दिल ही तो है in Hindi Letter by Ritu kumari books and stories PDF | दिल ही तो है

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दिल ही तो है

प्रथम अध्याय: अनकहे अल्फाज़ और रात का सन्नाटा
रात के ढाई बज रहे थे। कमरे की खिड़की से आती हल्की ठंडी हवा के झोंके और दीवार पर टंगे पुराने क्लॉक की टिक-टिक के अलावा, वहाँ चारों तरफ गाढ़ा सन्नाटा पसरा हुआ था। मेज पर रखी जलती हुई मोमबत्ती की लौ हवा के हल्के झोंके के साथ थोड़ा कांप रही थी। उस लौ की मद्धम पीली परछाई आरुषि के चेहरे पर पड़ रही थी, जिसके लंबे काले बाल उसके कंधों पर बिखरे हुए थे और उसकी आँखें किसी अनकहे दर्द की गहराइयों में डूबी थीं।  
आरुषि के हाथ में एक पुराना फाउंटेन पेन था, और सामने खुली हुई डायरी का पन्ना स्याही के आंसुओं से भीगा हुआ था। वह कुछ लिख रही थी, और उसके भीतर उमड़ रहा जज़्बात का सैलाब कागज़ पर उतर रहा था:  
"दिल ही तो है, न जाने क्यों धड़कता है,
टूटे ख्वाबों की गलियों में बहकता है।
खुद को गले लगाकर, दर्द को सहकर,
अंधेरे में जलती लौ सा महकता है।"  
इन पंक्तियों को लिखने के बाद आरुषि ने पेन को मेज पर रखा और अपने दोनों हाथों से खुद को कसकर भींच लिया। यह महज़ ठंड से बचने की मुद्रा नहीं थी, बल्कि यह उस अकेलेपन, असुरक्षा और उस गहरे खालीपन को अपने सीने से लगाने का एक तरीका था, जो अपनों के दूर हो जाने के बाद उसकी जिंदगी का स्थायी हिस्सा बन चुका था। उसके कमरे की उस अकेली मोमबत्ती और उसकी तन्हाई के बीच केवल एक ही सवाल गूँज रहा था— आखिर दिल इतनी शिद्दत से क्यों चाहता है? और जब सब कुछ बिखर जाता है, तब भी यह सीने के भीतर धड़कना क्यों नहीं छोड़ता?  
 अतीत के पन्ने और कबीर का साया
आरुषि का जीवन हमेशा से ऐसा तन्हा और खामोश नहीं था। कभी उसका जीवन भी संगीत, रंग-बिरंगे सपनों और बेइंतहा हँसी से गुलज़ार हुआ करता था। आज से दो साल पहले तक सब कुछ कितना मुकम्मल लगता था। कबीर उसकी जिंदगी का वह शख्स था, जिसे उसने अपने दिल की सबसे महफूज और पवित्र तिजोरी में सजा कर रखा था।
कबीर और आरुषि की पहली मुलाकात एक शहर के प्रतिष्ठित कॉलेज के वार्षिक लिटरेचर फेस्ट में हुई थी। दोनों की पसंद, रुचियाँ और नज़रिया एक जैसा था। उन्हें पुरानी किताबें पढ़ना, बारिश की शामों में खुली बालकनी में खड़े होकर अदरक वाली चाय की चुस्कियाँ लेना और मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी पर घंटों बहस करना बेहद पसंद था। धीरे-धीरे वह दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि कब उसने प्यार का रूप ले लिया, दोनों को पता ही नहीं चला।
कबीर अक्सर आरुषि के मासूम स्वभाव को देखकर मुस्कुराता था और प्यार से उसके गालों को छूकर कहता था, "आरुषि, तुम्हारा यह दिल बहुत कच्चा और नादान है। यह इस जालिम दुनिया के तौर-तरीके और चालबाज़ियों को नहीं समझता। यहाँ लोग नफा-नुकसान देखकर रिश्ते बनाते हैं, और तुम हो कि बिना सोचे-समझे सब कुछ लुटा देती हो।"
तब आरुषि हँसकर जवाब देती थी, "तो क्या हुआ कबीर? दिल है, कोई कंप्यूटर का बही-खाता थोड़ी है जो हर बात पर नफा-नुकसान का हिसाब लगाए। प्यार में हिसाब हो जाए, तो वो प्यार कैसा?"
