आश्विन महीने की उजली रात थी। पूरी सोसायटी गरबा की ताल और झिलमिलाती रोशनी से जगमगा रही थी। ढोल की थाप और खेलैयों के उल्लास के बीच माहौल में एक अनोखा उत्सव छाया हुआ था। निशा के घर में भी सब गरबा खेलने जाने की तैयारी कर रहे थे।
निशा की बड़ी बहन अंजलि और उसकी माँ सुंदर चनिया-चोली पहनकर तैयार हो चुकी थीं। भाई भी अपने दोस्तों के साथ गरबा ग्राउंड की तरफ निकलने लगा था।
"निशा, तू भी चलना दो मिनट के लिए! दसवीं की परीक्षा है, हम समझते हैं, लेकिन आज तो पहला नवरात्र है," बड़ी बहन ने निशा को मनाने की कोशिश की।
"नहीं दीदी, आप लोग जाओ। मेरा दसवीं का सिलेबस काफी बाकी है। मैं घर पर ही रहकर पढ़ाई करूँगी," निशा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
दरवाजा बंद हुआ और परिवार बाहर चला गया। घर के हॉल में एक गहरा सन्नाटा छा गया। निशा अपने कमरे में पढ़ने बैठी, लेकिन उसके दिल में एक अनजाना डर और घबराहट थी। पता नहीं क्यों, लेकिन आज वह एक खौफ महसूस कर रही थी।
नवरात्रि के पहले ही दिन (मां शैलपुत्री के पूजन के दिन), जब पूरा समाज पवित्रता की आराधना कर रहा था, तभी एक पुरुष द्वारा निशा पर अमानवीय अत्याचार हुआ। निशा गहरे सदमे में चली गई और डर के मारे कांप उठी।
वह इंसान कोई बाहरी नहीं, बल्कि बेहद करीबी और अपना था। जिस इंसान पर पूरे परिवार को अंधविश्वास की हद तक भरोसा था, उसी ने निशा के विश्वास को तार-तार कर दिया था।
यह भयानक सिलसिला सिर्फ एक रात तक सीमित नहीं रहा। नवरात्रि के पूरे नौ दिनों तक, जब पूरा समाज मां जगदंबा की आराधना में लीन था और परिवार गरबा में व्यस्त था, तब निशा हर दिन अपने ही घर में नरक जैसी पीड़ा से गुजरती रही। निशा किसी से कुछ कह नहीं पा रही थी, क्योंकि वह इंसान इतना प्रभावशाली और अपना था कि निशा अगर बोलती भी, तो कोई उसकी बात पर यकीन नहीं करता।
पांचवां-छठा नवरात्र (मां स्कंदमाता और कात्यायनी): निशा के मन से अब डर की जगह तीव्र क्रोध और न्याय की भावना ने ले ली। उसने अपने आंसू पोंछ लिए और सोचा कि अब चुप रहना ही सबसे बड़ा अपराध है।
आठवें नवरात्र की रात जब वह अपने कमरे में अकेली रो रही थी, तब उसने सोचा, "अगर मां दुर्गा महिषासुर का संहार कर सकती हैं, तो मैं अपने ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठा सकती?"
निशा ने रोना पूरी तरह से बंद कर दिया। दसवीं कक्षा की चतुर छात्रा निशा ने शांत दिमाग से अपनी सुरक्षा और उसके असली चेहरे को बेनकाब करने का संकल्प लिया। उसने कमरे और हॉल में बेहद बारीकी से सीक्रेट डिजिटल कैमरा और ऑडियो रिकॉर्डर छुपा दिए और सारे सबूत इकट्ठा कर लिए। उसी रात उसने इन सबूतों की एक सीक्रेट फाइल अपनी बड़ी बहन अंजलि के ईमेल पर बैकअप के तौर पर भेज दी।
दशहरा का दिन आया—असत्य पर सत्य की विजय का पर्व।
सोसायटी में गरबा की आखिरी रात और रावण दहन का बड़ा कार्यक्रम था। जब वह करीबी पुरुष सोसायटी के मंच पर एक 'आदर्श व्यक्ति' के रूप में सम्मान प्राप्त कर रहा था, तब निशा ने दृढ़ संकल्प के साथ हाथ में माइक थाम लिया।
"आज दशहरा है," निशा की आवाज पूरे मैदान में गूंज उठी। "हम सब यहां लकड़ी के रावण का दहन करने इकट्ठा हुए हैं। लेकिन हमारे बीच ही मुखौटा पहनकर घूमने वाले इस असली रावण का क्या? जिस व्यक्ति को यह सोसायटी सज्जन मानती है, उसी ने नवरात्रि के नौ दिनों तक मुझ पर अत्याचार किया है!"
