dhadkne dil ki in Hindi Love Stories by Shravan Gore books and stories PDF | धड़कने दिल की - 6

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धड़कने दिल की - 6

काले, बदबूदार बोरे के भीतर सांस लेना किसी जलते हुए तवे पर फेफड़े रखने जैसा था। गाड़ी के झटकों से आदित्य का सिर बार-बार एसयूवी के लोहे के फर्श से टकरा रहा था। मुंह में खून का नमकीन स्वाद था और घुटने की चोट से रिसता दर्द हर धड़कन के साथ दिमाग की नसों को फाड़ रहा था।
गाड़ी अचानक एक तेज झटके के साथ रुकी। बाहर समंदर की सड़ी हुई काई, कीचड़ और खारे पानी की तीखी गंध हवा में तैर रही थी। यह माहिम क्रीक का वही इलाका था, जहां शहर का कचरा और इंसानों के गुनाह एक साथ दफनाए जाते थे।
"उतारो साले को!" कबीर की भारी, गुर्राती हुई आवाज आई।
दो जोड़ी बेरहम हाथों ने आदित्य के कॉलर को पकड़ा और उसे कीचड़ से भरी जमीन पर फेंक दिया। चेहरे से बोरा झटके से खींचा गया।
सामने एक विशालकाय, जर्जर लोहे का ढांचा खड़ा था—**वेयरहाउस नंबर १२**। टीन की पुरानी चादरें हवा के थपेड़ों से चरमरा रही थीं। चारों तरफ टूटी हुई नावें, जंग लगे कंटेनर और घुप अंधेरा था। सिर्फ वेयरहाउस के मुख्य गेट पर एक पीला, टिमटिमाता हुआ बल्ब झूल रहा था, जिसके इर्द-गिर्द पतंगे मंडरा रहे थे।
आदित्य को घसीटते हुए अंदर ले जाया गया। अंदर का सन्नाटा बाहर की हवा से भी ज्यादा डरावना था।
विशाल गोदाम के बीचों-बीच, छत से लटकती एक लोहे की जंजीर के सहारे दो कुर्सियां बंधी थीं। एक कुर्सी पर वह थी।
**सिया।**
उसके हाथ पीछे बंधे थे। बाल पसीने और धूल से लथपथ थे। चेहरे पर बाईं तरफ एक गहरा नीला निशान था, जैसे किसी ने उसे बेरहमी से थप्पड़ मारा हो। उसकी आंखों की पट्टी खुल चुकी थी। आदित्य को खून से लथपथ देखकर उसकी सांसें जैसे गले में ही अटक गईं।
"आदित्य!" सिया के हलक से एक फटी हुई, बेबस चीख निकली। उसकी आंखें छलक पड़ीं। "नहीं... तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था! मैंने कहा था ना कि दूर रहो इस सब से!"
"चुप रह!" विक्रांत ने पीछे से सिया के बालों को कसकर खींचते हुए डांटा।
आदित्य को दूसरी कुर्सी पर पटक दिया गया और उसके दोनों हाथ लोहे की ठंडी जंजीरों से पीछे बांध दिए गए। दर्द की एक तेज लहर उसकी रीढ़ से होकर गुजरी, लेकिन उसकी नजरें सिर्फ सिया के चेहरे पर टिकी थीं।
"तुम ठीक हो, सिया?" आदित्य ने हांफते हुए पूछा, उसके होंठों से खून की एक पतली लकीर बह निकली।
सिया ने आंसुओं के बीच सिर हिलाया। उसकी नजरों में गजब का अपराधबोध था, मानो आदित्य की इस हालत की जिम्मेदार वो खुद हो। "सॉरी आदित्य... मेरी वजह से तुम इस मौत के कुएं में आ फंसे।"
"इतना इमोशनल ड्रामा देखकर तो मेरी आंखों में आंसू आ जाएंगे," कबीर अंधेरे से निकलकर रोशनी के घेरे में आया। उसके हाथ में एक भारी स्टील का कटर था। वह बहुत इत्मीनान से अपनी कलाई की महंगी घड़ी देख रहा था।
