Lineage and Legacy - Part 3 in Hindi Moral Stories by prem chand hembram books and stories PDF | वंश और विरासत - भाग 3

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वंश और विरासत - भाग 3


वंश और विरासत

एक सामाजिक कहानी
शाम धीरे-धीरे अपने पाँव पसार रही थी। दिनभर की भागदौड़ के बाद बाजार की चहल-पहल कम होने लगी थी। सतीश मंडल, जिन्हें मोहल्ले के लोग प्यार से सती दा कहते थे, हाथ में सब्जियों का झोला लिए घर लौट रहे थे। उम्र ने उनके कंधों को झुका दिया था, बाल सफेद हो चले थे और आँखों की रोशनी भी पहले जैसी नहीं रही थी। फिर भी जीवन की गाड़ी किसी तरह खींचे जा रहे थे।
घर पहुँचकर उन्होंने चौखट से ही आवाज लगाई, “सरला! अरे, अभी तक बाती क्यों नहीं जलाई?”
अंदर से कोई उत्तर नहीं आया। उन्होंने किवाड़ को धीरे से धकेला और भीतर प्रवेश किया। अगले ही क्षण उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। सरला आँगन में बेहोश पड़ी थी। पास में झाड़ू गिरी हुई थी, मानो घर की सफाई करते-करते अचानक उसके हाथ से छूट गई हो।
सती दा घबराकर उसके पास पहुँचे। उन्होंने काँपते हाथों से उसकी नाड़ी टटोली। नाड़ी चल रही थी, लेकिन बहुत धीमी। उन्होंने कई बार सरला को आवाज दी, उसके गाल थपथपाए, पर उसकी आँखें नहीं खुलीं।
घबराहट में उन्होंने जेब से मोबाइल निकाला और डॉक्टर प्रधान का नंबर लगाने लगे। चश्मे के बिना अक्षर साफ दिखाई नहीं दे रहे थे। कभी गलत नंबर दबाते, कभी दोबारा कोशिश करते। इसी बीच घर की बिजली भी चली गई।
विवश होकर वे बाहर निकले और पड़ोसी पांडेय जी को पुकारने लगे। पांडेय जी घर पर नहीं थे, लेकिन उनकी पत्नी शिवानी आवाज सुनकर दौड़ी चली आईं। सरला की हालत देखकर उनके मुँह से चीख निकल गई।
“हाय दीदी! यह क्या हो गया तुम्हें?”
शिवानी ने तुरंत अपने पति को फोन किया। पांडेय जी ने एम्बुलेंस की व्यवस्था की और थोड़ी ही देर में सरला को अस्पताल ले जाया गया।
बोकारो के मुख्य बाजार में स्थित डॉक्टर प्रधान का अस्पताल आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित था। वहाँ गंभीर रोगों के इलाज की अच्छी व्यवस्था थी, हालाँकि उसका खर्च हर किसी के लिए उठाना आसान नहीं था।
जाँच के बाद डॉक्टर अमित वर्मा ने सती दा को बताया, “सतीश जी, सरला जी के हृदय में ब्लॉकेज है। तत्काल ऑपरेशन की जरूरत है। आगे भी इन्हें नियमित दवा, आराम और देखभाल की आवश्यकता होगी।”
सती दा सिर झुकाए खड़े रहे। सरला दिनभर घर का काम करती थी। वह अपनी बीमारी की शिकायत भी कम ही करती थी। दोनों ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसी परिस्थिति सामने आ जाएगी।
इलाज की प्रक्रिया शुरू हुई तो उन्हें कैश काउंटर पर बुलाया गया।
कर्मचारी ने कहा, “चाचा, तत्काल पचास हजार रुपये जमा करने होंगे।”
“पचास हजार रुपये!” सती दा के मुँह से निकला।
उनके बैंक खाते में पेंशन के लगभग पच्चीस हजार रुपये ही थे। यही उनकी जीवनभर की कमाई का बचा हुआ सहारा था। उन्होंने लाचार निगाहों से पांडेय जी की ओर देखा।