पूरी सभा में सन्नाटा छा गया। उस पुरुष का चेहरा डर से पीला पड़ गया। उसने गुस्से में निशा का फोन छीन लिया और उसे जमीन पर पटककर तोड़ दिया। "यह लड़की मानसिक रूप से बीमार है, इसकी बात पर ध्यान मत दो!" वह चिल्लाया।
लेकिन निशा अडिग रही। उसने मंच के पीछे कंट्रोल रूम में बैठी अपनी बड़ी बहन अंजलि की तरफ इशारा किया। अंजलि ने तुरंत अपने फोन से वही ईमेल बैकअप प्रोजेक्ट सिस्टम से कनेक्ट कर दिया।
बड़ी स्क्रीन पर उस पुरुष का भयानक असली चेहरा और उसकी करतूतों के सबूत पूरे समाज और परिवार के सामने चलने लगे। सोसायटी के लोगों में भारी गुस्सा फैल गया। निशा की सूचना पर पहले से ही आ पहुंची पुलिस ने उस व्यक्ति को मौके से ही गिरफ्तार कर लिया।
घटना के दो दिन बाद, निशा पुलिस स्टेशन की अंधेरी जेल की कोठरी के सामने खड़ी थी।
सलाखों के पीछे वह इंसान हाथ जोड़े, सिर झुकाए बेहद शर्मनाक हालत में बैठा था। उसकी सारी सामाजिक इज्जत, रुतबा और सत्ता धूल में मिल चुकी थी।
उसने धीरे से सिर उठाया। उसकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बह रहे थे।
वह चेहरा कोई और नहीं... निशा के अपने पिता का था।
"निशा... मुझे माफ कर दे बेटा..." पिता की आवाज कांप रही थी। "तूने मुझे कानून के हवाले कर दिया, मेरी पूरी प्रतिष्ठा खत्म कर दी। लेकिन तूने मुझे जान से क्यों नहीं मारा?"
निशा की आंखों में डर की जगह मां दुर्गा जैसा अटूट तेज और आत्मविश्वास था।
उसने बेहद शांत लेकिन कठोर आवाज में कहा, "आपकी जगह अगर कोई अनजान पुरुष होता, तो शायद मैं अलग तरीके से बदला लेती। लेकिन आप वो पिता हैं जिनका खून मेरी रगों में दौड़ता है। मौत तो बहुत आसान सजा है... वह तो एक पल में खत्म हो जाती है। लेकिन मैं चाहती थी कि आप जीते जी हर दिन मरें!"
पिता स्तब्ध होकर निशा की तरफ देखते ही रह गए।
निशा ने आगे कहा, "अब जेल की इन सलाखों के पीछे बिताया गया एक-एक पल, समाज की धिक्कार और आपकी अपनी ही नजरों में आपका गिरना—यही आपकी सजा है। आपने मेरा विश्वास तोड़ा, लेकिन मैं खुद को टूटने नहीं दूंगी।"
उसी पल, शुरुआत में सदमे में डूबी निशा की माँ ने आगे आकर अपने पति की ओर देखा और अपने हाथों की चूड़ियाँ उतारकर ज़मीन पर फेंक दीं। माँ ने साफ़ शब्दों में कह दिया, "ऐसे इंसान के साथ मेरा रिश्ता आज ही खत्म होता है। मेरी बेटी सच के रास्ते पर है और मैं हमेशा उसके साथ खड़ी रहूँगी।"
निशा और उसकी माँ वहाँ से विजयी भाव के साथ बाहर निकल आईं।
निशा ने अपनी आत्मा पर लगे घावों को कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उन्हें अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया। उसने दसवीं कक्षा में उत्कृष्ट अंक हासिल किए और आगे चलकर एक ऐसी निडर कानूनी विशेषज्ञ बनी, जिसने देश की हजारों पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाया।
जिस बेटी को उसके अपने पिता ने तोड़ने की कोशिश की थी, वही निशा आज आत्मसम्मान और साहस की ऐसी मिसाल बन गई कि पूरा देश उसके नाम पर गर्व करने लगा।