लेकिन समय और परिस्थितियों के पहिए ने करवट ली। करियर की दौड़-धूप, पारिवारिक दबाव और महत्वाकांक्षाओं की चक्की में पिसते-पिसते कबीर और आरुषि के बीच दूरियों की दीवारें खड़ी होने लगीं। जिन बातों पर कभी दोनों मुस्कुराया करते थे, अब उन्हीं बातों पर बहस होने लगी। कबीर अधिक व्यावहारिक (Practical) होने की बात करने लगा, जबकि आरुषि के लिए भावनाएँ ही उसका सब कुछ थीं।
एक सर्द शाम, बिना किसी बड़े झगड़े या चीख-पुकार के, कबीर ने आरुषि की जिंदगी से हमेशा के लिए दूर जाने का फैसला कर लिया। जाते वक्त उसने बस इतना कहा था, "आरुषि, जिंदगी सिर्फ एहसासों से नहीं चलती। ज़रा प्रैक्टिकल बनो। हम दोनों की राहें अब जुदा हैं।"
'प्रैक्टिकल बनो!'—ये दो शब्द आरुषि के दिल पर किसी गर्म लोहे की छड़ की तरह दागे गए थे। उस दिन के बाद से आरुषि की हँसी कहीं खो गई और उसकी जगह ले ली एक अंतहीन खामोशी ने।
दिल और दिमाग का सनातन संघर्ष
आरुषि ने अपनी डायरी का अगला पन्ना पलटा और लिखना जारी रखा। उसके मन में वही पुरानी और जटिल कशमकश चल रही थी—आखिर इंसान दिल की सुने या दिमाग की?
समाज, किताबें और तथाकथित समझदार लोग हमेशा दिमाग से चलने की सलाह देते हैं। वे सिखाते हैं कि जो तर्क की कसौटी पर खरा उतरे, वही सही है। जो सुरक्षित हो, वही अपनाना चाहिए। लेकिन आरुषि का विद्रोही दिल इस बात को कभी स्वीकार नहीं कर पाया। वह सोचती थी कि अगर हर रिश्ते, हर फैसले और हर जज़्बात को केवल दिमाग के तराजू पर ही तौला जाना है, तो फिर इंसान और एक रोबोट या मशीन में फर्क ही क्या रह गया?
कमरे में रखी मोमबत्ती की लौ अब और धीमी हो गई थी। अंधेरा कमरे के कोनों से निकलकर धीरे-धीरे बीच की तरफ बढ़ रहा था। आरुषि ने महसूस किया कि उसका दिल आज फिर से उसी पुराने मोड़ पर खड़ा है, जहाँ से अतीत की यादें उसे खींच रही थीं। जब इस दुनिया में कोई अपना साथ नहीं देता, जब रास्ते पूरी तरह सूने और वीरान हो जाते हैं, तब इंसान के पास केवल उसका दिल ही बचता है—वही दिल, जो खुद अपने आंसुओं से अपने ज़ख्मों को धोता है और अगली सुबह फिर से सांस लेने की हिम्मत जुटाता है।  
उसने अपने थरथराते हाथों से पेन उठाया और पन्ने पर उकेरा:
"अतीत की छाया में, यादों का मेला,
हर सांस में छुपा, कोई अनसुना सा गीला।
आँखों में समंदर, होठों पे खामोशी,
यह कहानी है, एक अधूरे से सफर की।"  
यह कविता सिर्फ पंक्तियाँ नहीं थीं; यह आरुषि के भीतर चल रहे उस महासागर का ज्वार-भाटा था, जिसे वह किसी के सामने बयां नहीं कर सकती थी। समाज के सामने मजबूत दिखने वाली आरुषि अंदर से पूरी तरह टूट चुकी थी, और उसका एकमात्र सहारा उसकी ये कविताएँ थीं, जो उसके आंसुओं को शब्दों का आकार दे रही थीं।
 हीलिंग और आत्म-स्वीकृति का कठिन मार्ग
वक्त सबसे बड़ा मरहम होता है—यह बात सुनने में जितनी आसान लगती है, जीने में उतनी ही दर्दनाक होती है। जब घाव शरीर पर नहीं बल्कि रूह और एहसासों की गहराई पर हों, तो समय भी अपनी रफ्तार धीमी कर लेता है। कबीर के जाने के बाद शुरुआती कई महीने आरुषि के लिए एक काले, गहरे कुएं की तरह थे, जहाँ से बाहर निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आता था।
