अब तक
मिस्टर विक्रम जबरदस्ती फ़ना को वाइन पिला दिए। जिससे फ़ना का गला जलने लगा और कड़वाहट के कारण उसे खांसी आने लगी। विक्रम भारद्वाज फ़ना के साथ बिल्कुल भी नरम नहीं थे। वह डर से कांप रही थी, उनकी गोद में बैठी बैठी।
मिस्टर भारद्वाज ने एक बार फिर से फ़ना के गाल पर अपने होंठ रख दिए।
उसके बाद उन्होंने फ़ना की गर्दन पर जैसे ही अपनी उंगलियां फैरी, फ़ना ने धीरे से कहा, " सर"
अब आगे-
मिस्टर भारद्वाज ने जैसे ही फ़ना की सुराही दार गर्दन पर अपनी उंगलियों को फेरना स्टार्ट किया, फ़ना ने सहमते हुए धीरे से कहा, "सर,
फ़ना की आवाज कांप रही थी। फ़ना को डरते हुए देखकर मिस्टर भारद्वाज ने फ़ना की गर्दन को रब करना बंद नहीं किया। फ़ना को वहां पर पेन हो रहा था, क्योंकि मिस्टर भारद्वाज ने उस रात को उसकी गर्दन पर बहुत सारे निशान दिए थे और उनके पकड़ने के निशान भी, उसकी गर्दन पर कुछ यूं बने हुए थे कि आज तक दिख रहे थे वह।
फ़ना बहुत ज्यादा डरी हुई थी। वह मिस्टर भारद्वाज के लेप पर बैठी हुई थी। वहां पर मौजूद हर किसी की नजरे फ़ना से हटी हुई थी। फ़ना की तरफ कोई नहीं देख रहा था।
फ़ना ने नोटिस किया कि जब से वह मिस्टर भारद्वाज की गोद में बैठी हुई है, किसी भी शख्स ने उसे ऊपर से नीचे तक नहीं ताड़ा।
वरना जिस तरीके की बद्दी स्माइल सब उसे दे रहे थे। फ़ना के रोंगटे खड़े हो रहे थे। उसे लग डर था कि कहीं फिर उसके साथ कोई जबरदस्ती ना करें।
फ़ना दिल से मासूम कमजोर लड़की थी। लोगों से डील करना नहीं आता था उसे, क्योंकि यह कम उम्र का भोलापन कहे या फिर मजबूरी की वजह से।
मिस्टर भारद्वाज चुपचाप ड्रिंक कर रहे थे। फ़ना से उन्होंने ड्रिंक सर्व करने के लिए कहा। फ़ना ने डरते हुए उनकी गिलास में ड्रिंक सर्व किया। मिस्टर भारद्वाज ने उसका फेस ऊपर किया और अपनी ड्रिंक की गिलास से फ़ना को भी ड्रिंक पिलाने लगा। फ़ना ने आज से पहले कभी भी ड्रिंक नहीं पी थी। जिस वजह से उसका गला जलने लगा। वह इतनी कड़वी थी कि फ़ना को उल्टी आने लगी। लेकिन डर था या फिर मिस्टर भारद्वाज की जबरदस्ती थी। जिस वजह से उसने उस गिलास में जितनी ड्रिंक थी सारी फिनिश कर दी।
मिस्टर भारद्वाज ने फ़ना के मुंह से गिलास हटाया और उसे अपने मुंह से लगाकर, बची हुई ड्रिंक खत्म कर दी।
फ़ना खांस रही थी और उसके गले में इतनी जलन हो रही थी कि उसने जल्दी से पानी का गिलास उठाया और उसे पूरा फिनिश कर दिया।
मिस्टर भारद्वाज ने अपनी गर्दन को टर्न कर फ़ना का फेस देखा और फ़ना का चिन्ह पकड़कर उसे अपनी तरफ किया और उसके गीले होठों पर अपने होंठ रख दिए। फिर झटके से, वह उससे दूर हो गया। उन्होंने फ़ना को भी अपनी गोद से उतार दिया और फिर उसके बालों में हाथ फेरते हुए, उसके कान में कुछ ऐसा कहा, जिससे फ़ना चौक गई। उसके बाद मिस्टर भारद्वाज वहां से चले गए