"रात के ठीक ग्यारह बजने में अभी बीस मिनट बाकी हैं," कबीर ने एक खाली ड्रम पर लात मारते हुए कहा। ड्रम की गूंज पूरे वेयरहाउस में गूंज उठी। "और मेरे डैड तथा तुम्हारे परम पूज्य चाचाजी—प्रोफेसर जोशी, ठीक ग्यारह बजे यहां पहुंचेंगे। वो अपनी आंखों से इस जगह को जलते देखना चाहते हैं।"
कबीर आगे बढ़ा और उसने आदित्य के सीने पर अपनी उंगली से ठोका। "लेकिन उससे पहले... मुझे वो चाहिए जिसके लिए तुम दोनों ने इतना बड़ा तमाशा खड़ा किया।"
कबीर ने अपनी जेब से वही पुरानी, भूरे रंग की लेदर डायरी निकाली।
आदित्य और सिया दोनों की सांसें एक पल के लिए थम गईं। वह डायरी कबीर के हाथ में थी।
"तुम सोच रहे होगे कि मुझे यह मिल गई तो खेल खत्म?" कबीर ने एक शैतानी मुस्कान के साथ डायरी को हवा में लहराया। फिर उसका चेहरा अचानक गुस्से से तमतमा उठा। उसने डायरी का वो आखिरी पन्ना फाड़कर आदित्य के मुंह पर मारा, जिस पर माहिम क्रीक का नक्शा बना था।
"सालो! मुझे बेवकूफ समझते हो?!" कबीर दहाड़ा। "इस नक्शे के नीचे लिखा था कि ओरिजिनल फाइलों का सेफ लॉकर इसी वेयरहाउस के बेसमेंट में है। लेकिन उस वॉल्ट को खोलने के लिए एक **डिजिटल पेनड्राइव और छह अंकों का मास्टर पासवर्ड** चाहिए! और वो पासवर्ड तुम्हारे उस अधमरे बाप ने इसी डायरी में किसी सीक्रेट कोड में छिपाया है!"
कबीर ने सिया की गर्दन को अपनी हथेली में जकड़ लिया। "बोल! कहां है वो पासवर्ड? वो कौन सा पेज है? अगर ग्यारह बजे से पहले मुझे वो पासवर्ड नहीं मिला, तो तेरे बाप का जो ऑक्सीजन मास्क अस्पताल में लगा है ना, उसका प्लग खींचने में मुझे एक सेकंड भी नहीं लगेगा!"
"मुझे नहीं पता!" सिया दर्द से तड़पते हुए चिल्लाई। "पापा ने मुझे कभी कोई कोड नहीं बताया! खुदा की कसम, मुझे सिर्फ इस नक्शे के बारे में पता था!"
"झूठ!" कबीर ने स्टील का कटर उठाया और सिया के चेहरे की तरफ बढ़ाया। "एक मिनट के अंदर सच बाहर नहीं आया, तो तुम्हारा यह खूबसूरत चेहरा ऐसा बना दूंगा कि आइना भी तुम्हें देखकर चीख पड़ेगा!"
"कबीर, छोड़ उसे!" आदित्य जंजीरों को झटकते हुए गरजा। लोहे की कड़ियों ने उसकी कलाइयों की चमड़ी छील दी, लेकिन उसे अपने दर्द का कोई होश नहीं था। "तुझे कोड चाहिए ना? मुझे पता है वो पासवर्ड कहां है!"
कबीर का हाथ हवा में रुक गया। उसने मुड़कर आदित्य को देखा। उसकी आंखों में एक संशय भरी चमक उभरी।
"तू? एक अदना सा फोटोग्राफर... तुझे कैसे पता होगा?"
"क्योंकि वो डायरी दोपहर से शाम तक मेरे पास थी," आदित्य ने अपनी सांसों को नियंत्रित करते हुए झूठ बोला। उसका दिमाग इस वक्त किसी सुपरकंप्यूटर की तरह दौड़ रहा था। उसे सिर्फ वक्त चाहिए था। घड़ी की सुइयां ग्यारह की तरफ बढ़ रही थीं। "मैंने उस डायरी का एक-एक पन्ना बहुत ध्यान से देखा था। उसमें पहले पन्ने पर जो लाइब्रेरी का पुराना बारकोड और डेट स्टैम्प है... वही उस वॉल्ट का मास्टर कोड है।"
कबीर ने अपनी आंखें सिकोड़ीं। उसने डायरी का पहला पन्ना पलटा। वहां सच में सेंट जेवियर्स की लाइब्रेरी का एक धुंधला सा छह अंकों का स्टैम्प लगा था।
"विक्रांत!" कबीर चिल्लाया। "बेसमेंट का शटर खोल और सिस्टम में यह नंबर डालकर देख! अभी!"
