माँ और मैं रात भर काफी बातें करते रहे। माँ मुझसे नानी और मामा के बारे में पूछती रहीं, और मैं उन्हें सब कुछ बताता रहा। फिर मेरे ख़यालों में मीरा का ख़याल आया। मुझे लगा कि मुझे माँ को मीरा के बारे में भी बता देना चाहिए, लेकिन फिर मैं रुक गया।
पहले मुझे मीरा से मिल तो लेना चाहिए था। मेरे जाने के बाद वह किन परिस्थितियों में रही होगी? कहीं उसने शादी तो नहीं कर ली होगी? यह सोचकर मैं उलझन में पड़ गया।
आखिरकार मैंने फैसला किया कि पहले माँ को घर ले जाऊँगा। उसके बाद मीरा से मिलकर आगे के बारे में सोचूँगा। अगर उसकी शादी हो चुकी होगी, तो मैं कभी उसके बारे में माँ या किसी और को नहीं बताऊँगा।
अगली सुबह माँ ने सविता से ठाकुर साहब के बारे में पूछा, तो पता चला कि वे रात को ही फ्लाइट से वापस चले गए थे। माँ को यह जानकर झटका लगा, लेकिन उन्होंने खुद को शांत रखा।
सविता से नाश्ता बनाने के लिए कहकर माँ मेरे पास आ गईं। उन्हें परेशान देखकर मैंने पूछा, “क्या हुआ, माँ?”
माँ ने उदास स्वर में कहा, “क्षितिज ठाकुर साहब कल रात की फ्लाइट से वापस चले गए हैं। क्या मैंने यहाँ रुककर कोई गलती तो नहीं कर दी?”
वह दुखी थीं।
“पता नहीं, चिराग की हालत कैसी होगी। उन्हें यूँ अचानक जाना पड़ा। वह बहुत मासूम है, बेटा। उसका तो कोई दोष नहीं है,” माँ ने दुखी मन से कहा।
उनकी बातें सुनकर मेरे मुँह से अचानक निकल गया, “और मैं? मेरा क्या दोष था, माँ?”
मेरी बात सुनकर माँ चौंककर मेरी ओर देखने लगीं। फिर उन्होंने मेरे सिर पर प्यार से हाथ रखा और बोलीं, “तैयार हो जाओ। मुझे नानी के पास ले चलो।”
मैं उदास मन से उठकर तैयार होने चला गया।
लगभग दोपहर के समय मैं और माँ ड्राइवर के साथ स्टेशन पर थे। ड्राइवर ने बहुत समझाने की कोशिश की। उसने कहा, “ठाकुर साहब ने कहा है कि मैडम को जहाँ भी जाना हो, आप उन्हें साथ लेकर जाइए।”
लेकिन माँ ने साफ मना कर दिया।
“काफी दिन हो गए हैं। बस, अब मैं अपनी ज़िंदगी के कुछ पल अपनी मर्ज़ी से जीना चाहती हूँ। और फिर क्षितिज भी तो साथ है।”
माँ की बात सुनकर ड्राइवर ने कुछ नहीं कहा। वह हमें स्टेशन पर छोड़कर वापस चला गया।
माँ स्टेशन पर खड़ी होकर चारों तरफ़ देख रही थीं। ऐसा लग रहा था, जैसे बरसों से खोई हुई ज़िंदगी में उन्हें एक बार फिर नई साँसें लेने का मौका मिला हो। उनकी आँखों में एक अलग ही चमक थी, मानो वह अपनी खोई हुई आज़ादी को दोबारा महसूस कर रही हों।
लेकिन मैं जानता था कि उनके मन में अभी भी ठाकुर साहब और चिराग की चिंता थी। वह चाहकर भी उन दोनों की फ़िक्र से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकती थीं।
कुछ देर बाद ट्रेन आ गई और हम दोनों उसमें सवार हो गए।
एक बार फिर मैं था और मेरा सफ़र...
न जाने अपनी ज़िंदगी में मुझे अभी और कितने सफ़र तय करने थे। न जाने वह मंज़िल मुझे कब मिलने वाली थी, जहाँ पहुँचकर मैं ठहर जाता। जहाँ मुझे सुकून मिलता और जहाँ मुझे बार-बार भटकने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
ट्रेन का यह सफ़र माँ ने शायद कई दिनों बाद, या यूँ कहूँ कि कई सालों बाद किया था। वह गहरी सोच में डूबी हुई थीं। उनके मन में अपनी माँ से बरसों बाद मिलने की खुशी थी, तो न जाने कितनी यादें, कितने सवाल और कितने अनकहे एहसास भी थे।
उनके भीतर भावनाओं का एक पूरा समंदर उमड़ रहा था, जिसे शायद वह खुद भी ठीक से समझ नहीं पा रही थीं।
लगभग दोपहर के समय मैं और माँ ड्राइवर के साथ स्टेशन पर थे। ड्राइवर ने बहुत समझाने की कोशिश की। उसने कहा, “ठाकुर साहब ने कहा है कि मैडम को जहाँ भी जाना हो, आप उन्हें साथ लेकर जाइए।”
लेकिन माँ ने साफ मना कर दिया।
“काफी दिन हो गए हैं। बस, अब मैं अपनी ज़िंदगी के कुछ पल अपनी मर्ज़ी से जीना चाहती हूँ। और फिर क्षितिज भी तो साथ है।”
माँ की बात सुनकर ड्राइवर ने कुछ नहीं कहा। वह हमें स्टेशन पर छोड़कर वापस चला गया।
माँ स्टेशन पर खड़ी होकर चारों तरफ़ देख रही थीं। ऐसा लग रहा था, जैसे बरसों से खोई हुई ज़िंदगी में उन्हें एक बार फिर नई साँसें लेने का मौका मिला हो। उनकी आँखों में एक अलग ही चमक थी, मानो वह अपनी खोई हुई आज़ादी को दोबारा महसूस कर रही हों।
लेकिन मैं जानता था कि उनके मन में अभी भी ठाकुर साहब और चिराग की चिंता थी। वह चाहकर भी उन दोनों की फ़िक्र से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकती थीं।
कुछ देर बाद ट्रेन आ गई और हम दोनों उसमें सवार हो गए।
एक बार फिर मैं था और मेरा सफ़र...
