मैं जहाँ से आती हूँ, वह एक बहुत छोटा-सा गाँव था।
इतना छोटा कि खेती के अलावा गुज़ारा करने के ज़्यादा रास्ते दिखाई नहीं देते थे। ज़्यादातर परिवार अपनी खेती करते थे या दूसरों के खेतों में मजदूरी करके घर चलाते थे। हमारा परिवार भी उन्हीं में से एक था।
लेकिन मेरे माँ-पापा की सोच हमारे हालात से कहीं बड़ी थी।
माँ अक्सर हम बहनों से कहती थीं, “हमने ज़िंदगी में जितना संघर्ष किया है, तुम लोगों को उतना नहीं करना पड़े। बस पढ़ाई करना।”
पापा भी यही चाहते थे। दूसरे एपिसोड में मैंने आपको बताया था कि मैं छोटी उम्र से माँ के साथ काम पर जाती थी। घर की हालत ऐसी थी कि जो हाथ काम कर सकते थे, उनसे मदद लेनी पड़ती थी। मगर जैसे ही मैं पाँचवीं कक्षा में जाने लगी, पापा ने एक दिन मुझे रोक दिया।
उस सुबह मैं माँ के साथ खेत जाने के लिए तैयार हो रही थी। पापा ने मेरे हाथ से काम पर ले जाने वाला कपड़ा लिया और कहा, “अब तुम खेतों में काम करने नहीं जाओगी।”
मैंने हैरानी से पूछा, “क्यों, पापा?”
“क्योंकि अब तुम्हारा काम पढ़ना है।”
मैंने घर के भीतर देखा। माँ बाकी बहनों को सँभाल रही थीं। “लेकिन घर में इतना काम है।”
पापा मुस्कुराए। “काम मैं कर लूँगा। तुम पढ़ो।”
मैंने फिर पूछा, “सच में मुझे खेत नहीं जाना?”
“हाँ। स्कूल जाना है।”
उस वक्त मैं छोटी थी। मुझे लगा, पापा मुझे सिर्फ काम से छुट्टी दे रहे हैं। आज समझती हूँ कि उन्होंने उस दिन मेरे लिए समय निकालने का फैसला किया था—ऐसे घर में, जहाँ हर घंटे और हर हाथ की जरूरत थी।
हमारे गाँव में स्कूल केवल चौथी कक्षा तक था। आगे पढ़ने के लिए करीब सात किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। यह सुनने में जितना आसान लगता है, रोज़ तय करना उतना आसान नहीं था। रास्ते के लिए समय चाहिए था, पढ़ाई का सामान चाहिए था और घर का खर्च भी चलाना था।
पापा ने एक दुकान में काम शुरू किया। सुबह हमें स्कूल के लिए तैयार करते और खुद अपने काम पर निकल जाते। माँ घर और छोटी बहनों को सँभालतीं।
हमारी मुश्किलें खत्म नहीं हुई थीं। फर्क बस इतना था कि अब मेरे दिन का बड़ा हिस्सा खेत के बजाय पढ़ाई के लिए रखा गया था।
मैंने भी तय किया कि पापा का यह फैसला बेकार नहीं जाने दूँगी।
स्कूल में जब पढ़ाने वाले कोई सवाल पूछते, मैं जवाब देने की कोशिश करती। जो बात समझ नहीं आती, उसे घर जाकर दोबारा पढ़ती। धीरे-धीरे मुझे पढ़ाई में मज़ा आने लगा। परीक्षा हुई तो मेरी कक्षा में सबसे अच्छे अंक आए।
रिज़ल्ट लेकर मैं घर पहुँची तो पापा ने कागज़ मेरे हाथ से लिया और कई बार देखा।
“बेटी, ऐसे ही मन लगाकर पढ़ती रही ना,” उन्होंने कहा, “तो एक दिन तू अपना और हमारा, दोनों का नाम रोशन करेगी।”
मैं मुस्कुरा दी। माँ ने मुझसे पूछा, “पहले नंबर पर आई है?”