विक्रांत तेजी से वेयरहाउस के पिछले हिस्से में बने लोहे के भारी शटर की तरफ भागा।
कबीर भी कुछ कदम पीछे हटा और अपने फोन पर किसी का नंबर मिलाने लगा। वह दोनों से कुछ दूरी पर था।
वेयरहाउस के उस ठंडे कोने में, जंजीरों में बंधे आदित्य और सिया एक बार फिर आमने-सामने थे।
सिया ने आंसुओं भरी नजरों से आदित्य को देखा। उसने फुसफुसाते हुए कहा, "आदित्य... तुमने झूठ क्यों बोला? अगर वो कोड गलत निकला, तो कबीर तुम्हें उसी वक्त गोली मार देगा।"
"मुझे पता है वो कोड गलत है," आदित्य ने बहुत धीमी आवाज में कहा। उसके होंठ बमुश्किल हिल रहे थे। "लेकिन मुझे कबीर का ध्यान भटकाना था। सिया, मेरी बात बहुत ध्यान से सुनो। मेरे कुर्ते की बाईं जेब में एक छोटा सा लेंस-क्लीनिंग ब्लेड है। जब वो मुझे खींच रहे थे, मैंने उसे अपनी जेब के कोने में खिसका लिया था।"
सिया की आंखें चौंककर बड़ी हो गईं।
"तुम्हारी कुर्सी मेरे ठीक पीछे है," आदित्य ने फुसफुसाया। "अपनी बंधी हुई उंगलियों से मेरी बाईं जेब को टटोलो। हमें चाचाजी और धनराज के यहां पहुंचने से पहले इन रस्सियों को काटना होगा।"
सिया ने बिना वक्त गंवाए अपनी बंधी हुई हथेलियों को पीछे फैलाया। दोनों की कुर्सियां एक-दूसरे से सटी हुई थीं। सिया की कांपती उंगलियों ने आदित्य के कुर्ते के कपड़े को छुआ। हवा में कबीर के फोन पर बात करने की भारी आवाज गूंज रही थी— *"हां डैड, हम बेसमेंट का ताला खोल रहे हैं... आप बस पहुंचते ही आग लगाने की तैयारी रखिए।"*
सिया की उंगलियों को जेब के अंदर एक बहुत बारीक, नुकीली धातु का सिरा महसूस हुआ। उसने अपने नाखूनों के सहारे उस छोटे से ब्लेड को बाहर खींचा।
ब्लेड बेहद छोटा था, लेकिन धारदार था। सिया ने आदित्य की कलाई पर बंधी नायलॉन की रस्सी पर ब्लेड को घिसना शुरू किया।
हर सेकंड एक सदी जैसा लग रहा था। रस्सी के रेशे धीरे-धीरे कट रहे थे, लेकिन साथ ही ब्लेड का सिरा आदित्य की कलाई की नस को भी छू रहा था। खून की गर्म बूंदें सिया की उंगलियों पर टपक रही थीं।
"दर्द हो रहा है?" सिया ने कांपते हुए फुसफुसाया।
"काटती रहो," आदित्य ने दांत भींचते हुए कहा। उसकी नजरें कबीर पर टिकी थीं, जो पीठ फेरे फोन पर बात कर रहा था।
तभी बेसमेंट की तरफ से विक्रांत की चीख सुनाई दी।
"कबीर भाई! सिस्टम एरर दिखा रहा है! यह कोड गलत है! लाल बत्ती जल गई है, सिर्फ एक अटेंप्ट बचा है वरना सिस्टम हमेशा के लिए लॉक हो जाएगा!"
कबीर ने झटके से अपना फोन काटा। उसके चेहरे पर एक खूंखार, पागलपन भरा गुस्सा छा गया। उसने अपनी कमर में खोंसी हुई काली रिवाल्वर निकाली और तेजी से आदित्य की तरफ बढ़ा।
"तूने मुझसे मजाक किया, हरामी?!" कबीर की चीख वेयरहाउस की टीन की छत को चीरती हुई निकली। उसने रिवाल्वर का ट्रिगर खींचा और बैरल सीधे आदित्य के माथे पर टिका दी। "तेरा खेल यहीं खत्म!"
'क्लिक!'
उसी एक सेकंड में, आदित्य की कलाई की आखिरी रस्सी कट गई।
आदित्य ने अपनी पूरी जिंदगी की ताकत अपनी दोनों बाहों में समेट ली। उसने अपनी कटी हुई हथेलियों को जंजीर से छुड़ाया और बिजली की तेजी से कबीर की कलाई को पकड़कर ऊपर की तरफ मोड़ दिया।
'धांय!'
