Ankaha sach (Part - 7) in Hindi Fiction Stories by Vishakha Pareek books and stories PDF | अनकहा सच (भाग -7)

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अनकहा सच (भाग -7)

हितेश के यह कहने पर कि "मैं चलता हूँ...", राजू ने सहमी और शर्मिंदा आँखों से उसकी तरफ देखा और धीमी आवाज़ में बस इतना ही कह पाया, "ह्म्म्म..."
हितेश अपनी बाइक उठाकर चला गया।
उसके जाते ही राजू का दिल टूट गया। उसे बेहद बुरा लग रहा था। यही तो वह सबसे बड़ा कारण था जिसकी वजह से राजू हितेश को अपने घर और परिवार के बारे में कुछ नहीं बताना चाहता था। राजू को हमेशा से लगता था कि उसके घर के इस खौफनाक माहौल और पिता की हरकतों की वजह से ही आज तक उसका कोई दोस्त नहीं बन पाया। उसे डर था कि अगर हितेश को यह सब पता चल गया, तो उसकी यह अकेली दोस्ती भी टूट जाएगी।
हितेश के जाने के बाद राजू बहुत परेशान हो उठा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब वो क्या करे? कैसे सब ठीक करे? ओर फिर घर की बिखरी हुई हालत देखकर वह चुपचाप अपने कमरे में चला गया और सिर पकड़कर बैठ गया।
घर का हंगामा अब शांत हो चुका था। कुछ देर बाद राजू की बहन कमरे में आई। उसने राजू के कंधे पर हाथ रखा।राजू ने उसकी तरफ देखा और राजू के अंदर छुपा दर्द आँसुओं के रूप में बह निकला। वह अपनी बहन के कंधे पर सिर रखकर फूट-फूटकर रोने लगा। बहन भी अपनी आँखों के आँसू पोंछते हुए उसे संभालने की कोशिश कर रही थी।
राजू के रोने की आवाज़ सुनकर उसकी माँ भी कमरे में आ गई। उन्होंने राजू के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और सहलाते हुए बोलीं, "कोई बात नहीं बेटा... सब ठीक हो जाएगा। तू चिंता मत कर, सब ठीक है।"
राजू ने अपनी नम आँखों से माँ की तरफ देखा और भारी आवाज़ में पूछा, "आप ठीक हैं माँ?"
माँ ने जबरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा, "हाँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ।"
राजू ने तड़पकर पूछा, "पर क्यों माँ? हमारे ही घर में यह सब क्यों होता है? हम कब तक यह सब सहेंगे?"
माँ के पास इस 'क्यों' का कोई जवाब नहीं था। उन्होंने बस राजू को सीने से लगा लिया।
दिवाली की छुट्टियों के जितने भी दिन बीत रहे थे, उनमेंरोज वही शराब, वही हंगामा और वही चीख-पुकार... राजू को रोज यह सब झेलना पड़ रहा था। इसलिए ही वह गाँव वापस नहीं आना चाहता था।
छुट्टियों के बीच एक दिन राजू अपनी बहन के पास बैठा था। उस घटना को बीते तीन से चार दिन हो चुके थे। तभी उसकी बहन ने हितेश के बारे में राजू से पूछा
राजू खामोश हो गया और सिर्फ इतना ही कहा कि उस दिन के बाद हमारी बात नहीं हुई....
तब बहन ने राजू से कहा, "तुझे एक बार हितेश से मिलना चाहिए राजू। उस दिन के बाद से न तो तुमने उससे बात की है और न ही उससे मिले हो।"
राजू ने उदास होकर कहा, "मुझे डर लग रहा है बहन... शायद वह अब मुझसे बात ही नहीं करना चाहता। वह समझ गया होगा कि मैं किस तरह के घर से आता हूँ।"
बहन ने उसे समझाते हुए कहा, "तुम कॉल तो करो उसे! क्या पता तुम ज़रूरत से ज़्यादा सोच रहे हो? एक बार बात करके तो देखो..."
बहन के काफी समझाने के बाद, राजू ने भारी मन से अपना फोन उठाया और हितेश का नंबर मिलाने लगा...