मिस्टर भारद्वाज के जाने के बाद फ़ना अभी तक वहीं पर खड़ी हुई थी, क्योंकि उस आदमी ने उसे किसी गंदी चीज की तरह खुद से दूर कर दिया था। फ़ना को एंब्रेस फील हो रहा था। लेकिन वह इतना कुछ सह चुकी थी कि कोई बड़ी बात नहीं थी। इसलिए वह बेइज्जती का घूंट पीते हुए वापस से अपने काम में लग गई। वही मैनेजर ने यह नजारा देखा था कि मिस्टर भारद्वाज को इस लड़की में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी है और शायद वह यहां पर रोज-रोज सिर्फ इसके लिए ही आ रहे है। क्योंकि मिस्टर भारद्वाज महीने या साल में सिर्फ एक बार आते थे, यहां पर जब डील होती थी।
लेकिन मिस्टर भारद्वाज को दो दिन हो गए थे, लगातार आते हुए और यह कोई इत्तेफाक नहीं था। मैनेजर भी यह समझ चुका था।
मैनेजर के दिमाग में खतरनाक प्लान पलने लगा था। उसकी नजर फ़ना के कच्ची उम्र की तरफ थी। शायद मिस्टर भारद्वाज को इसकी कच्ची जवानी रास आ गई। जिस वजह से वह इसके पीछे हैं और एक दो बार इसे पाने के बाद वह इसे छोड़ भी देंगे और अब मैनेजर को तय करना था कि उसे फ़ना को उससे कैसे करना है, क्योंकि फ़ना उनके लिए बेहतरीन प्लान हो सकती थी।
फ़ना के दिमाग में इधर कुछ ओर ही चल रहा था। उसके दिमाग में तो सिर्फ डॉक्टर की कही गई बातें चल रही थी कि अगर तुमने जल्द से जल्द पैसों का इंतजाम नहीं किया, तो तुम्हारे भाई को बचाना मुश्किल हो जाएगा। फ़ना की आंखों में रह रहकर आंसू आ रहे थे कि वह 15 लख रुपए का इंतजाम कहां से करें और उसके बाद मेडिसिंस के लिए, जो पैसे चाहिए, वह कहां से लेकर आएगी। उसके पास कोई प्रॉपर्टी नहीं थी। उसके चाचू ने सब कुछ उसके पापा का हड़प लिया था और उन्हें बेघर कर दिया था। उन्हें इतनी भी दया नहीं आई थी कि इतने बुरे वक्त में फ़ना कहां जाएगी। उसके चाचू ने धोखे से यह साबित कर दिया कि फ़ना और उसकी पूरी फैमिली मर चुकी है, एक्सीडेंट में।
फ़ना को तो अपनों से पहले ही धोखा मिला हुआ था और अब इतनी बड़ी मुसीबत उसके सर पर थी। उसके साथ, जो जबरदस्ती हुई थी। उसके बाद तो टूट कर बिखरना। फिर भी वह 19 साल की लड़की अभी तक खड़ी थी।
फ़ना के हाथ कांपने लगे। फ़ना के पास अभी 10 दिन का टाइम था और उसका दिमाग अभी से ही नहीं चल रहा था। धीरे-धीरे रात के 3:00 बज गए थे और अभी तक फ़ना वहीं ही थी। 4:00 बजे से ही वह घर चली जाएगी और जाकर उसे थोड़ा आराम भी करना था।
अभी उसे फीवर आ गया था। अगेन उसने पेन किलर खाकर किसी तरीके से मैनेज किया। उसकी बॉडी फिर से दर्द करने लगी थी।
