सात फेरे
शिखा अपने भाई की गाड़ी में अपना व बच्चों का जरूरी सामान रखती जा रही थी । परंतु मन बहुत भारी था, 15 साल से वह इस घर से ,पति से, सास -ससुर से ,निभाते आ रही थी | 15 वर्ष पूर्व जब वह शादी होकर इस घर में आई थी तो कुछ हसीन सपने थे , नया जीवन शुरू करने की चाहत , कुछ इच्छाएं कुछ भविष्य की योजनायें थीं। सब एक- एक कर टूटते चले गये। वह हर परिस्थिति में समझौता करते आई थी । अब उसे अपना व बच्चों का भविष्य अंधकार में दिखने लगा था, तो विवश होकर उसने कड़ा कदम उठाया । अपने व दो बच्चों के भविष्य की चिंता उसे रात-रात भर सोने नहीं देती थी । और आकाश दिन और रात शराब के नशे में मस्त रहते ,सोए रहते थे ।
आकाश अपने माता-पिता का भी ध्यान नहीं देते थे । ससुर चंद्रभान गुप्ता बीमार हो जाते तो वही अपनी स्कूटी में बैठाकर डॉक्टर को दिखाने ले जाती थी , दवा लेकर आती । एक बार जब ससुर की तबियत ज्यादा खराब हो गई थी, तब भी उसी ने ही उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया था । आकाश उन्हें देखने नहीं गए थे । तब सासु माँ अस्पताल में सोती भर थी । बार-बार अस्पताल से घर आना-जाना, घर में खाना बनाना ,अपनी ड्यूटी करना, बच्चों को घर में पढाना व घर व बाहर काम करते-करते वह पूरी तरह थककर चूर हो जाती थी । परंतु आकाश को यह अनुभव भी नहीं होता था , शिखा कैसे करती है, पैसा कहां से लाती है, किस तरह घर बाहर सम्हालती है । ऐसी परिस्थितियों में सबसे ज्यादा बच्चो की पढाई प्रभावित होती है ,ध्यान न देने से बच्चे भी लापरवाह व चिडचिडे होते जा रहे हैं |
शिखा घर में सुबह पांच बजे से उठती घर बाहर सम्हालते - सम्हालते कब रात के 10:00 बज जाते उसे पता ही नहीं चलता था। फिर सास के व्यंग वाण भी चलते रहते " यह खाना ठीक नहीं है, बीमार आदमी के खाने का भी कोई ध्यान नहीं रख सकते । दवा टाइम पर नहीं आती ,आदि उलहाने सुनते-सुनते वह ऊब जाती थी ।
आकाश का रवैया उसे और परेशान कर देता । शुरू शुरू में आकाश प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे परंतु पीने की लत के कारण वह नौकरी भी छूट गई । वे महीने में 15- 15 दिन छुट्टी मना लेते थे । पीकर घर में या कभी किसी दोस्त के घर सोए रहते थे । जब 15 - 15 दिन छुट्टी मनाएंगे तो प्राइवेट कंपनी वाला भी कब तक झेलेगा ? आखिर वहां से नौकरी छूट गई ,शिखा भी प्राइवेट स्कूल में गणित की टीचर है । प्राइवेट स्कूलों में तो वेतन ठीक से नहीं मिलता , गणित विषय होने के कारण उसे ट्यूशन मिल जाते थे ,तो वह खर्चा निकाल लेती थी परंतु घर में भी सब काम करना ,बच्चों को पढाना होता था । तो ट्यूशन के लिए भी टाइम नहीं मिल पाता था ।
आकाश की नौकरी छूट जाने पर अपनी एक सहेली के पति से कहकर शिखा ने आकाश की नौकरी किसी दूसरी कंपनी में बड़े प्रयासों से लगवा भी दी थी । परंतु दूसरी जगह भी वह ड्यूटी ठीक से नहीं करते थे । किसी तरह वहां छः महीने काम किया फिर वहां से भी नौकरी छूट गई ।
धीरे-धीरे ज्यादा शराब पीने के कारण आकाश की तबीयत खराब रहने लगी उसको फिट्स आने लगे । वे कहीं पर भी गिर जाते थे, गिर जाने के कारण चोटे लग जाती थी फिर शिखा को उसकी भी दवाई करनी पड़ती थी । वह सोचती कहां-कहां देखे ----- ?
बीमार पति , सास - ससुर , छोटे बच्चे , घर का काम , अपनी ड्यूटी ---- फिर वह भी तो इंसान है - उसे भी आराम , मन को सकून , कही कोई अपनापन ------ कभी तो रैस्ट चाहता है, इंसान ----- शिखा को कुछ भी नहीं मिलता था । समय-समय पर पति और सास के व्यंग वाण सुनते पढ़ते थे, तो उसका मन छलनी हो जाता था । ---कभी भी उसे न तो किसी का सहारा मिलता था ना ही प्रशंसा के दो शब्द ,---और ना ही कोई अपनापन , ---आखिर जीने के लिये कोई तो सहारा चाहिए, उसे कुछ भी नसीब नहीं होता था.