न जाने अपनी ज़िंदगी में मुझे अभी और कितने सफ़र तय करने थे। न जाने वह मंज़िल मुझे कब मिलने वाली थी, जहाँ पहुँचकर मैं ठहर जाता। जहाँ मुझे सुकून मिलता और जहाँ मुझे बार-बार भटकने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
ट्रेन का यह सफ़र माँ ने शायद कई दिनों बाद, या यूँ कहूँ कि कई सालों बाद किया था। वह गहरी सोच में डूबी हुई थीं। उनके मन में अपनी माँ से बरसों बाद मिलने की खुशी थी, तो न जाने कितनी यादें, कितने सवाल और कितने अनकहे एहसास भी थे।
उनके भीतर भावनाओं का एक पूरा समंदर उमड़ रहा था, जिसे शायद वह खुद भी ठीक से समझ नहीं पा रही थीं।
ट्रेन अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ रही थी। खिड़की के बाहर भागते पेड़, पीछे छूटते स्टेशन और दूर तक फैले खेत... सब कुछ जैसे अपनी जगह से भाग रहा था। लेकिन मेरे भीतर वक्त ठहर-सा गया था।
मैंने माँ की तरफ देखा। वह खिड़की से बाहर देख रही थीं, मगर उनकी आँखें बाहर के नज़ारों पर नहीं, शायद अपने अतीत पर टिकी थीं। इतने सालों बाद अपनी माँ से मिलने जा रही थीं। न जाने उनके मन में कितनी शिकायतें होंगी, कितने सवाल होंगे और कितनी ऐसी बातें होंगी, जो वह इतने सालों से अपने सीने में दबाकर बैठी थीं।
मैं उनसे कुछ पूछना चाहता था, लेकिन फिर चुप रह गया।
कुछ रिश्तों के दर्द को शब्दों की ज़रूरत नहीं होती। उन्हें बस थोड़ा वक्त चाहिए होता है।
"माँ..."
मेरी आवाज़ सुनकर उन्होंने मेरी तरफ देखा।
"क्या सोच रही हो?"
वह हल्का-सा मुस्कुराईं।
"कुछ नहीं बेटा, बस यही सोच रही हूँ कि इतने साल कैसे बीत गए। कभी लगता है जैसे कल की ही बात हो, जब मैं अपनी माँ के आँचल में सिर रखकर सोया करती थी। और आज देखो, अपनी ही माँ से मिलने के लिए इतने सालों का फासला तय करना पड़ रहा है।"
उनकी आवाज़ में छिपा दर्द मैं महसूस कर सकता था।
"माँ, अब सब ठीक हो जाएगा। आप नानी से मिलोगी, उनके साथ रहोगी। अब आपको किसी बात की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।"
मेरी बात सुनकर वह कुछ पल मुझे देखती रहीं। फिर मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, "तुम साथ हो न, बेटा? बस, अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए।"
मैंने उनका हाथ अपने हाथों में ले लिया।
काश, मैं उन्हें बता पाता कि उनके बेटे की अपनी ज़िंदगी भी कितनी उलझी हुई थी। वह मुझे अपनी ताकत समझ रही थीं, लेकिन सच तो यह था कि मैं खुद अंदर से बिखरा हुआ था।
मेरे जीवन में भी एक ऐसा रिश्ता था, जिसे मैं चाहकर भी भुला नहीं पाया था।
मीरा...
उसका नाम मन में आते ही जैसे मेरे भीतर कुछ टूटने लगा।
न जाने वह कैसी होगी? क्या अब भी उसे मेरा इंतज़ार होगा? या उसने भी मेरी तरह उन यादों को अपने दिल में छिपाकर जीना सीख लिया होगा?
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
कभी-कभी इंसान किसी को खोने के बाद भी उससे अलग नहीं हो पाता। वह दुनिया के सामने आगे बढ़ जाता है, लेकिन उसका दिल उसी मोड़ पर खड़ा रहता है, जहाँ से कोई अपना उसका हाथ छुड़ाकर चला गया था।
और मैं भी शायद वहीं खड़ा था।