मैंने सिर हिलाया तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया। उस दिन घर में कोई बड़ी दावत नहीं हुई थी। जो खाना रोज़ बनता था, वही बना। मगर खाते समय पापा बार-बार मेरा रिज़ल्ट देख रहे थे। उनकी खुशी देखकर मुझे लग रहा था जैसे मैंने उन्हें कुछ बहुत कीमती दे दिया हो।
एक साल बीता। फिर दूसरा।
मैं आगे की कक्षाओं में पहुँचती गई। मेरे अंक अच्छे आते रहे, लेकिन पढ़ाई का रास्ता भी लंबा होता गया। अब स्कूल लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर था।
पापा ने फिर रास्ता निकाला। उन्होंने उसी जगह एक कपड़ों की दुकान पर नौकरी कर ली, जहाँ मेरा स्कूल था। अब हम साथ आते-जाते थे। इस नौकरी में पहले से कुछ ज़्यादा तनख्वाह भी मिलने लगी।
सुबह निकलते समय माँ मेरे हाथ में खाना देतीं। पापा दुकान की ओर जाते और मैं स्कूल की ओर। शाम को जब उनका काम पूरा होता, हम वापस गाँव आते।
कई बार दुकान बंद होने में देर हो जाती। मैं बाहर बैठकर अपनी कॉपी खोल लेती। पापा मुझे देखकर कहते, “इतना पढ़ लेगी तो घर जाकर क्या करेगी?”
मैं कहती, “घर पर छोटी बहनें मेरी किताब माँग लेंगी। यहाँ शांति है।”
पापा हँस देते।
फिर दसवीं की परीक्षा आई।
रिज़ल्ट वाले दिन मैं जितनी घबराई हुई थी, उतने शायद पापा भी थे। अच्छे अंक देखकर पहले मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। पापा ने ध्यान से देखा, फिर मुझे देखा। उनकी आँखों में वही गर्व था जो पहले रिज़ल्ट के दिन देखा था, मगर इस बार वह कुछ कह नहीं पा रहे थे।
खबर गाँव तक पहुँची। आसपास के शहरों में पढ़ने वाली कई लड़कियों से भी मेरे अंक ज़्यादा थे। लोग माँ-पापा को बधाई देने लगे।
कुछ दिन बाद गाँव के सरपंच जी ने हमें बुलाया। मैं पापा के साथ उनके सामने गई। उन्होंने अपनी जेब से एक सुंदर-सी कलाई घड़ी निकाली और मेरे हाथ में बाँध दी।
“यह मेरी तरफ से तुम्हारे लिए,” उन्होंने कहा।
मैंने घड़ी को देखा। “मेरे लिए?”
“हाँ। तुमने अपने माता-पिता के साथ पूरे गाँव का नाम रोशन किया है।”
मैं कुछ बोल नहीं पाई। मैंने पहले कभी अपने हाथ में ऐसी घड़ी नहीं पहनी थी।
सरपंच जी ने पापा की ओर देखा। “मधुकर, एक बात याद रखना। कुछ भी हो जाए, बेटियों की पढ़ाई मत रोकना।”
पापा ने सिर हिलाया।
फिर सरपंच जी मेरी ओर इशारा करके बोले, “तुम्हारी बेटी ने मेरे अपने बेटे से भी ज़्यादा अंक हासिल किए हैं। मुझे इस पर गर्व है।”
घर लौटते समय मैं बार-बार अपनी कलाई देख रही थी। पापा ने पूछा, “समय देख रही है या घड़ी?”
“दोनों,” मैंने कहा।
वह हँस पड़े। आज भी उस दिन को याद करती हूँ तो सबसे पहले घड़ी नहीं, पापा की हँसी याद आती है।
लेकिन दसवीं के बाद हमारे सामने एक नया सवाल था—आगे क्या पढ़ूँ?
घर में कोई ऐसा नहीं था जो मुझे अलग-अलग विषयों और उनसे आगे मिलने वाले रास्तों के बारे में ठीक से बता सके। कोई कहता, “साइंस ले लो।” कोई कहता, “इतना खर्च क्यों करना, आर्ट्स ठीक रहेगा।” कुछ लोग अब भी पूछते थे, “आखिर लड़की को कितना पढ़ाओगे?”