पांडेय जी की अपनी आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी। फिर भी उन्होंने बिना देर किए कहा, “सती दा, अभी पच्चीस हजार रुपये जमा कर दीजिए। बाकी का इंतजाम मैं करता हूँ।”
सती दा ने अस्पताल के मालिक डॉक्टर प्रधान का नाम लिया। वे उनके पुराने मित्र थे। पहले दोनों एक कंपनी में काम करते थे। डॉक्टर प्रधान चिकित्सा विभाग में थे और सती दा जनरल मैनेजर थे। कर्मचारी ने डॉक्टर प्रधान को फोन किया, लेकिन उस समय वे अपनी टीम के साथ एक गंभीर मामले में व्यस्त थे। उन्होंने बाद में बात करने को कहा।
सती दा का चेहरा उतर गया। कभी उनके एक फोन पर बड़े-बड़े काम हो जाते थे। आज वे अपनी जीवनसंगिनी के इलाज के लिए सहायता की प्रतीक्षा कर रहे थे। वक्त सचमुच बड़ा बलवान होता है।
कुछ देर बाद डॉक्टर प्रधान अपनी टीम के साथ ऊपर से नीचे उतर रहे थे। तभी उनकी नजर गलियारे में बैठे सतीश दा पर पड़ी। वे कुछ क्षण के लिए ठिठक गए और आश्चर्य से अपने मित्र की ओर देखने लगे।
सती दा के असमय झड़ चुके दाँत, झुकी हुई कमर और चेहरे पर उभरी चिंता की लकीरें उनके जीवन की कठिनाइयों की कहानी कह रही थीं।
डॉक्टर प्रधान तुरंत उनके पास आए और मुस्कराकर बोले, “अरे सतीश! तुम चिंता क्यों कर रहे हो? यह अपना ही अस्पताल है भाई। सरला भाभी के इलाज में कोई कोताही नहीं होगी। तुम निश्चिंत होकर बैठो।”
उनकी बात सुनकर सती दा की आँखें भर आईं। वे कुछ कहना चाहते थे, लेकिन गला भर आया।
डॉक्टर प्रधान केवल एक सफल चिकित्सक ही नहीं, बल्कि अच्छे इंसान भी थे। उनके अस्पताल में इलाज महँगा था, लेकिन गरीब मरीजों के लिए उन्होंने अलग व्यवस्था कर रखी थी। अस्पताल के कर्मचारियों को उनकी सख्त हिदायत थी, “जो मरीज पूरा पैसा देने में सक्षम हैं, उनसे नियमानुसार फीस ली जाए। लेकिन जो गरीब हैं और इलाज का खर्च उठाने में असमर्थ हैं, उनसे कम फीस ली जाए। किसी जरूरतमंद को केवल पैसों के अभाव में इलाज से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।”
डॉक्टर प्रधान पैसे को केवल कमाई का साधन नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम मानते थे। उनके लिए किसी मरीज की जान बचाना सबसे बड़ा धर्म था।
सती दा ने जेब से मोबाइल निकाला और बड़ी बेटी रूपा का नंबर मिलाया।
“बेटी, तुम्हारी माँ की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई। वह अस्पताल में भर्ती है। उसका ऑपरेशन हुआ है।”
दूसरी ओर मुंबई में अपने अस्पताल में व्यस्त रूपा के हाथ ठिठक गए।
“क्या हुआ माँ को, पापा? अब कैसी हैं?”
“अभी डॉक्टरों की देखरेख में हैं। तुम आ सकती हो तो आ जाओ।”
रूपा ने घबराते हुए कहा, “ठीक है पापा, मैं देखती हूँ कि जल्दी कोई फ्लाइट मिलती है या नहीं। मिल गई तो जल्द पहुँचूँगी।”
सती दा ने छोटी बेटी पूनम को भी फोन किया। वह हैदराबाद में थी।
“पूनम, तुम्हारी माँ अस्पताल में है। उसका ऑपरेशन हुआ है।”
पूनम ने चिंतित होकर पूछा, “पापा, माँ को क्या हुआ? अब कैसी हैं?”