फ़ना को अभी भी चलने में दिक्कत हो रही थी और शायद 5 दिन तक ऐसा ही चलने वाला था। इसलिए फ़ना इस पर ज्यादा गौर भी नहीं करती। 4:00 बजने का वेट करते हुए, फ़ना आकर अपने कपड़े चेंज करने लगी। जैसे ही वह चेंजिंग रूम से बाहर आई, मैनेजर ने फ़ना को देखते हुए कहा, "good, तुम बहुत अच्छा काम कर रही हो।"
मैनेजर को अचानक से अपने सामने देखकर फ़ना घबरा जाती है। मैनेजर ने फ़ना को देखते हुए कहा, "तुम थोड़ा जल्दी आ जाया करो।"
फ़ना ने मैनेजर को देखते हुए कहा, "लेकिन मैं जल्दी नहीं आ सकती।"
"पर तुम जल्दी क्यों नहीं आ सकती, अगर जल्दी आओगी, तो तुम्हें और ज्यादा बोनस मिलेगा।
"देखिए, मैं एक होटल में काम करती हूं, वेट्रेस का, डे शिफ्ट में, इसलिए मैं रात को ही बाहर आ सकती हूं।" यह सुनकर मैनेजर का मुंह बन गया।
वह नहीं चाहता था कि मिस्टर भारद्वाज फ़ना के देर से आने की वजह से यहां पर आना ही बंद कर दे।
फिलहाल के लिए मैनेजर फ़ना को कुछ भी नहीं बोलता और फ़ना वहां से चली जाती है।
घर पहुंच कर फ़ना सबसे पहले बेड पर गिर गई और सो गई। उसे इतनी तेज नींद आ रही थी कि उसकी आंखें भी नहीं खुल रही थी और 3 घंटे बाद उठकर उसे काम पर जाना था।
निशु, जो अभी तक सो रही थी, वह धीरे से उठकर बैठ गई। उसने फ़ना को चेक किया। वह जानती थी कि फ़ना नाइट शिफ्ट में काम करती है।
पर इसका मतलब यह नहीं था कि वह लापरवाह हो जाए।
निशु ने फ़ना के बदन को टच किया। आज फिर से उस को फीवर था। निशु फ़ना को हक करके लेट गई और फ़ना के बालों में हाथ फेरने लगी। वह फना को फील कराना चाहती थी, अपनापन और फ़ना भी उसे कर लेती है और चैन से सो जाती। निशु की भी दोबारा आंख लग गई। फ़ना हड़बड़ा कर उठ गई और उसने टाइम देखा। सिर्फ 30 मिनट बचे थे। अगर वह आज लेट हो गई होटल पहुंचने के लिए, तो उसे एंट्री नहीं दी जाएगी और ऐसा ना हो कि मैनेजर भड़क कर उसे काम से ही निकाल दे। इसलिए वह जल्दी से तैयार होने लगी।
किसी तरह फ़ना ने जल्दी जल्दी अपने कपड़े पहने और फिर वह बिना कुछ खाए वहां से निकल गई।
फ़ना पूरा दिन होटल में काम करती थी। लेकिन दिमाग से उसके यह नहीं जा रहा था कि उसे अपने भाई को कैसे बचाना है।
उसे कुछ भी क्यों न करना पड़े, वह करेगी। उसका भाई धीरे-धीरे ठीक होने लगा, थोड़ा, अचानक से वह कैसे बीमार हो गया और इतना बड़ा खर्चा सोच सोच कर फ़ना की जान निकल रही थी।
थकी हारी फ़ना टेबल पर ही बैठ गई थी। थोड़ी देर रेस्ट करने के लिए इस वक्त पर किसी ने उसकी शिकायत कर दी।
वहां एक वेट्रेस थी, जो फ़ना की खूबसूरती से जलती थी। फ़ना इतनी खूबसूरत थी कि वहां पर कुछ लोग उसे टिप दे दिया करते थे, एक्स्ट्रा, जो फ़ना को हेल्प करती थी।
कल्याण ने तो फ़ना को अपने साथ बैठकर खाने के लिए भी इनवाइट किया था, क्योंकि फ़ना भले ही वेट्रेस का काम करती थी, लेकिन वह दिखने में बड़े घर आने की लगती थी और उसकी खूबसूरती इतनी ज्यादा थी कि वह लोगों को अट्रैक्ट कर लेती थी।