मैं खुद उलझी हुई थी। डॉक्टर बनने का सपना मन में था, पर सपने और वहाँ तक पहुँचने का रास्ता दो अलग चीज़ें थीं।
एक शाम पापा ने मुझे बुलाया।
“बेटी, मैं तुझे डॉक्टर बनाना चाहता हूँ।”
मैं कुछ पल उन्हें देखती रही। बचपन में उन्होंने मुझसे यह बात कही थी। मुझे लगा था शायद घर की हालत देखकर वह भी उसे भूल गए होंगे।
“डॉक्टर?” मैंने पूछा।
“हाँ।”
“मैं साइंस ले लूँगी,” मैंने कहा, “लेकिन उसके बाद का खर्च?”
मैंने बात पूरी भी नहीं की थी कि माँ बोलीं, “तू उसकी चिंता मत कर।”
पापा ने कहा, “मेहनत करना तेरी जिम्मेदारी है। बाकी हम देख लेंगे।”
मुझे पता था कि “हम देख लेंगे” कहना उनके लिए आसान नहीं था। वह घर की जरूरतें मुझसे कहीं बेहतर जानते थे। इसलिए मैंने भी उनसे कोई और वादा नहीं माँगा। विज्ञान में प्रवेश लिया और पढ़ाई में जुट गई।
साल भर किताबों, कक्षाओं और परीक्षाओं में निकल गया। मैंने अच्छे अंक हासिल किए। रिज़ल्ट लेकर घर आई तो इस बार पापा ने घड़ी की ओर देखा और कहा, “अब आगे की तैयारी शुरू कर।”
लेकिन आगे की तैयारी के लिए पैसे चाहिए थे।
मेडिकल की पढ़ाई के लिए मुझे अहमदनगर जाना था। हमारे परिवार ने एक साथ इतनी बड़ी रकम कभी देखी ही नहीं थी। हालत यह थी कि प्रवेश आवेदन भरने का खर्च भी हमें सोचकर करना पड़ रहा था।
मैंने पहली बार पापा से कहा, “अगर अभी संभव नहीं है तो मैं…”
उन्होंने मुझे बात पूरी नहीं करने दी। “तू अपनी पढ़ाई के बारे में सोच। बाकी रास्ता ढूँढेंगे।”
मैंने सिर हिला दिया, मगर रात को सोते समय डर लगता था। अगर रास्ता न मिला तो? क्या इतनी दूर तक आकर मेरा सपना रुक जाएगा?
तभी सरपंच जी फिर हमारे साथ खड़े हुए।
उनकी बेटी प्रीति भी मेडिकल की पढ़ाई करना चाहती थी। उन्होंने उसका आवेदन भरा और साथ में मेरा भी। हम दोनों को दाखिला मिल गया। जब फीस का सवाल आया, तब भी सरपंच जी ने मेरी मदद की।
मुझे वह दिन याद है जब पापा उनके सामने खड़े होकर कुछ कहना चाह रहे थे, पर शब्द नहीं मिल रहे थे।
सरपंच जी ने उनसे कहा, “मधुकर, अभी धन्यवाद मत दो। इन दोनों को डॉक्टर बनकर लौटने दो।”
प्रीति मेरे साथ खड़ी थी। उसने मेरी ओर देखकर धीरे से कहा, “तो अहमदनगर चलें?”
मैं हँस पड़ी। “चलें।”
आज भी सोचती हूँ कि उस समय सरपंच जी ने साथ न दिया होता तो मेरा रास्ता कितना मुश्किल हो जाता। उन्होंने मेरे लिए फीस भरी थी, लेकिन मुझे उस मदद के साथ एक जिम्मेदारी भी महसूस हुई—मुझे पढ़ाई पूरी करनी थी।
अहमदनगर पहुँचे तो एक और चिंता सामने आई। हम रहेंगे कहाँ?
हम दोनों को गर्ल्स हॉस्टल में जगह मिल गई। छोटे-से कमरे में सामान रखते समय प्रीति ने अपना बैग एक बिस्तर पर रखा और पूछा, “यह वाला मेरा?”