“अभी डॉक्टर देख रहे हैं, बेटी। तुम आ सकती हो तो आ जाओ।”
पूनम ने भी कहा, “ठीक है पापा, मैं फ्लाइट देखती हूँ। मिल गई तो बच्चों को लेकर निकलती हूँ।”
सती दा ने दोनों बेटियों को माँ की बीमारी के बारे में बता दिया, लेकिन पैसों की परेशानी का जिक्र नहीं किया। वे अपने स्वाभिमान के कारण अपनी विवशता प्रकट नहीं करना चाहते थे।
मनुष्य की यह विचित्र प्रकृति है कि वह अपनों से कितना ही नाराज क्यों न हो, संकट के समय सबसे पहले उन्हीं को याद करता है। अपने कितनी भी दूर क्यों न हों, मन उनके लौट आने की आशा लगाए रहता है।
उधर रूपा ने फोन रखकर अपने पति डॉक्टर तरुण को सारी बात बताई।
“माँ की तबीयत बहुत खराब है। उनका ऑपरेशन हुआ है। मैं अस्पताल जा रही हूँ। हो सके तो तुम भी मेरे साथ चलो।”
तरुण दिल के बुरे इंसान नहीं थे। लेकिन उनका पेशा और व्यस्त दिनचर्या उन्हें अक्सर परिवार की ऐसी परिस्थितियों से दूर कर देते थे। अस्पताल, मरीजों और दूसरी जिम्मेदारियों के बीच समय निकालना उनके लिए कठिन था।
उन्होंने रूपा से कहा, “तुम चली जाओ। मुझे अस्पताल की जिम्मेदारियों से निकलना मुश्किल होगा। माँ को देखकर मुझे भी खबर देना।”
रूपा ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने यात्रा की तैयारी शुरू कर दी। मन में माँ की चिंता थी और आँखों में अनजाना भय।
छोटी बेटी पूनम भी अपने पति सुरेश के साथ एक संपन्न परिवार में रहती थी। सुरेश सर्वोच्च न्यायालय के नामी वकील थे। पूनम स्वयं प्रतिष्ठित हार्ट सर्जन थी। दोनों बेटियों ने अपने जीवन में बड़ी सफलता प्राप्त की थी। वे माता-पिता की जरूरतों के लिए पैसे खर्च करने को तैयार थीं, लेकिन उनके साथ रहने का प्रश्न अब तक अनसुलझा था।
कुछ दिन पहले ही सती दा ने रूपा से कहा था, “बेटी, तुम्हारी माँ की तबीयत अब ठीक नहीं रहती। शुगर और बीपी की परेशानी बढ़ रही है। अगर तुम उसे अपने पास रख लेती, तो मुझे बड़ी तसल्ली होती।”
रूपा की भी इच्छा थी कि माँ उसके साथ रहे। बचपन में माँ ने अपनी इच्छाओं को पीछे रखकर उसे पढ़ाया था। कितनी रातें जागकर उसकी परीक्षा की तैयारी करवाई थी, कितनी बार अपनी जरूरतें छोड़कर उसकी किताबें खरीदी थीं! रूपा जानती थी कि उसकी सफलता के पीछे माँ के त्याग और पिता के परिश्रम की लंबी कहानी छिपी है।
लेकिन जब उसने अपने पति तरुण से इस विषय में बात की, तो उसने कहा था, “रूपा, हमारे पेशे में माता-पिता को साथ रखना आसान नहीं है। अस्पताल, मरीज, बच्चों और अपनी जिम्मेदारियों के बीच पहले ही बहुत व्यस्तता रहती है। उन्हें किसी अच्छे वृद्धाश्रम में रखवा दो। खर्च की चिंता मत करो।”
रूपा के सामने कठिन प्रश्न था। एक ओर माता-पिता के प्रति उसका प्रेम था, दूसरी ओर अपना परिवार और वैवाहिक जीवन। उसने पति का विरोध नहीं किया।
जब उसने माता-पिता को वृद्धाश्रम का सुझाव दिया, तो सती दा और सरला ने साफ मना कर दिया। वे अपना घर, अपनी स्मृतियाँ और एक-दूसरे का साथ छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहते थे।
