसके माथे पर ठंडा पानी रख रही है। उसकी आँखें सूजी हुई हैं।)
सिमरन (कंपकंपाती आवाज़ में) बोली -
"करन जी... उठो ना... देखो, मैं यहीं हूँ... कुछ मत बोलो, बस आँखें खोलो..."
(वो उसके बालों में हाथ फेरती है, लेकिन करन की पलके हिलती भी नहीं। सिमरन घबरा जाती है, फोन उठाती है और डॉक्टर को बुलाती है।)
(दरवाज़ा खुलता है। डॉक्टर अंदर आती है, चेकअप किट के साथ।
सिमरन घबराई हुई खड़ी रहती है।)
डॉक्टर बोलीं -
“आप शांत हो जाइए, मैं देखती हूँ इन्हें…”
(डॉक्टर स्टेथोस्कोप लगाकर करन का ब्लड प्रेशर और नाड़ी चेक करती है। फिर उसकी आँखों में टॉर्च डालती है। कुछ सेकंड सोच में पड़ जाती है।)
सिमरन (बेचैन होकर) बोली -
“डॉक्टर, इन्हें क्या हुआ है? पहले तो सब ठीक था, फिर अचानक ऐसे कैसे गिर गए?”
डॉक्टर (गंभीर आवाज़ में) बोलीं -
“इनके दिमाग़ पर बहुत ज़्यादा प्रेशर पड़ा है।
लगता है कुछ ऐसा देखा या महसूस किया है जो इनके दिमाग़ ने सहन नहीं किया। अभी ये बेहोश हैं, पर जब जागेंगे… तब शायद मानसिक स्थिति पहले जैसी न रहे।”
सिमरन (हैरान होकर) बोली -
“मतलब…?”
डॉक्टर (धीरे से) बोलीं -
“मतलब ये… अब आठ साल के बच्चे जैसे बन चुके हैं।”
(सिमरन स्तब्ध खड़ी रह जाती है। उसकी आँखें चौड़ी हो जाती हैं।)
सिमरन बोली -
“क्या… आठ साल का बच्चा…?”
डॉक्टर बोलीं -
“जी। इन्हें किसी गहरे झटके ने भीतर से तोड़ दिया है।
अब इनका दिमाग़ वहीं रुक गया है जहाँ कभी मासूमियत थी — बचपन में। आपको अब इनका ध्यान एक माँ की तरह रखना होगा, पत्नी की तरह नहीं।”
(डॉक्टर सिमरन के कंधे पर हाथ रखती है।)
डॉक्टर बोलीं -
“मैं कुछ दवाइयाँ छोड़ रही हूँ, लेकिन इनकी हालत पूरी तरह मानसिक है…इन्हें प्यार और सुकून की ज़रूरत है।”
(वो चली जाती है। दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ गूँजती है। कमरे में फिर वही सन्नाटा फैल जाता है।)
(करन बिस्तर पर सोया है। सिमरन उसके पास बैठी है। उसके हाथ काँप रहे हैं। आँखों से लगातार आँसू बह रहे हैं।)
सिमरन (रोते हुए खुद से) बोली -
“काश… काश मैं वो राज़ कभी नहीं जानती…
काश मैंने उस साए की बातों पर यकीन नहीं किया होता…
तो आज मेरे करन जी… इस हालत में नहीं होते…”
(वो धीरे से करन का चेहरा सहलाती है। फिर खुद को रोक नहीं पाती और झुककर उसका माथा चूम लेती है। उसके आँसू करन के गाल पर गिरते हैं।)
सिमरन (सिसकते हुए) बोली -
“अब मैं आपको कुछ नहीं होने दूँगी करन जी…
आपके इस मासूम बचपन की कसम… मैं आपको फिर से ठीक करूँगी…चाहे मुझे खुद अतीत के अंधेरे में क्यों न जाना पड़े…”
(वो करन के सीने पर सिर रख लेती है। धीरे-धीरे उसकी सिसकियाँ सुनाई देती हैं। बिजली चमकती है, और खिड़की से एक परछाई उन्हें देखती है — वही “विक्रांत” की छाया।)
विक्रांत (धीरे से, दूर से) बोला -
“अब देखना सिमरन…कैसे एक प्रेमिका, एक माँ बनकर अपने ही श्राप से लड़ती है…”