जो दूसरी वेट्रेस थी, उसने जलन की वजह से फ़ना की शिकायत कर दी थी। मैनेजर जाकर फ़ना को गुस्से से उठाता है। फ़ना उन्हें देखकर चौंक जाती है और जल्दी से हड़बड़ा कर, खड़ी होकर अपना सर झुका कर बोली, "सॉरी सर, मुझे नहीं मालूम चला कि मेरी कब आंख लग गई।"
मैनेजर गुस्से से फ़ना को देख रहा था। पर फ़ना को वह कुछ बोलता नहीं है, क्योंकि फ़ना की वजह से यहां पर अब भीड़ होने लगी थी। कुछ लड़के थे, जो फ़ना की वजह से यहां पर जानबूझकर आकर, कुछ ना कुछ आर्डर करते थे। उससे बात करने की कोशिश करते थे। फ़ना नहीं जानती थी कि वह हर जगह से यूज हो रही है। वह इतनी मासूम थी कि लोगों की चाल में फंस जाती थी और उसे, जो भी कहा जाता था, कर लेती थी।
कुछ दूसरी वेटर्स को इतनी जलन हुई और गुस्सा आया कि मैनेजर ने फ़ना को डांटा क्यों नहीं और उसे काम से निकाल क्यों नहीं दिया।
फ़ना तो खुश थी कि मैनेजर ने गुस्से से उसे काम से नहीं निकाला। फ़ना दिल लगा कर अपना काम करती थी। रोज की तरह वह दोबारा से ऑटो लेकर बाहर की तरफ चली गई और बाहर पहुंच कर फ़ना ने अपने कपड़े चेंज किए।
वह वापस से काम पर लग गई, रोज की तरह। वह फिर से लोगों को ड्रिंक सर्व कर रही थी और हैरानी वाली बात तो यह थी कि आज मिस्टर भारद्वाज उससे पहले आए हुए थे। वह वहां पर बैठा अपने खाली गिलास को घूर रहा था। फ़ना जल्दी से उसके पास आई। उसने जैसे ही उसके गिलास में ड्रिंक सर्व की, मिस्टर भारद्वाज ने अपनी तीखी नजरों से फ़ना की तरफ देखा। फ़ना को देखते ही उनकी आंखें नॉर्मल हो गई। एक पल के लिए तो फ़ना की सांस ही अटक गई थी। मिस्टर भारद्वाज ने फ़ना को वापस से खींच कर अपनी लैप पर बैठा लिया। फ़ना ने हिलने ढूंढने की कोशिश नहीं की।
मिस्टर भारद्वाज आज गुस्से से फ़ना को घूर रहे थे, क्योंकि फ़ना ने, जो ड्रेस पहनी थी, वह इतनी रिवीलिंग थी कि फ़ना की क्लीवेज, उसकी कमर, उसकी नवल, यहां तक की उसके घुटने, थाई तक नजर आ रही थी।
मिस्टर भारद्वाज ड्रिंक कर रहे थे और फ़ना जैसे ही उनका गिलास खाली हो जाता, उसमें दोबारा ड्रिंक सर्व कर देती।
आसपास के लोग भी यह नोटिस कर रहे थे कि मिस्टर भारद्वाज अब रोज बार आने लगे हैं।
वही फ़ना के काम से आसपास की लड़कियों को उस से जलन हो रही थी। क्योंकि मिस्टर भारद्वाज किसी को भी अपने आसपास भटकने की इजाजत नहीं देते। वह हमेशा एक प्राइवेट मीटिंग करते थे, लेकिन अब वह उनके बीच में बैठकर ड्रिंक कर रहे हैं। शायद इसकी वजह सिर्फ और सिर्फ फ़ना थी
मिस्टर भारद्वाज ने अपनी गर्दन घुमाई और फ़ना की गर्दन पर अपने होंठ रखकर जोर से बाइट कर ली, जिससे फ़ना की आह निकल गई। "आह्ह."
