The Dark Station - Part 9 in Hindi Horror Stories by Shahroz khan books and stories PDF | अँधेरे वाला स्टेशन - भाग 9

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अँधेरे वाला स्टेशन - भाग 9

भाई, मैं तुम्हें सच बता रहा हूँ, अगर उस रात तुम मेरी जगह होते ना, तो शायद डर के मारे वहीं पटरियों पर गिर कर अपनी जान दे देते। मेरी सांसें इतनी तेज़ चल रही थीं कि मुझे लग रहा था मेरा सीना अभी फट जाएगा। पसीने से मेरी पूरी शर्ट भीग चुकी थी, और वो पसीना ठंडा था... बिल्कुल बर्फ जैसा। मेरे हाथ-पैर ऐसे कांप रहे थे जैसे शरीर से खून ही निचोड़ लिया गया हो। आप खुद सोचो यार, मैं एक छब्बीस साल का सीधा-साधा वेब डेवलपर हूँ, जिसका काम सिर्फ अपने लैपटॉप पर उंगलियां चलाना है। मुझे तो ठीक से दौड़ना भी नहीं आता। मैं तो बस अपनी यूपी से बिहार जाने वाली उस एक्सप्रेस ट्रेन के थर्ड एसी कोच में बैठकर चुपचाप अपना काम कर रहा था। मुझे क्या पता था कि वो ट्रेन मुझे मौत के इस खौफनाक और अनजान वेटिंग रूम में लाकर पटक देगी।

मेरे ठीक आगे रवि दौड़ रहा था। वही रवि, वो रहस्यमयी इंसान जो ट्रेन में मेरे सामने वाली मिडिल बर्थ पर बैठा था, जिसकी आवाज़ में एक अजीब सी खामोशी और गहराई थी। मुझे उस वक्त उस पर बेतहाशा गुस्सा भी आ रहा था और उसी से सबसे ज़्यादा डर भी लग रहा था। लेकिन मेरी मजबूरी ये थी कि इस अँधेरे और खौफनाक स्टेशन पर वो अकेला शख्स था जो रास्ता जानता था। ये वो स्टेशन था जो किसी भी नक्शे पर नहीं था।

"कबीर, तेज़ चलो! और गलती से भी पीछे मुड़कर मत देखना," रवि की आवाज़ उस भयानक सन्नाटे को चीरते हुए गूंजी। उसकी आवाज़ में अभी भी कोई घबराहट नहीं थी, बस एक अजीब सी चेतावनी थी।
अब देखो यार, इंसानी फितरत ही ऐसी होती है। जब कोई आपसे कहता है कि पीछे मत देखना, तो आपका दिमाग सबसे पहले वही करने को कहता है। मैंने पीछे देखा... और कसम से, मेरी रूह कांप गई। वो जो परछाइयां प्लेटफॉर्म पर लाल बत्ती और धुंध के बीच हमारा इंतज़ार कर रही थीं और ट्रेन के दरवाज़े पीट रही थीं... वो अब सिर्फ परछाइयां नहीं थीं। वो लोग... या जो भी वो शैतानी साये थे, वो हमारे पीछे आ रहे थे। उनके पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे, वो हवा में तैरते हुए किसी भूखे जानवर की तरह हमारी तरफ बढ़ रहे थे। धुंध के बीच से मैंने उनके चेहरे देखे... उनके चेहरों पर आंखें नहीं थीं, सिर्फ गहरे काले गड्ढे थे जिनमें से लाल रंग की एक खौफनाक रोशनी निकल रही थी। और उनके जबड़े ऐसे खुले हुए थे जैसे वो मुझे ज़िंदा चबा जाना चाहते हों।
मेरे गले से एक चीख निकल गई, जो रोने जैसी लग रही थी। मैंने रवि को आवाज़ लगाई और कहा कि वो लोग आ रहे हैं, अब हम कहाँ जाएंगे। रवि ने बिना मेरी तरफ देखे, उसी शांत अंदाज़ में कहा कि हमें स्टेशन मास्टर के केबिन में जाना होगा। उसने बताया कि वही आखिरी जगह है जहाँ से मुझे वापस जाने का टिकट मिल सकता है। लेकिन उसने मुझे एक सख्त हिदायत दी कि वहाँ मुझे जो भी दिखे, उस पर बिल्कुल यकीन मत करना क्योंकि वो मेरा दिमाग भटकाने की कोशिश करेगा।

