Rebel in Hindi Spiritual Stories by Rakesh Nathani books and stories PDF | बागी : एक चेतना

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बागी : एक चेतना

ज़रा सोचिए... मोबाइल या कंप्यूटर में चाहे जितना बेहतरीन हार्डवेयर हो, दुनिया भर का ज्ञान इंटरनेट पर मौजूद हो, लेकिन अगर उसमें ऑपरेटिंग सिस्टम (OS) न हो, तो वह सिर्फ सिलिकॉन का एक बेजान डिब्बा बनकर रह जाता है।
 
ऑपरेटिंग सिस्टम ही वह अदृश्य धागा है जो बेजान मशीन में जान फूँकता है।
 
इंसानी शरीर की हकीकत भी ऐसी ही है। जब तक इस देह रूपी मशीन में चेतना रूपी OS का पहरा है, तब तक सुई की एक चुभन भी रूह तक महसूस होती है। लेकिन जब वह चेतना निकल जाती है, तब चाहे जितने वार करो, कोई सिग्नल दिमाग तक नहीं पहुँचता। शरीर बेजान हो जाता है।
 
शरीर हार्डवेयर है, चेतना उसका ऑपरेटिंग सिस्टम।
 
बाज़ार में 15,000 का फोन कौन खरीदेगा और 2 लाख का आईफोन किसके पास जाएगा, यह ग्राहक की जेब तय करती है। ठीक वैसे ही हमें कौन सा शरीर मिलेगा, यह हमारे हाथ में नहीं। हमारे कर्मों का हिसाब तय करता है कि हमारी चेतना को कौन सा शरीर मिलेगा। जहाँ जैसी ऊर्जा और जैसे कर्मों का ऋण होता है, चेतना वही देह धारण कर लेती है।
 
जब इंसान यह जान लेता है कि वह महज़ एक नश्वर ढांचा नहीं, बल्कि उस मूल स्रोत का एक सॉफ्टवेयर है, तब जीवन की सारी भागदौड़, ईर्ष्या और दिखावा अपने आप खत्म हो जाते हैं।
 
जब समझ आ जाता है कि हमारे हाथ में कुछ नहीं है—न जन्म चुनना, न अपने लोग तय करना—और बिना चेतना के इस शरीर की कीमत शून्य है, तब जीवन का पूरा गणित बदल जाता है।
 
तब हार्डवेयर को कोई मलाल नहीं रहता कि उसके आस-पास कौन है, क्योंकि वह जान जाता है कि यह देह सिर्फ उस मूल स्रोत तक पहुँचने का एक ज़रिया भर है।
 
अब बात आती है उस 'डेवलपर' यानी परमात्मा की। जब किसी चेतना का कनेक्शन सीधे उसके मुख्य डेवलपर से जुड़ जाता है, तो पूरा समीकरण बदल जाता है। जिस डेवलपर के पास असीम ऊर्जा है, जब चेतना उससे जुड़ती है, तो वह सीमाओं से आज़ाद हो जाती है।
 
यही वह जगह है जहाँ डर, मोह और अहंकार हमेशा के लिए मिट जाते हैं, और इंसान तलवार के साये में भी मुस्कुराना सीख जाता है!
 
शायद इसीलिए ऐसे लोगों को बागी कहा जाता है। जिन्हें सच की पहचान हो जाती है, वे दुनिया के किसी कृत्रिम साँचे में फिट नहीं बैठ पाते। वे समाज के थोपे हुए रीति-रिवाजों और जात-पात के भेदों को मानने से इनकार कर देते हैं। वे जानते हैं कि इंसान को बाँटने वाली दीवारें इंसानों ने बनाई हैं, उस असीम डेवलपर की कोडिंग में कोई भेदभाव नहीं है।
 
इतिहास गवाह है, जब-जब किसी ने समाज के अज्ञान और पाखंड का आइना दिखाया, दुनिया ने उनके हार्डवेयर को मिटाने की पूरी कोशिश की। सरमद फकीर को सरेआम शहीद किया गया, कबीर साहेब को प्रताड़ना झेलनी पड़ी, संत पलटू की झोपड़ी जला दी गई, सिख गुरुओं ने हँसते-हँसते यातनाएँ स्वीकारीं।
 
लेकिन सबसे खूबसूरत सच यही है—दुनिया उनके जिस्म को तो मिटा सकती है, पर उस चेतना का बाल भी बांका नहीं कर सकती जो अपने डेवलपर से जुड़ चुकी है। शरीर राख हो गए, पर उनके विचार और वाणी आज भी अमर हैं, क्योंकि उनका कोड हमेशा के लिए उस असीम स्रोत में अमर हो चुका है