गोली चली और छत की टीन की चादर को फाड़ती हुई निकल गई।
कबीर सन्न रह गया। उसे उम्मीद नहीं थी कि अधमरा सा दिखने वाला यह साधारण लड़का इतनी ताकत से पलटवार करेगा। आदित्य ने अपने सिर से कबीर की नाक पर जोरदार टक्कर मारी।
कबीर के मुंह से चीख निकली और वह लड़खड़ाकर पीछे गिरा। रिवाल्वर उसके हाथ से छूटकर दूर कीचड़ में जा गिरी।
"विक्रांत! पकड़ साले को!" कबीर जमीन पर गिरते हुए चिल्लाया।
विक्रांत हाथ में लोहे की रॉड लेकर बेसमेंट से बाहर की तरफ दौड़ा। लेकिन आदित्य अब रुकने वाला नहीं था। उसने तेजी से घूमकर सिया की कुर्सी की रस्सियों को उसी ब्लेड से एक ही झटके में काट दिया।
"भागो सिया!" आदित्य चिल्लाया।
सिया अपने पैरों पर खड़ी हुई, लेकिन घंटों बंधे रहने की वजह से उसके पैर सुन्न पड़ चुके थे। वह गिरते-गिरते बची। आदित्य ने उसे अपनी बांहों में संभाला।
तभी विक्रांत सामने आ धमका। उसने पूरी ताकत से लोहे की रॉड आदित्य के सिर की तरफ घुमाई। आदित्य ने सिया को पीछे धकेला और खुद नीचे झुक गया। रॉड हवा को चीरती हुई पास के एक लोहे के खंभे से टकराई—'झनन्न!'
आदित्य ने आव देखा न ताव, उसने जमीन पर पड़ा वही भारी स्टील का कटर उठाया और विक्रांत के पैर पर दे मारा। विक्रांत दर्द से कराहते हुए घुटनों के बल गिर पड़ा।
"दरवाजे की तरफ!" आदित्य ने सिया का हाथ पकड़ा।
दोनों मुख्य गेट की तरफ भागे। लेकिन जैसे ही वे गेट के मुहाने पर पहुंचे, उनके कदम अपनी जगह पर ऐसे जम गए मानो सामने मौत का साक्षात फरिश्ता खड़ा हो।
गेट के बाहर तीन बड़ी लक्जरी गाड़ियां आकर रुकी हुई थीं। गाड़ियों की तेज, सफेद हेडलाइट्स ने पूरे वेयरहाउस के मुहाने को दिन की तरह रोशन कर दिया था।
उन गाड़ियों से छह हथियारबंद गार्ड्स बाहर निकले।
और उनके ठीक पीछे से दो शख्स बहुत धीमे, सधे हुए कदमों से रोशनी के घेरे में आए।
आगे था **धनराज महाजन**।
और उसके ठीक बगल में, चेहरे पर वही सफेद कड़क कुर्ता, आंखों पर सोने का चश्मा और हाथ में एक भारी, पुराना लकड़ी का बक्सा लिए खड़े थे... **प्रोफेसर वी. के. जोशी**।
चाचाजी की नजर जब सामने खून से लथपथ आदित्य पर पड़ी, तो उनके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी। न कोई पछतावा था, न कोई ममता।
वहां सिर्फ एक सर्द, घिनौनी मुस्कान थी।
"अरे आदित्य..." चाचाजी की आवाज उस सन्नाटे में किसी जहरीले सांप की फुसफुसाहट जैसी लगी। "तुझे मैंने कोडिंग सिखाई, फोटोग्राफी सिखाई... लेकिन अपने बड़ों के रास्ते से हटना नहीं सिखा पाया। बड़े अफसोस की बात है।"
"चाचाजी..." आदित्य की आवाज में नफरत का ऐसा लावा था जो शायद उसने कभी महसूस नहीं किया था। "आप इस हद तक गिर सकते हैं? उस पुल हादसे में जो अस्सी लोग मरे थे... उनकी चीखें आपको सोने कैसे देती हैं?"