पूनम ने भी एक प्रसिद्ध वृद्धाश्रम में बात की थी, जहाँ बुजुर्गों के रहने, खाने और चिकित्सा की अच्छी व्यवस्था थी। लेकिन माता-पिता वहाँ रहने को तैयार नहीं हुए। उनके लिए बुढ़ापे का अर्थ केवल दवा, भोजन और सुरक्षित छत नहीं था। उन्हें अपने घर की मिट्टी, परिचित आँगन और अपने लोगों की निकटता चाहिए थी।
इसी बीच डॉक्टर प्रधान ने कर्मचारियों को सरला के इलाज में किसी प्रकार की देरी न करने का निर्देश दिया। ऑपरेशन की तैयारी पूरी हुई और कुछ घंटों बाद सरला को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया।
सती दा और पांडेय जी गलियारे में बैठे प्रतीक्षा करते रहे। हर बार ऑपरेशन थिएटर का दरवाजा खुलता, सती दा की धड़कनें तेज हो जातीं। उनके होंठों पर एक ही प्रार्थना थी—सरला ठीक हो जाए।
अंततः डॉक्टर प्रधान बाहर आए।
“सतीश, ऑपरेशन सफल रहा है। सरला भाभी अब खतरे से बाहर हैं। उन्हें कुछ समय आराम करना होगा।”
सती दा ने राहत की साँस ली। उनकी आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की।
अगली सुबह लगभग दस बजे अस्पताल में मरीजों की आवाजाही बढ़ गई थी। डॉक्टर प्रधान पूरे अस्पताल में मरीजों को देखने में व्यस्त थे।
इसी समय अस्पताल के मुख्य द्वार पर एक गाड़ी आकर रुकी। उसमें से रूपा अपने बच्चों के साथ उतरी। उसके ठीक पीछे दूसरी गाड़ी से पूनम भी अपने बच्चों के साथ बाहर आई।
दोनों बहनें तेजी से अस्पताल के भीतर पहुँचीं।
गलियारे में बैठे सती दा की नजर जैसे ही अपनी बेटियों पर पड़ी, उनकी आँखें भर आईं। वे उठने की कोशिश करने लगे। रूपा दौड़कर उनके पास पहुँची और लगभग रोते हुए बोली, “पिताजी, माँ कैसी हैं? अब उनकी तबीयत कैसी है?”
सती दा ने बेटी के सिर पर हाथ रखा।
“बेटी, तुम्हारी माँ अब खतरे से बाहर है। डॉक्टरों ने ऑपरेशन कर दिया है।”
पूनम ने पिता का हाथ पकड़ लिया। “पापा, आपने हमें पहले क्यों नहीं बताया? हम पहले ही आ जाते।”
सती दा ने धीमे स्वर में कहा, “बेटी, जब जरूरत पड़ी, तभी तो बताया।”
उनकी बात सुनकर दोनों बहनें चुप हो गईं।
कुछ देर बाद डॉक्टर प्रधान ओपीडी की ओर जा रहे थे। सती दा अपनी दोनों बेटियों के साथ उनकी ओर बढ़े। रूपा और पूनम डॉक्टर प्रधान को बचपन से जानती थीं। उन्हें देखते ही दोनों ने आगे बढ़कर उनके पैर छुए।
डॉक्टर प्रधान ने स्नेह से उनके सिर पर हाथ रखा और कहा, “खुश रहो बेटियों। तुम्हारी माँ का ऑपरेशन सफल रहा है। अभी उन्हें आराम की जरूरत है।”
इसके बाद वे तीनों को सरला के कमरे की ओर ले गए।
सरला बिस्तर पर लेटी हुई थी। चेहरे पर कमजोरी थी, लेकिन वह पूरी तरह होश में थी। डॉक्टर प्रधान ने उसे ज्यादा बातचीत करने से मना कर रखा था। रूपा और पूनम माँ के पास जाकर बैठ गईं। दोनों ने उसका हाथ थाम लिया।
सरला ने बेटियों को देखकर हल्की मुस्कान दी।
“तुम दोनों आ गईं?”