“अगर खिड़की के पास वाला मुझे मिले,” मैंने कहा।
“तो तय रहा।”
हम दोनों हँस दिए। नया शहर था, नया कॉलेज था। डर भी था, उत्साह भी। हम गाँव से आई दो लड़कियाँ थीं, जो पहली बार अपने परिवार से इतनी दूर रह रही थीं।
कॉलेज के शुरुआती दिनों में ही हमें समझ आ गया कि पढ़ाई के अलावा भी बहुत कुछ झेलना पड़ेगा।
हमारा पहनावा शहर से आई कुछ लड़कियों जैसा नहीं था। टी-शर्ट और जीन्स हमारे लिए रोज़ की चीज़ें नहीं थीं। हम बोलते समय थोड़ा झिझकते थे। कुछ लड़के-लड़कियाँ इसे देखकर हँसते।
एक दिन कॉलेज के गलियारे में किसी ने हमारी ओर देखकर कहा, “अरे, गाँव वाली डॉक्टर आ गईं।”
कुछ लोग हँसे। प्रीति ने मेरी ओर देखा और चलते-चलते अपनी किताबें सीने से लगा लीं।
मैं रुकी। उस लड़की की ओर देखा जिसने यह कहा था। मेरे मन में जवाब आया, लेकिन उस समय बोलती तो शायद गुस्से में बोलती। मैंने प्रीति से कहा, “क्लास शुरू होने वाली है। चल।”
उस दिन हॉस्टल पहुँचकर प्रीति चुप थी।
“तुझे बुरा लगा?” मैंने पूछा।
“तुझे नहीं लगा?”
“लगा,” मैंने कहा। “लेकिन उन्होंने हमारा रिज़ल्ट अभी देखा कहाँ है?”
प्रीति ने मेरी ओर देखा और पहली बार मुस्कुराई।
मज़ाक एक दिन में बंद नहीं हुआ। कभी हमारे कपड़ों पर टिप्पणी होती, कभी बोलने के तरीके पर। कुछ बार वरिष्ठ छात्रों के व्यवहार से हम दोनों असहज भी हुए। हम पढ़ाई के लिए आई थीं, और यह सब हमारे लिए नया था।
मगर हम हर बात चुपचाप मन में रखकर कमजोर भी नहीं पड़ना चाहती थीं। हम साथ रहतीं, जो व्यवहार गलत लगता उसे समझतीं, और अपनी पढ़ाई पर ध्यान देतीं। शाम को कमरे में लौटकर कभी प्रीति गुस्सा निकालती, कभी मैं। फिर किताबें खोल लेते।
पहला साल आसान नहीं था।
घर की याद आती थी। फीस और खर्च की चिंता रहती थी। पढ़ाई कठिन थी। फिर भी जब कभी मन डगमगाता, मैं अपनी कलाई पर बँधी सरपंच जी की घड़ी देखती। मुझे पापा का दुकान के बाहर मेरा इंतज़ार करना याद आता। माँ का कहना याद आता—तुम लोगों को उतना संघर्ष नहीं करना पड़े, बस पढ़ाई करना।
परीक्षाएँ हुईं।
रिज़ल्ट वाले दिन मैं और प्रीति साथ खड़ी थीं। हमने अपने अंक देखे, फिर एक-दूसरे की तरफ देखा।
हम दोनों अच्छे अंकों से पास हुई थीं। जिन लोगों ने पूरे साल हमारा मज़ाक उड़ाया था, उनमें से कई से हमारे अंक ज़्यादा थे।
प्रीति ने धीरे से कहा, “गाँव वाली डॉक्टरें पास हो गईं।”
मैं हँस पड़ी। “हाँ। अब अगले साल की पढ़ाई भी करनी है।”
उस दिन मुझे अच्छा लगा कि हमने मेहनत से अपने लिए जगह बनाई थी। हम वही लड़कियाँ थीं, वही कपड़े पहनती थीं, उसी तरह बोलती थीं। लेकिन अब हम अपनी कक्षा में खुद को लेकर पहले से कहीं ज़्यादा सहज थीं।
मैंने मन में सोचा—गरीबी रास्ता मुश्किल कर सकती है। लोग मेरे बोलने या पहनने पर हँस सकते हैं। कभी-कभी मैं खुद भी थक सकती हूँ। फिर भी मैं अगला कदम उठा सकती हूँ।
मुझे उस समय लगा था कि मेडिकल कॉलेज की सबसे कठिन परीक्षा शायद पूरी हो गई।
लेकिन मैं गलत थी।