Ankaha sach (Part - 8) in Hindi Fiction Stories by Vishakha Pareek books and stories PDF | अनकहा सच (भाग-8)

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अनकहा सच (भाग-8)

बहन के समझाने के बाद राजू ने कांपते हाथों से हितेश का नंबर मिलाया।
फोन की घंटी बजी और सामने से हितेश ने फोन उठा लिया। शुरुआत के कुछ सेकंड दोनों तरफ सिर्फ गहरी खामोशी छाई रही। राजू की हिम्मत ही नहीं हो रही थी कि वो कुछ बोल पाए, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे।
तभी हितेश ने ही खामोशी तोड़ते हुए कहा, "अरे! कैसा है भाई? चुप क्यों है? फोन क्या मेरी साँसें सुनने के लिए किया है? या अब फोन पे तेरी तेज़ चलती साँसें सुनूँ मैं?!"
हितेश का यह अंदाज़ सुनकर राजू के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई। उसने धीमे स्वर में कहा, "सॉरी यार उस दिन के लिए..."
"कौन सा दिन?" हितेश ने अनजान बनते हुए पूछा।
राजू हितेश के अनजानेपन को समझ कर बात आगे बढ़ाते हुए बोला...
"अरे वही... उस दिन जब तू घर आया था और वो सब हो गया..." राजू ने झिझकते हुए कहा।
हितेश ने तुरंत माहौल को हल्का करते हुए मज़ाकिया लहज़े में कहा, "अरे वो! हां यार, तुझे सॉरी तो बोलना ही चाहिए! तूने उस दिन मुझे बिना चाय-बिस्किट खिलाए भगा दिया था! कम से कम बिस्किट तो खिला ही देता ना भाई!" 
हितेश हँसने लगा। राजू हैरान होकर बोला, "क्या कह रहा है तू?"
बिस्किट मांग रहा हु भाई खाने को जो तूने उस दिन नहीं खिलाए....अब खिला दे। ( हितेश ने मजाक को आगे बढ़ाते हुए कहा)
बिस्किट....क्या कह रहा हैं यार हितेश तू भी न पागल ही हैं सच में ( राजू ने हल्की मुस्कान के साथ कहां)
"अरे कुछ नहीं कह रहा यार! तू क्यों फालतू की टेंशन ले रहा है? कहाँ दिमाग लगा रहा है तू भी!" हितेश ने गंभीर होते हुए कहा, "तुझे क्या लगा, मैं तुझसे नाराज़ हूँ? पागल है क्या तू! तूने ऐसा क्या किया जो मैं तुझसे नाराज़ हो जाऊँगा? बात इसलिए नहीं हो पाई क्योंकि दिवाली का टाइम हैं, घर के कामों में लगा रहता हूं। और फिर उस दिन तेरे घर का माहौल देखकर मुझे लगा कि फोन पर नहीं, मिलकर ही आराम से बात करेंगे।"
हितेश की बातें सुनकर राजू के सीने से जैसे पहाड़ जैसा बोझ उतर गया। उसका दिल हल्का हो गया कि उसका दोस्त उससे दूर नहीं हुआ है, उनकी दोस्ती आज भी कायम है।
राजू ने हिम्मत करके हितेश को अपने पिता की शराब की लत और घर के बिगड़े हालातों के बारे में सब सच-सच बता दिया।
सब सुनने के बाद हितेश ने कहा, "अच्छा... तो इसीलिए तू गाँव या घर का नाम सुनते ही उखड़ा-उखड़ा रहता था!"
राजू ने धीमी आवाज़ में कहा, "हाँ..."
हितेश ने थोड़ा सोचते हुए संभलकर पूछा, "यार राजू... एक बात बता, बुरा मत मानना लेकिन...एक बात कहूं....नशे की लत तो ठीक है, पर तेरे पापा का बर्ताव कुछ अलग ही लग रहा था। मतलब... थोड़ा दिमागी तौर से... क्या वो हमेशा से ऐसे ही हैं?"
राजू ने एक गहरी सांस ली और पुरानी यादों में खोते हुए कहा, "नहीं... पहले वे ऐसे बिल्कुल नहीं थे, बिल्कुल ठीक थे। जब मैं सात साल का था, तब तक की यादें मुझे धुंधली-धुंधली याद हैं... तब वे ऐसे नहीं थे।"