ट्रेन अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ रही थी। खिड़की के बाहर भागते पेड़, पीछे छूटते स्टेशन और दूर तक फैले खेत... सब कुछ जैसे अपनी जगह से भाग रहा था। लेकिन मेरे भीतर वक्त ठहर-सा गया था।
मैंने माँ की तरफ देखा। वह खिड़की से बाहर देख रही थीं, मगर उनकी आँखें बाहर के नज़ारों पर नहीं, शायद अपने अतीत पर टिकी थीं। इतने सालों बाद अपनी माँ से मिलने जा रही थीं। न जाने उनके मन में कितनी शिकायतें होंगी, कितने सवाल होंगे और कितनी ऐसी बातें होंगी, जो वह इतने सालों से अपने सीने में दबाकर बैठी थीं।
मैं उनसे कुछ पूछना चाहता था, लेकिन फिर चुप रह गया।
कुछ रिश्तों के दर्द को शब्दों की ज़रूरत नहीं होती। उन्हें बस थोड़ा वक्त चाहिए होता है।
"माँ..."
मेरी आवाज़ सुनकर उन्होंने मेरी तरफ देखा।
"क्या सोच रही हो?"
वह हल्का-सा मुस्कुराईं।
"कुछ नहीं बेटा, बस यही सोच रही हूँ कि इतने साल कैसे बीत गए। कभी लगता है जैसे कल की ही बात हो, जब मैं अपनी माँ के आँचल में सिर रखकर सोया करती थी। और आज देखो, अपनी ही माँ से मिलने के लिए इतने सालों का फासला तय करना पड़ रहा है।"
उनकी आवाज़ में छिपा दर्द मैं महसूस कर सकता था।
"माँ, अब सब ठीक हो जाएगा। आप नानी से मिलोगी, उनके साथ रहोगी। अब आपको किसी बात की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।"
मेरी बात सुनकर वह कुछ पल मुझे देखती रहीं। फिर मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, "तुम साथ हो न, बेटा? बस, अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए।"
मैंने उनका हाथ अपने हाथों में ले लिया।
काश, मैं उन्हें बता पाता कि उनके बेटे की अपनी ज़िंदगी भी कितनी उलझी हुई थी। वह मुझे अपनी ताकत समझ रही थीं, लेकिन सच तो यह था कि मैं खुद अंदर से बिखरा हुआ था।
मेरे जीवन में भी एक ऐसा रिश्ता था, जिसे मैं चाहकर भी भुला नहीं पाया था।
मीरा...
उसका नाम मन में आते ही जैसे मेरे भीतर कुछ टूटने लगा।
न जाने वह कैसी होगी? क्या अब भी उसे मेरा इंतज़ार होगा? या उसने भी मेरी तरह उन यादों को अपने दिल में छिपाकर जीना सीख लिया होगा?
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
कभी-कभी इंसान किसी को खोने के बाद भी उससे अलग नहीं हो पाता। वह दुनिया के सामने आगे बढ़ जाता है, लेकिन उसका दिल उसी मोड़ पर खड़ा रहता है, जहाँ से कोई अपना उसका हाथ छुड़ाकर चला गया था।
और मैं भी शायद वहीं खड़ा था।
कई घंटों के सफ़र के बाद ट्रेन अपने गंतव्य पर पहुँची।
माँ ट्रेन से उतरते ही बेचैनी से इधर-उधर देखने लगीं। उनकी आँखों में एक अजीब-सी चमक थी। वह उस शहर में वापस आई थीं, जहाँ उनकी ज़िंदगी का एक हिस्सा अब भी उनका इंतज़ार कर रहा था।
मैंने उनका सामान उठाया और हम स्टेशन से बाहर आ गए।
मैंने एक गाड़ी ली और हम नानी के घर की तरफ चल पड़े।
रास्ते भर माँ कभी खिड़की से बाहर देखतीं, तो कभी मुझसे कोई पुरानी बात पूछने लगतीं। उनके चेहरे पर खुशी थी, लेकिन उस खुशी के पीछे एक डर भी छिपा था।
शायद उन्हें डर था कि इतने सालों बाद पता नहीं उनकी माँ उन्हें उसी अपनापन से गले लगा पाएँगी या नहीं।
नानी के घर के बाहर पहुँचकर मुझे थोड़ी हैरानी हुई। मैं कुछ दिन पहले ही यहाँ आया था, और घर बिल्कुल वैसा ही था, जैसा मैं छोड़कर गया था। घर की हर चीज़ अपनी जगह पर थी, लेकिन आज वहाँ का माहौल कुछ अलग लग रहा था।
शाम ढलने लगी थी। न जाने क्यों, घर के बाहर कुछ लोगों को खड़ा देखकर मेरे मन में चिंता की एक लहर दौड़ गई। आखिर ऐसा क्या हो गया था, जिसकी वजह से इतने लोग घर के बाहर जमा थे?