आकाश की शराब की आदत छुड़वाने के लिए उसने क्या नहीं किया ? उन्हें समझाती तो थी ही,शराब छुड़ाने के लिए दवाई, बैगा , पंडित सभी तरह के प्रयास कर डाले उसने । परंतु छुटने के बजाय लत और बढ़ती ही गईं । वह सब तरफ से निराशा होती चली गई । पिता से निरंतर उपेक्षा पाकर बच्चे भी तनाव में रहने लगे थे । घर का वातावरण कभी भी खुशनुमा नहीं रहता था, हर समय पैसों की तंगी बनी रहती थी । 15 वरसों में शिखा ने पति या सास से कभी प्रेम स्वरूप 10 रुपये तक की भी भेंट नहीं पाई थी । कितना भी जन्मदिन हो , शादी की वर्षगांठ हो या कोई त्यौहार - होली , दिवाली - वह कुछ नहीं जानती । खुशियां क्या होती हैं ?
मायके से हर साल भाई - भाभी आते तो वे ही उसको व बच्चों को कपड़े दिलवा देते थे ,वही कपड़े साल भर पहनती थी पति ने कभी उसे एक साड़ी तो क्या रुमाल भी खरीद कर नहीं दिया था । ना बच्चों के लिए कभी कुछ खरीद कर दिया - आकाश बच्चों के लिए कभी कुछ लाये भी होंगे तो दुकान से उधार ले आते थे ,फिर शिखा को ही वह पैसे पटाने पड़ते थे अपना दर्द वह किसी से कह भी तो नहीं सकती थी ।
ऐसा झेलते – झेलते 15 वर्ष हो गए, अब उसका धैर्य जवाब देने लगा था । बच्चों का भविष्य भी उसे असुरक्षित लगने लगा था, बहुत विचार विमर्श के बाद अपना दिल कड़ा करके उसने मायके भाई के साथ आने का निर्णय लिया था । कितनी यंत्रणा,मानसिक तनाव , दर्द से भरा यह निर्णय है । मायके में मां और पिता दोनों में से कोई भी तो नहीं है ,जिसके सामने वह अपना दिल खोल सके । भाई भाभियों से कहने का मतलब है घर की बात------ पति के शराबी होने की बात सब रिश्तेदारों में फैलाना था------ भाभियों अपनी सखियों व अपने रिश्तेदारों से कहे बिना तो रहेगी ही नहीं ,और सबके सामने शिखा अपमानित होना नहीं चाहती थी । वर्षों से अपने दर्द को अपने दिल में छुपा कर रख रही थी, फिर उसने बड़े भाई से अपनी सब व्यथा कहीं - भाई भाभी कई बार आकर आकाश को समझा चुके थे , परंतु आकाश पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था, जैसे चिकना घड़ा ।
शिखा गाड़ी में सामान रखने के बाद घर से निकलने से पहले - सास के पैर छूकर बोली — अच्छा , माता जी कुछ कहा सुना होगा ,तो माफ़ करना -
सासू मां बोली —“ ठीक है घूम फिर कर आ जाओ, कोई मां-बाप भी बेटी को नहीं रख पाते ,तुम्हारे भाई भाभी भी क्या रखेंगे ,सब घर फोड़ने वाले हैं ,काम अपने घर से ही चलता है ।“
आकाश और सासु मां को लग रहा था कि बच्चों वाली बहन को भाई भी कितने दिन रखेंगे ? लड़ झगड़कर शिखा यही आएगी जाएगी . उसका यहां के अलावा कहीं गुजारा ही नहीं हो सकता । इधर शिखा अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित थी इसलिए वह आकाश से बच्चों को अलग रखना चाहती थी ।
शिखा ने कुछ नहीं कहा - बेबशी से निहारते हुये उसने पति से कहा - अच्छा चलती हूँ ।
आकाश बोले - ठीक है , कितने दिनों के लिए जा रही हो ? कब वापस आओगी ?