वह किसी से ज्यादा बात नहीं करती थी। सुबह ऑफिस जाना, बेमन से फाइलों पर हस्ताक्षर करना, शाम को चुपचाप घर लौटना और रात को मोमबत्ती के सामने बैठकर अपनी डायरी के पन्ने काले करना—बस यही उसकी दिनचर्या बन गई थी।
उसकी एक बेहद करीब और परवाह करने वाली दोस्त थी, सिमरन। सिमरन अक्सर आरुषि के घर आती और उसे समझाने की कोशिश करती, "आरुषि, तुम खुद को इस तरह सजा क्यों दे रही हो? जो इंसान तुम्हें छोड़कर चला गया, जिसे तुम्हारी कद्र नहीं थी, उसके लिए अपनी पूरी जिंदगी को दांव पर लगाना कहाँ की समझदारी है? थोड़ा खुद से प्यार करो, आगे बढ़ो।"
लेकिन आरुषि का जवाब हमेशा एक खामोश मुस्कान और एक सीधा सवाल होता था, "सिमरन, क्या भावनाएँ इतनी सस्ती और प्लास्टिक की चीज़ हैं कि कोई बटन दबाए और वे बंद हो जाएं? मैंने जिससे प्यार किया, उसे अपनी रूह की गहराइयों में उतारा था। उसे अपनी जिंदगी से यूं मिटा देना मेरे बस की बात नहीं है। दिल ही तो है, एक बार जिसे अपना मान ले, उसे कैसे बेगाना कर दे?"
धीरे-धीरे, महीनों के बीतने के साथ, आरुषि को यह अहसास होने लगा कि दर्द से भागना या उसे जबरदस्ती दबाना किसी समस्या का समाधान नहीं है। जब तक वह दर्द को अपनाएगी नहीं, तब तक वह उससे उबर भी नहीं पाएगी। उसने अपने आंसुओं से लड़ना बंद कर दिया। जब भीद दर्द हद से ज्यादा बढ़ता, वह खुलकर रो लेती। उस रोने में एक मुक्ति थी, एक अजीब सी शांति थी। उसे समझ आया कि कमज़ोर होना कोई पाप नहीं है; बल्कि भावनाओं का जीवित रहना ही इस बात का प्रमाण है कि वह एक संवेदनशील इंसान है।
उम्मीद  की एक नई सुबह
रात का काला पर्दा धीरे-धीरे छंटने लगा था। कमरे की खिड़की के शीशों से अब बाहर आसमान का रंग नीला पड़ने लगा था। सुबह की पहली किरण ने जब कमरे की देहरी पर कदम रखा, तो जलती हुई मोमबत्ती ने आखिरकार दम तोड़ दिया और उसकी लौ हमेशा के लिए शांत हो गई। बाहर पेड़ों की डालियों पर बैठी चिड़ियाँ चहकने लगी थीं, जो एक नए दिन की शुरुआत का संदेश दे रही थीं।  
आरुषि ने रात भर जागकर जो पन्ने भरे थे, उन्हें बंद किया। उसकी आँखों में अभी भी थकावट और नमी थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सी मानसिक शांति और चमक भी तैर रही थी। उसने अपने बिखरे हुए बालों को समेटा, अपनी कुर्सी से उठी और खिड़की की ओर बढ़ गई। उसने खिड़की के पल्ले पूरी तरह खोल दिए। बाहर की ठंडी, ताज़ा हवा का एक झोंका सीधे उसके चेहरे से टकराया, तो उसे लगा मानो उसके भीतर की घुटन कुछ कम हो गई हो।
उसने गहरी साँस ली और महसूस किया कि जिंदगी भले ही वैसी न रही हो जैसा उसने सपना देखा था, लेकिन इसका अंत यहाँ नहीं हुआ है। उसका दिल भले ही कई बार टूटा था, इसके बावजूद वह धड़क रहा था। और जब तक दिल धड़क रहा है, तब तक हर सुबह एक नई शुरुआत की उम्मीद साथ लेकर आती है।  
आरुषि ने मुड़कर अपनी डायरी को देखा, उस पर प्यार से हाथ फेरा और खुद से ही बुदबुदाते हुए एक हल्की सी मुस्कान बिखेर दी— "आखिरकार, दिल ही तो है... टूटना और बिखरना इसकी फितरत सही, पर हर बार संभलकर फिर से धड़कना इसकी सबसे बड़ी जिद्द है।"