मैंने माँ की तरफ देखा। वह भी उन लोगों को देखकर परेशान हो गई थीं।
मैं अपने मन में उठते सवालों को दबाते हुए, काँपते कदमों से माँ को लेकर दरवाज़े तक पहुँचा।
मामा दरवाज़े के पास ही खड़े थे। उनकी आँखें नम थीं और चेहरे पर गहरी उदासी छाई हुई थी। उन्हें इस हालत में देखकर मेरी चिंता और बढ़ गई।
जैसे ही उनकी नज़र मुझ पर पड़ी, वह तेज़ी से मेरी तरफ बढ़े। लेकिन अगले ही पल उनकी नज़र मेरे पीछे खड़ी माँ पर पड़ी और उनके कदम अचानक थम गए।
वह अविश्वास से माँ को देखने लगे, मानो अपनी आँखों के सामने खड़ी उस औरत को पहचानने के बावजूद यक़ीन नहीं कर पा रहे हों कि वह सचमुच उनके सामने है।
माँ का भी यही हाल था। वह मामा को एकटक देख रही थीं। उनकी आँखों में आँसू भर आए थे, लेकिन होंठों से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था।
कुछ पल के लिए वहाँ मौजूद हर इंसान जैसे खामोश हो गया।
मामा के होंठ काँपे। उन्होंने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, लेकिन आवाज़ गले में ही अटक गई।
फिर बड़ी मुश्किल से उनके मुँह से निकला—
"दीदी... आप?"
बस इतना सुनते ही माँ की आँखों से आँसू बह निकले।
"मेरा भाई..." वह रोते हुए बोलीं।
अगले ही पल मामा ने आगे बढ़कर माँ को अपने सीने से लगा लिया। दोनों इस तरह रो रहे थे, जैसे बरसों से दिल में दबा दर्द आज बाहर आने का रास्ता पा गया हो।
मैं चुपचाप उन्हें देख रहा था। एक तरफ़ अपनी माँ को अपने भाई से मिलते देखकर मेरे दिल को सुकून मिल रहा था, तो दूसरी तरफ़ घर के बाहर जमा लोगों और मामा की नम आँखों ने मेरे मन में कई सवाल खड़े कर दिए थे।
आख़िर ऐसा क्या हुआ था?
मामा इतने परेशान क्यों थे?
और घर के बाहर ये सारे लोग क्यों खड़े थे?
मैंने माँ और मामा को कुछ देर वैसे ही रहने दिया। इतने सालों बाद मिले भाई-बहन को शायद कुछ पल ऐसे चाहिए थे, जिनमें उन्हें किसी तीसरे की मौजूदगी का एहसास न हो।
लेकिन तभी मेरी नज़र दरवाज़े के भीतर खड़े एक बुज़ुर्ग आदमी पर पड़ी। उनके चेहरे पर भी चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी। वह बार-बार अंदर की तरफ़ देख रहे थे, जैसे किसी अनहोनी की आशंका से घिरे हों।
मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा।
मैंने मामा के कंधे पर हाथ रखा और धीरे से पूछा, "मामा, क्या हुआ है? घर के बाहर इतने लोग क्यों खड़े हैं? सब ठीक तो है न?"
मेरे सवाल पर मामा ने माँ से अलग होकर मेरी तरफ देखा। उनकी आँखें फिर से भर आईं।
कुछ पल तक वह खामोश रहे, फिर भारी आवाज़ में बोले—
"क्षितिज बेटा... तुम्हारी नानी की तबीयत बहुत ज़्यादा खराब है। डॉक्टर ने भी जवाब दे दिया है। वह बस एक ही रट लगाए बैठी हैं... कि मरने से पहले एक बार अपनी बेटी को देखना चाहती हैं।"
मामा की बात सुनते ही मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
मैंने तुरंत माँ की तरफ देखा।
उनके चेहरे का रंग उड़ चुका था। वह काँपते होंठों से बस इतना ही कह पाईं—
"नहीं... मेरी माँ मुझे छोड़कर नहीं जा सकतीं। मैं इतने सालों बाद उनसे मिलने आई हूँ। अभी तो मुझे उनसे कितनी सारी बातें करनी हैं..."
यह कहते हुए माँ घर के भीतर भागीं।
मैं भी उनके पीछे दौड़ पड़ा।
मेरे मन में बस एक ही प्रार्थना थी—हे भगवान, माँ को उनकी माँ से बात करने का थोड़ा-सा वक्त और दे देना।
क्योंकि कुछ मुलाक़ातें ऐसी होती हैं, जिनके लिए इंसान पूरी ज़िंदगी इंतज़ार करता है... और जब वह पल सामने आता है, तो उसे खो देने का डर साँसों तक को रोक देता है।