चाचाजी ने एक ठंडी हंसी हंसे। "पैसा और ताकत जब साथ चलते हैं ना मेरे बच्चे, तो चीखें दब जाती हैं। और वैसे भी, आज रात के बाद न तो वो चीखें रहेंगी, न वो फाइलें... और न ही तुम दोनों।"
चाचाजी ने अपनी जेब से एक रिमोट निकाला। उस पर एक लाल बत्ती जल रही थी।
"वेयरहाउस के हर कोने में आरडीएक्स और पेट्रोल के ड्रम फिट किए जा चुके हैं," चाचाजी ने बहुत शांत आवाज में कहा, जैसे कॉलेज में कोई साधारण सा लेक्चर दे रहे हों। "ठीक ग्यारह बज चुके हैं। अब तुम दोनों अपनी उस डायरी और सच के साथ इसी आग में राख बन जाओगे।"
कबीर पीछे से उठकर आ गया था। उसके चेहरे से खून बह रहा था। "डैड! वो फाइलें बेसमेंट में ही हैं! पहले वो पासवर्ड—"
"फाइलों की अब जरूरत नहीं है, कबीर," धनराज ने आगे बढ़कर अपने बेटे के कंधे पर हाथ रखा। "जब यह पूरी इमारत ही बारूद से उड़ जाएगी, तो जांच करने वाले सिर्फ राख ढूंढ पाएंगे। चलो यहां से।"
चाचाजी ने रिमोट का बटन दबाने के लिए अपना अंगूठा ऊपर उठाया।
सिया ने डर के मारे आदित्य का हाथ अपनी दोनों हथेलियों में भींच लिया। चारों तरफ हथियारबंद गार्ड्स थे, पीछे कबीर और विक्रांत, और सामने बारूद का रिमोट लिए खुद उसका सगा चाचा। बचने का एक भी रास्ता नहीं दिख रहा था।
लेकिन तभी—
अंधेरे समंदर की तरफ से, क्रीक के पानी को चीरती हुई तीन विशाल, नीली-लाल बत्तियां चमकीं।
'हू-हू-हू-हू!'
मुंबई पुलिस की पेट्रोलिंग स्पीडबोट्स के भयानक सायरन ने पूरे इलाके के सन्नाटे को एक झटके में उड़ा दिया। और उसी पल, वेयरहाउस के पिछले टूटे हुए टीन के छज्जे से दर्जनों हथियारबंद कमांडो रस्सियों के सहारे नीचे कूदने लगे।
"मुंबई पुलिस! सब अपने हथियार नीचे फेंक दो! पूरा इलाका चारों तरफ से घिर चुका है!" लाउडस्पीकर पर एक गूंजती हुई आवाज आई।
धनराज और कबीर के चेहरे का रंग उड़ गया। गार्ड्स में भगदड़ मच गई।
चाचाजी के हाथ से वो रिमोट छूटते-छूटते बचा। उनकी नजरें पागलों की तरह चारों तरफ घूमने लगीं। "यह... यह पुलिस यहां कैसे आई?!"
आदित्य के चेहरे पर, उस खून और पसीने के बीच, पहली बार एक सुकून भरी, रहस्यमयी मुस्कान उभरी।
उसने अपने फटे हुए कुर्ते की भीतरी जेब से एक बहुत बारीक तार खींचा। उसके सीने पर, दिल के ठीक ऊपर, उसका पुराना एनालॉग विंटेज कैमरा नहीं था... बल्कि उस विंटेज कैमरे के कवर के अंदर छिपा एक आधुनिक, हाई-डेफिनिशन लाइव ट्रांसमीटर और माइक लगा हुआ था।
"चाचाजी..." आदित्य ने अपनी लहूलुहान उंगलियों से उस ट्रांसमीटर को दिखाया। "आपने मुझे फोटोग्राफी सिखाई थी, लेकिन यह भूल गए कि एक सच्चा फोटोग्राफर सिर्फ तस्वीरें नहीं लेता... वो सच को रिकॉर्ड भी करता है। पिछले आधे घंटे से आपकी, कबीर की और महाजन की एक-एक बात सीधे मुंबई पुलिस कमिश्नर के कंट्रोल रूम में लाइव ब्रॉडकास्ट हो रही थी।"
चाचाजी की आंखें खौफ से बाहर निकल आईं। उनका पूरा शरीर कांपने लगा।
लेकिन तभी—घिरे हुए कबीर ने पागलों की तरह जमीन पर पड़ी वो काली रिवाल्वर झपटी।
"अगर मैं बर्बाद हुआ... तो तुम भी जिंदा नहीं बचोगे!" कबीर ने पूरी नफरत के साथ रिवाल्वर का मुंह सीधे सिया के सीने की तरफ तान दिया और ट्रिगर दबा दिया।
'धांय!'
उस एक सेकंड में, आदित्य ने कुछ नहीं सोचा। उसने बिना अपनी जान की परवाह किए सिया को पूरी ताकत से धक्का दिया और खुद उस गोली के रास्ते में आ गया।
गोली की गूंज... और फिर चारों तरफ फैलता सन्नाटा।
क्या आदित्य उस गोली के घाव से बच पाएगा? क्या सिया अपने पिता को उस कोमा से जगाकर अपनी बेगुनाही साबित कर पाएगी? और कॉलेज के उस मशहूर 'कट्टे' पर शुरू हुई इस प्रेम कहानी का अंजाम क्या होगा?