हम प्लेटफॉर्म के अंत में बने एक बहुत ही पुराने, जंग खाए हुए लोहे के फुट-ओवर ब्रिज पर चढ़ने लगे। वो ब्रिज इतना पुराना और कमज़ोर लग रहा था कि हर कदम पर उसके टूटने की आवाज़ आ रही थी। सीढ़ियों पर कुछ अजीब सा चिपचिपा लिक्विड गिरा हुआ था। जब मेरा पैर उस पर फिसला, तो मैंने देखा कि वो खून था। बिल्कुल ताज़ा, गाढ़ा और काला खून, जिसमें से सड़े हुए गोश्त जैसी बदबू आ रही थी। मेरी हिम्मत जवाब दे रही थी। मेरा दिल कर रहा था कि मैं वहीं बैठ जाऊं और रोने लगूं। लेकिन मेरे कानों में उन शैतानों के फुसफुसाने की आवाज़ें आ रही थीं, जो अब ब्रिज की सीढ़ियां चढ़ना शुरू कर चुके थे।

जैसे-तैसे हम ब्रिज पार करके दूसरी तरफ उतरे। वहां घुप्प अँधेरे में एक छोटा सा, टूटा-फूटा लकड़ी का केबिन बना हुआ था। उसकी छत आधी टूट चुकी थी और दीवारों पर काई जमी थी। केबिन के बाहर एक धुंधला सा बोर्ड लटक रहा था, जिस पर अजीब से लाल रंग से लिखा था- 'स्टेशन मास्टर'।

रवि ने एक ज़ोरदार धक्के से वो लकड़ी का दरवाज़ा खोला। एक डरावनी चरमराती आवाज़ के साथ दरवाज़ा खुला और हम दोनों अंदर घुस गए। रवि ने झटके से दरवाज़ा बंद कर दिया और अंदर से एक भारी लोहे की कुंडी लगा दी। अंदर बहुत ज़्यादा अँधेरा था। सीलन और खून की बदबू इतनी तेज़ थी कि मुझे उल्टियां आने लगीं। मैंने अपनी नाक पर कसकर हाथ रख लिया। वहां सिर्फ एक कोने में एक पुरानी सी लालटेन जल रही थी, जिसकी पीली रोशनी बुरी तरह कांप रही थी। उस रोशनी में मैंने देखा कि कमरे के बीचों-बीच एक बड़ी सी पुरानी लकड़ी की टेबल रखी है। उस टेबल पर कुछ पुराने, धूल खाए हुए रजिस्टर पड़े थे।

और उस टेबल के पीछे एक पुरानी कुर्सी पर एक आदमी बैठा हुआ था। उसकी पीठ हमारी तरफ थी। उसने रेलवे का पुराना काले रंग का कोट पहना हुआ था, जो जगह-जगह से फटा हुआ था। रवि दो कदम आगे बढ़ा और बहुत ही ठंडी आवाज़ में बोला, "मास्टर जी..."

कमरे में एक भयानक खामोशी छा गई। मुझे अपने दिल की धड़कनें अपने कानों में बहुत तेज़ सुनाई दे रही थीं। वो कुर्सी बहुत धीरे-धीरे घूमी। और भाई, जैसे ही मैंने उस स्टेशन मास्टर का चेहरा देखा, मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। मेरा दिमाग पूरी तरह सुन्न पड़ गया। मैं कुछ पलों के लिए सांस लेना ही भूल गया।

वो चेहरा किसी अजनबी का नहीं था। वो मैं था! हाँ, उस कुर्सी पर मैं खुद बैठा हुआ था! लेकिन वो मैं होकर भी मैं नहीं था। उस दूसरे 'कबीर' का चेहरा बिल्कुल सफेद पड़ चुका था, जैसे उसके शरीर में एक बूंद भी खून ना हो। उसकी आँखें पूरी तरह से सफेद थीं, उनमें कोई पुतली नहीं थी। और उसके होठों पर एक ऐसी खौफनाक और शैतानी मुस्कुराहट थी, जिसे देखकर मेरी हड्डियों का पानी सूख गया।
उस दूसरे कबीर ने बहुत ही भयानक आवाज़ में कहा कि मैं आ गया हूँ। उसकी आवाज़ बिल्कुल मेरी तरह थी, लेकिन उसमें एक ऐसी गूंज थी जो सीधे मेरी आत्मा को चीर रही थी। उसने कहा कि इस स्टेशन पर आने के बाद कोई वापस नहीं जाता, ये सफर मेरा ही था और मेरी मंज़िल भी यही है।
मेरा दिमाग फटने लगा था।

