Money VS Me Part-31 in Hindi Human Science by fiza saifi books and stories PDF | Money Vs Me - Part 31

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Money Vs Me - Part 31

कमरे के अंदर नानी अपनी पुरानी-सी चारपाई पर लेटी हुई थीं। उनकी हालत पहले से भी कहीं ज़्यादा खराब लग रही थी। शरीर बिल्कुल कमज़ोर हो चुका था और चेहरे पर उम्र के साथ-साथ बीमारी की थकान भी साफ़ दिखाई दे रही थी। मामी उनके पैरों के पास बैठी रो रही थीं। पिछले तीन दिनों से नानी ने न तो अन्न का एक दाना खाया था और न ही पानी की एक बूँद पी थी।

माँ कमरे में दाखिल हुईं और नानी को उस हालत में देखते ही जैसे उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह लड़खड़ाते कदमों से उनके सिरहाने पहुँचीं और लगभग गिरते हुए उनके पास बैठ गईं।

उनके काँपते होंठों से बस एक ही शब्द निकला—

"माँ..."

मामी ने चौंककर माँ की तरफ देखा। अगले ही पल उनकी आँखें भर आईं और वह हल्का-सा मुस्कुरा दीं। शायद इतने दिनों से जिस पल का इंतज़ार था, वह आखिरकार आ गया था।

मामी ने नानी के पास झुककर प्यार से कहा, "माँजी, देखिए... मोहिनी दीदी आई हैं। और क्षितिज भी आया है।"

उन्होंने जैसे नानी को उठने के लिए एक आखिरी उम्मीद दी हो।

नानी की काँपती पलकों में हलचल हुई। उन्होंने बहुत धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं। उनकी बूढ़ी और धुँधली आँखें अपने सिरहाने बैठी उस औरत को देखने लगीं, जो फूट-फूटकर रो रही थी।

शायद उन्हें अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं हो रहा था।

उनके होंठ हिले। हाथ हल्का-सा काँपा, जैसे वह अपनी बेटी को छूकर यह यक़ीन करना चाहती हों कि वह सचमुच उनके पास आ गई है।

माँ ने तुरंत उनका हाथ अपने हाथों में ले लिया और उसे अपनी आँखों से लगा लिया।

"माँ... माँ, मैं हूँ। देखो, तुम्हारी मोहिनी आई है। इतने सालों बाद तुमसे मिलने आई हूँ, माँ। अब तो मुझसे बात करो। मुझे देखो, माँ... मैं तुम्हारी बेटी हूँ।"

माँ की आवाज़ में इतना दर्द था कि वहाँ मौजूद किसी भी इंसान के लिए अपने आँसू रोक पाना मुश्किल था।

वह नानी का हाथ पकड़े बार-बार उन्हें पुकार रही थीं।

"माँ, तुम मुझसे नाराज़ हो न? इसलिए मुझसे बात नहीं कर रही हो? अच्छा, मुझे डाँट लो। जितना चाहो डाँट लो, लेकिन ऐसे चुप मत रहो। मैंने बहुत देर कर दी, माँ। मुझे माफ़ कर दो।"

नानी की आँखें माँ के चेहरे पर टिकी हुई थीं। वह कुछ कहना चाहती थीं या शायद अपनी बेटी को बस देख लेना चाहती थीं, लेकिन उनका कमज़ोर शरीर उनका साथ नहीं दे रहा था।

मेरी आँखों के सामने यह सब देखकर आँसुओं का सैलाब उमड़ आया।

मैं अब वहाँ और खड़ा नहीं रह सका। चुपचाप कमरे से बाहर निकल आया।

शायद मैं सही समय पर माँ को नानी से मिलाने ले आया था। अगर कुछ घंटे और देर हो जाती, तो शायद माँ अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा पछतावा लेकर रह जातीं।

आँगन में आकर मैं एक तरफ बैठ गया। मेरा मन भारी हो रहा था। एक तरफ माँ थीं, जो बरसों बाद अपनी माँ से मिली थीं, और दूसरी तरफ़ नानी थीं, जिनकी साँसें अब उनका साथ छोड़ती हुई लग रही थीं।

तभी बिट्टो मेरे लिए पानी लेकर आई।

"भैया, पानी पी लीजिए।"

मैंने गिलास लिया और चुपचाप पानी पीने लगा। वह भी मेरे पास ही बैठ गई। नानी की हालत देखकर घर के बच्चे तक परेशान थे। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या होने वाला है।

मैंने बिट्टो को अपने पास खींचकर उसके सिर पर हाथ फेर दिया। वह चुपचाप मेरे साथ लगी बैठी रही।

कुछ पल के लिए मुझे लगा कि शायद सब ठीक हो जाएगा। शायद नानी माँ को अपने पास देखकर कुछ देर और रुक जाएँगी। शायद माँ को अपनी माँ के साथ कुछ वक्त बिताने का मौका मिल जाएगा।

लेकिन ज़िंदगी हमेशा हमारी उम्मीदों के मुताबिक कहाँ चलती है?