रूपा की आँखों से आँसू बह निकले। “हाँ माँ, हम आ गए। अब आप जल्दी ठीक हो जाइए।”
पूनम ने माँ के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, “माँ, आपको कुछ नहीं होने देंगे। आप बस आराम कीजिए।”
सरला ने दोनों बेटियों के हाथ अपने हाथों में ले लिए। उस क्षण कमरे में कोई शिकायत नहीं थी। माँ की आँखों में ममता थी और बेटियों की आँखों में चिंता।
कुछ देर बाद डॉक्टर प्रधान ने दोनों को बाहर आने का संकेत किया। वे गलियारे में पहुँचीं तो रूपा ने गंभीर स्वर में पूछा, “डॉक्टर अंकल, एक बात पूछनी है। आप माँ की स्थिति स्पष्ट रूप से बताइए। हमसे कोई बात छिपाइएगा मत।”
डॉक्टर प्रधान कुछ क्षण चुप रहे। उन्होंने सतीश दा की ओर देखा। उनके चेहरे पर चिंता की वही पुरानी लकीरें थीं।
“बेटी, तुम्हारी माँ का ऑपरेशन सफल रहा है। फिलहाल वह खतरे से बाहर हैं। लेकिन उनकी बीमारी पुरानी है। आगे भी नियमित दवा, आराम और देखभाल की जरूरत होगी।”
पूनम ने तुरंत पूछा, “डॉक्टर अंकल, क्या अब कोई खतरा है?”
“अभी घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन उनकी देखभाल में लापरवाही नहीं होनी चाहिए।”
रूपा ने फिर पूछा, “इलाज का खर्च कितना हुआ है, अंकल?”
डॉक्टर प्रधान ने एक पल के लिए सतीश दा की ओर देखा। वे जानते थे कि उनके मित्र ने बेटियों को पैसों की परेशानी नहीं बताई है। वे सतीश दा के स्वाभिमान को भी समझते थे।
इसलिए उन्होंने कहा, “उसकी चिंता तुम लोग मत करो। पहले माँ के स्वस्थ होने पर ध्यान दो।”
रूपा और पूनम ने एक-दूसरे की ओर देखा। उन्हें लगा कि शायद डॉक्टर अंकल अभी उन्हें परेशान नहीं करना चाहते।
लेकिन सतीश दा समझ गए कि डॉक्टर प्रधान उनसे कुछ छिपा रहे हैं। वे मित्र की ओर कृतज्ञता से देखने लगे।
कुछ देर बाद दोनों बेटियाँ माँ के पास लौट आईं। रूपा ने माँ का हाथ पकड़कर कहा, “माँ, अब आप हमारे साथ चलिए। वहाँ आपकी देखभाल अच्छी तरह होगी।”
पूनम ने भी सहमति जताई, “हाँ माँ, अब अकेले रहने की जरूरत नहीं है। हम दोनों मिलकर आपकी जिम्मेदारी उठाएँगी।”
सरला ने दोनों बेटियों की ओर देखा। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
“बेटी, तुम लोगों का घर भी है, बच्चे भी हैं और काम भी। मैं चाहती हूँ कि तुम लोग अपना जीवन ठीक से जियो। लेकिन कभी-कभी हमारे पास आकर बैठ जाया करो। तुम्हारे पिता दिनभर अकेले रहते हैं। मुझे उनकी भी चिंता रहती है।”
रूपा ने माँ का हाथ कसकर पकड़ लिया। “माँ, आप ऐसी बातें मत कीजिए। हम आपको अकेला नहीं छोड़ेंगे।”
सती दा दरवाजे पर खड़े यह सब सुन रहे थे। उनके मन में बेटियों के प्रति कोई कठोर शिकायत नहीं थी। उन्हें अपनी बेटियों की सफलता पर गर्व था। उन्होंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार उन्हें पढ़ाया-लिखाया और योग्य बनाया था। लेकिन आज उनके मन में एक प्रश्न बार-बार उठ रहा था—क्या जीवन की सफलता केवल ऊँचा पद, बड़ी कमाई और सामाजिक प्रतिष्ठा पाने में है? क्या माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी केवल पैसे भेज देने से पूरी हो जाती है?