मैं पागलों की तरह रवि की तरफ मुड़ा और चिल्लाया कि ये क्या मज़ाक है, ये मैं कैसे हो सकता हूँ, मैं तो यहाँ खड़ा हूँ। रवि ने मेरी तरफ बहुत ही उदास नज़रों से देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी दया थी। उसने गहरी साँस ली और मुझे वो सच बताया जिसे मैं मानना नहीं चाहता था। उसने याद दिलाया कि ये स्टेशन मैप पर नहीं है और ये सिर्फ उनके लिए रुकती है, जिनका सफर खत्म हो चुका होता है।
मैं रोने लगा और पूछने लगा कि इसका मतलब क्या है। रवि ने बताया कि जब ट्रेन ने वो अचानक से झटके वाली ब्रेक मारी थी, तब असल में कोई सिग्नल नहीं था। ट्रेन पटरी से उतर गई थी और मैं उस हादसे में बच नहीं पाया था। मेरा सफर वहीं खत्म हो गया था।

मैं चीख पड़ा। मेरे आंसू बहने लगे। मुझे अपने घर की, अपने परिवार की याद आने लगी। मैं अपना लैपटॉप, अपना वेब डेवलपमेंट का करियर, अपनी पूरी ज़िंदगी ऐसे खत्म नहीं कर सकता था। मैंने चिल्लाकर कहा कि मैं ज़िंदा हूँ, मैं सांस ले रहा हूँ।
उस स्टेशन मास्टर रूपी कबीर ने धीरे से टेबल पर रखा एक लाल रंग का पुराना, खून से सना टिकट मेरी तरफ सरकाते हुए कहा कि मैं ज़िंदा नहीं हूँ, मैं बस अपनी मौत को मानने से इंकार कर रहा हूँ। उसने मुझसे वो टिकट लेने और अपने डर को अपनाने को कहा, क्योंकि उस टिकट पर मेरा नाम था और अब वही अँधेरा मेरा घर था।

मैंने उस टिकट की तरफ देखा। उस पर काले और लाल रंग से कुछ अजीब सी भाषा में मेरा नाम लिखा था। मुझे लगा जैसे कोई अदृश्य ताकत मेरे हाथों को उस टिकट की तरफ खींच रही है। मेरा दिमाग सुन्न हो चुका था। तभी बाहर से दरवाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से धक्के पड़ने लगे। वो परछाइयां अंदर आने के लिए दरवाज़ा तोड़ रही थीं।

रवि ने झटके से मेरा कंधा पकड़ा और मुझे झकझोरते हुए चिल्लाया कि मैं उसकी बातों में ना आऊं और उस टिकट को ना छुऊं। उसने कहा कि अगर मैंने उस टिकट को उठा लिया, तो मैं हमेशा के लिए इसी लूप में फंस जाऊंगा। रवि ने बताया कि मैं अभी मरा नहीं हूँ, मैं कोमा में हूँ और अपनी ज़िंदगी के लिए लड़ रहा हूँ। उसने पास रखी लालटेन उठाई और मुझसे कहा कि मैं उस लालटेन को टिकट पर फेंक दूं और उसे जला दूं, क्योंकि वापस जाने का यही एक तरीका था।

दरवाज़े की कुंडी टूटने ही वाली थी। दरवाज़े के बीच में एक दरार पड़ गई थी और उस दरार से एक लंबा, सड़ा हुआ काला हाथ अंदर आ चुका था जो हवा में मुझे टटोल रहा था। स्टेशन मास्टर कबीर अपनी कुर्सी से खड़ा हो गया। उसने अपना मरा हुआ, सफेद चेहरा मेरे बिल्कुल करीब लाते हुए फुसफुसाया कि अगर मैंने उस टिकट को जलाया तो मैं आग में जलकर राख हो जाऊंगा, इसलिए मुझे उसे उठा लेना चाहिए ताकि मेरा सारा दर्द खत्म हो जाए।

मेरे हाथ बुरी तरह कांप रहे थे। एक तरफ वो मौत का टिकट था, जो मुझे इस भयानक दर्द से शांति देने का झूठा वादा कर रहा था। दूसरी तरफ रवि था, जो मुझे लालटेन पकड़ा रहा था। और पीछे दरवाज़ा टूट रहा था, जहाँ से मौत अंदर घुसने वाली थी। रवि पूरी ताकत से चिल्लाया कि मैं लालटेन फेंक दूं। मैंने अपनी आँखें बंद कीं, रवि के हाथ से लालटेन छीनी, और अपनी पूरी बची हुई ताकत लगाकर उसे उस शैतानी टिकट और उस स्टेशन मास्टर की तरफ दे मारा। शीशे के टूटने और आग भड़कने की तेज़ आवाज़ के साथ सब कुछ एक पल में जलने लगा, और फिर एक गहरा, अंतहीन सन्नाटा छा गया।