शिखा बोली — " अब आने के लिए नहीं जा रही हूं।" कहकर आँखों में आँसू लिए शिखा गाड़ी में बैठ गई । उसकी नज़रें घर की ओर ही लगी थी । यद्यपि वह उसका किराए का घर था फिर भी पिछले 15 वर्षों की यादें सुख-दुख इसी घर से जुड़े रहे थे , घर भी साथी हो गया था इसलिए घर से जाते समय घर भी उसे खींच रहा था । दिल कड़ा करके घायल हिरनी सी वह गाड़ी में बैठ गई । मन में कई सवाल, कई जवाब ,कई शंकाएं ,कुशंकाएं थी, जैसे मन में विचारों की आंधी चल रही थी । अनिश्चित भविष्य -----? आकाश उसे गाड़ी तक छोड़ने भी नहीं आए ।
आखिर वह मायके दुर्ग आ गई, रात में भाई के घर में प्रवेश करने से उसे लगा जैसे दुनिया वाले उसे नहीं देख रहे हैं ,इतना दुख उठा कर पति ग्रह से आई थी , फिर भी उसे लग रहा था, जैसे वह कोई गलत काम करके आई है । यही है भारतीय नारी की मानसिक चेतना या संस्कार । आज तक नारी अपने सहनशक्ति की सजा भोगती आई है ,वह अपनी धारणाओं अपने संस्कारों से निकल नहीं पाती ।
एक महीने बाद दुर्गा प्राइवेट स्कूल में उसे नौकरी मिल गई । वह काम पर जाने लगी ,बच्चों को भी उसने स्कूल में दाखिला करवा दिया ,नौकरी लगने के बाद वह अलग से भाई के घर के ऊपरी भाग में बच्चों के साथ रहने लगी ।
बीच-बीच में आकाश फोन करके बच्चों व शिखा से बात करते रहते थे, कभी-कभी वापस आने के लिए भी कहते थे ,उन्होंने ही बताया था कि पापा बीमार चल रहे हैं ,अब तक पापा की देखभाल शिखा ही करती थी । अब पापा की देखभाल मां करती है ।
एक दिन ननंद प्रथा का फोन आया " पापा की तबीयत ठीक नहीं है मैं यही आई हुयी हूं । "
शिखा बोली — आप लोग उनका ध्यान रखना । पापा को अस्थमा का अटैक जब तब आ जाता है, मैं जानती हूं ।
प्रथा ने कहा — "पापा की हालत ज्यादा खराब है वे आई.सी.यू में भर्ती है ,आप देखने के नाम से तो आ जाओ ।"
शिखा बोली — " दीदी 15 साल तक मैं भी आई.सी.यू में थी ,तब किसी ने भी नहीं पूछा - मैं कैसे जी रहा हूं । अब मैं कुछ भी निश्चय नहीं कह सकती । मैं भी अपनी ड्यूटी व बच्चो की पढ़ाई में व्यस्त रहती हूं ।"
इसी बीच आकाश के चाचा के भी फोन आए कि वह देखने के नाम पर आ जाए या समाज में बदनामी के लिहाज से ही आ जाए परंतु शिखा ने दृढ़ निश्चय कर लिया था कि अब वह आकाश के घर नहीं जाएगी तो नहीं गई ।
अब वह अलग से घर में रह रही है तो आकाश बार-बार फोन पर कहते थे "--- अब तो तुम अकेली रहती हो ,मैं तुम्हारे पास आ जाता हूं । या तो तुम यहां आ जाओ या मैं आ जाता हूं । " आकाश की नौकरी तो बहुत पहले ही छूट गई थी परंतु शिखा अपने बच्चों को आकाश से अलग रखना चाहती थी ,इसलिए आकाश जब - जब उसके पास आकर रहने के लिए कहते वह मना कर देती थी ।
शिखा अपने बच्चों की पढ़ाई लिखाई का बहुत ध्यान रखती थी इसलिए वह खुद कड़ी मेहनत करती थी ,उसकी आशाओं का केंद्र अभिलाषाओं का बिंदु अब प्रतीक उसका बेटा ही था । बेटा प्रतीक मां की मेहनत व भावनाओं को समझता था । बड़ी लगन से वह पढ़ता था, एम . एस. सी करने के बाद वह यू.पी. एस. सी परीक्षा भी पास करता गया , उसका आई. ए. एस हो गया और एडिशनल कलेक्टर के रूप में उसकी पोस्टिंग कोंडागांव में हो गई । शिखा को उसकी अथक मेहनत का फल मिल गया । वह बेहद खुश थी जैसे ईश्वर ने उसकी हर परीक्षा का प्रतिफल इकट्ठा दे दिया हो ।
परंतु नारी को जीवन में कभी भी मुक्ति नहीं मिलती । आकाश के पिताजी का देहांत हो गया, शिखा को खबर मिली थी परंतु वह तब भी नहीं गई । कुछ दिनों बाद सास भी स्वर्ग सिधार गई । अब आकाश बिल्कुल अकेले हो गये थे । मां के जीवित रहते तक बहन प्रथा आर्थिक रूप से मदद करती रहती थी । आकाश पिता के मरने के बाद भी नहीं सुधरे थे । माता के मरने के बाद प्रथा ने पैसे भेजने बंद कर दिये तो आकाश ने कई बार प्रथा से पैसे भेजने के लिए तरह-तरह की खुशामदे की ।
आकाश ने कई बार बहाने बनाये । पर प्रथा अब समझ चुकी थी ,उसने भी पैसे भेजना बंद कर दिये । आकाश थक हार कर बिना बताए शिखा के घर आ पहुंचे । अब शिखा क्या करती ? और उसे साथ रखना ही पड़ा ।
अपने अनेको सपने के खून, सैकड़ो अरमानों के बलिदान, अपने यौवन की महत्वाकांक्षाओं के धाराशाही होने के साथ-साथ कठिन संघर्ष व त्याग के साथ मन की घुटन व अंतर द्वंद के बीच भी शिखा आकाश को रखने से मना नहीं कर पाई । क्या है इन सात फेरो का चक्कर जो भारतीय नारी उससे निकल नहीं पाती ?
छतीसगढ़ रत्न
डॉ.शिरोमणि माथुर
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