डॉक्टर प्रधान उनके पास आकर खड़े हो गए।
“सतीश, क्या सोच रहे हो?”
सती दा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “कुछ नहीं प्रधान। बस जीवन का हिसाब लगा रहा हूँ।”
“कैसा हिसाब?”
“यही कि बच्चों को पढ़ाने-लिखाने, उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने में हमने पूरी जिंदगी लगा दी। आज वे सब अपने जीवन में सफल हैं। लेकिन कभी-कभी लगता है कि हमने उन्हें सफलता का अर्थ तो समझाया, शायद रिश्तों का महत्व उतनी अच्छी तरह नहीं समझा पाए।”
डॉक्टर प्रधान कुछ क्षण मौन रहे। फिर बोले, “सतीश, बच्चों को दोष देना आसान है, लेकिन हर पीढ़ी को अपने जीवन में कुछ न कुछ सीखना पड़ता है। जरूरी यह है कि समय रहते हम एक-दूसरे की जरूरत समझें।”
सती दा ने सिर हिलाया।
उन्होंने सरला की ओर देखा। जीवन के इतने वर्षों में दोनों ने कितने उतार-चढ़ाव साथ देखे थे। बच्चों की पढ़ाई, नौकरी, विवाह और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए उन्होंने अपनी इच्छाओं को पीछे रखा था। उन्हें इस बात का गर्व था कि उनकी बेटियाँ डॉक्टर बनीं और सम्मानित जीवन जी रही हैं। अब वे चाहते थे कि उनकी सफलता के साथ संवेदना भी जुड़ी रहे।
उन्हें समझ में आ रहा था कि वंश आगे बढ़ना और विरासत आगे बढ़ना दो अलग बातें हैं।
वंश मनुष्य को जन्म से मिलता है, लेकिन विरासत उसके कर्मों और संस्कारों से बनती है। संपत्ति, पद और प्रतिष्ठा अगली पीढ़ी को सौंपी जा सकती है, मगर करुणा, कृतज्ञता और अपने लोगों के प्रति जिम्मेदारी का भाव जीवन में उतारना पड़ता है।
सती दा ने अपनी बेटियों को शिक्षा और जीवन में आगे बढ़ने का अवसर दिया था। अब वे चाहते थे कि उनकी बेटियाँ भी अपने बच्चों को यह सिखाएँ कि परिवार का अर्थ केवल एक छत के नीचे रहना नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी होना है।
बूढ़े माता-पिता को दवा और भोजन की जरूरत होती है, लेकिन उससे कहीं अधिक अपनेपन की जरूरत होती है। कभी उनके पास बैठना, उनकी बातें सुनना, उनका हाथ थामना और यह विश्वास दिलाना कि वे अकेले नहीं हैं—यही रिश्तों की असली पूँजी है।
अस्पताल की खिड़की से सुबह की हल्की धूप भीतर उतर रही थी। सरला की तबीयत धीरे-धीरे सुधर रही थी। रूपा और पूनम उसके पास बैठी थीं। उनके बच्चे भी नानी के आसपास खड़े होकर उनसे बातें करने की कोशिश कर रहे थे।
सती दा ने यह दृश्य देखा तो उनके चेहरे पर संतोष की हल्की मुस्कान उभर आई। उन्हें लगा कि शायद यह घटना उनकी बेटियों के जीवन में एक नई समझ की शुरुआत बनेगी।
उन्होंने मन ही मन संकल्प किया कि जब भी अवसर मिलेगा, वे अपनी बेटियों और आने वाली पीढ़ी को जीवन की यह सच्चाई समझाएँगे—
वंश का गौरव नाम से नहीं, कर्म से बढ़ता है; और विरासत का मूल्य इस बात से नहीं आँका जाता कि हमने कितना धन छोड़ा, बल्कि इस बात से कि हमारे संस्कार अगली पीढ़ी में कितने जीवित रहे।
यही जीवन की सच्ची कमाई थी, यही वंश की वास्तविक गरिमा और यही वह विरासत थी, जिसे समय भी नहीं मिटा सकता।