अभी मुश्किल से दस मिनट ही बीते होंगे कि अचानक घर के भीतर से रोने और चीखने की तेज़ आवाज़ें आने लगीं।

मैं और बिट्टो एक साथ उठे और तेज़ी से कमरे की तरफ़ दौड़े।

अंदर का दृश्य देखकर मेरा दिल काँप उठा।

माँ नानी के ऊपर झुकी हुई थीं और उन्हें सीने से लगाए ज़ोर-ज़ोर से रो रही थीं।

"माँऽऽ... आँखें खोलो! माँ, मुझे छोड़कर मत जाओ! मैं इतने सालों बाद तुम्हारे पास आई हूँ। अभी तो मुझे तुम्हारे साथ रहना है, माँ! तुम ऐसा नहीं कर सकतीं!"

मामी ने अपनी साड़ी का पल्लू मुँह में दबा रखा था। उनकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। वह नानी के पैरों के पास बैठी थीं और बार-बार उनके पैर सहला रही थीं, जैसे ऐसा करने से वह उन्हें वापस बुला लेंगी।

लेकिन नानी बिल्कुल शांत थीं।

उनकी आँखें बंद थीं और चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी।

वह शांति, जो अक्सर किसी इंसान के जीवन का आखिरी सच बन जाती है।

मैं वहीं दरवाज़े पर खड़ा रह गया। मेरे कानों में माँ की चीखें गूँज रही थीं, लेकिन मेरा पूरा शरीर जैसे सुन्न पड़ गया था।

तभी मामा मेरे पास आए। उनकी आँखें लाल थीं और चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था। उन्होंने मुझे कसकर अपने सीने से लगा लिया।

मैंने उन्हें पकड़कर पूछा, "मामा... नानी ठीक तो हैं न?"

मामा ने कोई जवाब नहीं दिया।

वह बस मुझे गले लगाए रोते रहे।

फिर कुछ पल बाद उनके काँपते होंठों से जो शब्द निकले, उन्होंने मेरी पूरी दुनिया हिलाकर रख दी।

"माँ चली गई, क्षितिज..."

मैं जैसे पत्थर का हो गया।

"नहीं...!" मेरे मुँह से बस इतना ही निकला।

मामा ने मुझे और कसकर पकड़ लिया।

"माँ चली गई, बेटा... अपनी बेटी का इंतज़ार करते-करते चली गई।"

मेरी नज़र माँ पर पड़ी। वह अब भी नानी से लिपटी हुई थीं और बार-बार उन्हें पुकार रही थीं।

"माँ, उठ जाओ... देखो, मैं आ गई हूँ। अब कहीं नहीं जाऊँगी। तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी, माँ। बस एक बार मुझसे बात कर लो..."

लेकिन नानी अब कोई जवाब नहीं दे सकती थीं।

मैंने पहली बार अपनी माँ को इस तरह टूटते हुए देखा था। जिस औरत को मैंने हमेशा हालात से लड़ते देखा, जो हर मुश्किल में अपने आँसू छिपाकर खड़ी रही, आज वही अपनी माँ के सामने एक बेबस बच्ची बन गई थी।

उस पल मुझे समझ आया कि कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिन्हें कोई अपना भी कम नहीं कर सकता।

माँ ने अपनी माँ को खो दिया था।

और नानी अपनी बेटी से मिलने की आखिरी इच्छा पूरी होने के बाद इस दुनिया से विदा हो गई थीं।

शायद उन्हें इसी पल का इंतज़ार था।

शायद वह अपनी बेटी का चेहरा देखे बिना जाना नहीं चाहती थीं।

और शायद अब उन्हें कोई शिकायत नहीं थी।

मैं धीरे-धीरे माँ के पास गया और उनके कंधे पर हाथ रखा। माँ ने मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में एक ऐसा खालीपन था, जिसे देखकर मेरा अपना दिल बैठ गया।

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और रोते हुए बस इतना कहा—

"क्षितिज... मैं बहुत देर से आई न, बेटा?"

मेरे पास उनके सवाल का कोई जवाब नहीं था।

मैंने उन्हें अपने सीने से लगा लिया।

"नहीं, माँ... आप आ गई थीं। नानी ने आपको देख लिया था।"

मैं उन्हें तसल्ली देने की कोशिश कर रहा था, लेकिन सच तो यह था कि मेरे अपने आँसू भी रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।

उस शाम उस घर में सिर्फ़ एक इंसान की मृत्यु नहीं हुई थी।

एक बेटी ने अपनी माँ को खोया था, एक बेटे ने अपनी माँ को खोया था, और एक परिवार ने अपने जीवन का वह हिस्सा खो दिया था, जिसे अब कभी वापस नहीं पाया जा सकता था।

और मैं...

मैं बस यही सोच रहा था कि ज़िंदगी कितनी अजीब है।

हम कभी अपनों से मिलने में देर कर देते हैं, कभी अपने दिल की बात कहने में, और कभी किसी को यह बताने में कि वह हमारे लिए कितना मायने रखता है।

फिर एक दिन अचानक वक्त हमारे हाथों से निकल जाता है।

पीछे रह जाती हैं कुछ यादें, कुछ अधूरे सवाल और एक ऐसा पछतावा, जिसका जवाब किसी के पास नहीं होता।

उस दिन मैंने अपनी माँ को उनकी माँ से मिलवाया था, लेकिन उसी दिन मैंने उन्हें हमेशा के लिए उनसे बिछड़ते हुए भी देख लिया।