फ़ना की चीख सुनकर सभी का फोकस उस तरफ हुआ और मिस्टर भारद्वाज की आंखों को देखकर सभी ने अपनी नज़रें नीचे झुका ली और ऐसा रिएक्ट किया, जैसे उन्होंने कुछ देखा ही नहीं।
इधर फ़ना डर से कांप रही थी कि मिस्टर भारद्वाज कहीं उसके साथ फिर से वही सब तो नहीं करना चाहते। उसे वह दर्दनाक रात याद आ गई। जिस दिन वह गिड़गिड़ा रही थी, माफी मांग रही थी, चीख रही थी, लेकिन कुछ भी नहीं सुनाई दे रहा था, इस आदमी को। यह बस खुद में ही लगा हुआ था।
मिस्टर भारद्वाज ने उस दिन उसे जो पनिश किया था और उनकी पनिशमेंट इतनी खतरनाक थी कि फ़ना की रूह कांप रही थी।
मिस्टर भारद्वाज फ़ना की गर्दन पर बाइट कर रहे थे और फ़ना चुपचाप यह बर्दाश्त कर रही थी। फ़ना की आंखों से आंसू आ गए।
उसके होंठ कांपने लगे। मिस्टर भारद्वाज ने अपने होठों को जब पीछे लिया तो उन्होंने फ़ना की गर्दन पर उस लव बाइट को देखा, जिसे देखकर उनके होठों पर अजीब सी मुस्कान आ गई।
मिस्टर भारद्वाज ने फ़ना को देखते हुए, उसके कान में कहा, "जाकर अभी के अभी अपने यह कपड़े चेंज करके आओ, वरना मैं इन्हें यहीं पर फाड़ दूंगा।"
मिस्टर भारद्वाज की धमकी सुनकर फ़ना इतना ज्यादा घबरा जाती है कि वह जल्दी से खड़ी हुई और फिर भाग कर, वहां से उस छोटे से कमरे में आ गई, जहां पर उसके कपड़े रखे हुए थे।
फ़ना जल्दी-जल्दी उन कपड़ों को पहनने लगी। फ़ना के वह कपड़े कुछ खास नहीं थे। उन कपड़ों को वह दो-चार दिन में चेंज करती रहती थी।
फ़ना वह कपड़े पहन कर बाहर आई। लेकिन मिस्टर भारद्वाज की तरफ, वह अपने कदम नहीं बढ़ा पा रही थी।
मिस्टर भारद्वाज ने अपनी पैनी नजरों से फ़ना की तरफ देखा और आंखों से उसे अपनी तरफ आने का इशारा किया। तो फ़ना की अभी हिम्मत कहां थी कि वह पीछे हट जाए।
इसलिए वह डरते हुए अपने धीमे-धीमे कदम मिस्टर भारद्वाज की तरफ बढ़ा रही थी। उनकी नज़रें फ़ना की लड़खड़ाती हुई चाल पर थी।
फ़ना श्री भारद्वाज के पास जैसे ही आई, मिस्टर भारद्वाज ने अपनी लेप की तरफ इशारा किया और बोला, "अच्छी बच्ची बनो और जो कहा है, वह करो।"
फ़ना घबराते हुए मिस्टर भारद्वाज के पास आई और फिर उनकी गोद में बैठ गई।
फना के हाथ में ड्रिंक की बोतल थी। मिस्टर भारद्वाज बार-बार फ़ना की गर्दन पर किस कर रहे थे और लव बाइट का निशान दे रहे थे उसे। जब भी वह अपनी ड्रिंक का एक गिलास खत्म करते, वह फ़ना की गर्दन पर जोर से काटते।
जिससे फ़ना की आह निकल जाती। लग रहा था जैसे मिस्टर भारद्वाज को फ़ना को परेशान करके मजा आ रहा हो।
फ़ना को यह समझ नहीं आ रहा था कि मिस्टर भारद्वाज ने उसके कपड़े क्यों चेंज करवा दिए।
वही रमन गुस्से से आग बबूला हो गया था। फ़ना मिस्टर भारद्वाज की प्रॉपर्टी थोड़ी है, जो सिर्फ वही मजे लेंगे।