Chhathi Maiya ka Aashirvad - 1 in Hindi Motivational Stories by Aloka Patel books and stories PDF | छठी मैया का आशीर्वाद - भाग 1

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छठी मैया का आशीर्वाद - भाग 1

भाग १ — मैया का पहला संकेत

गंगा के किनारे बसा वह छोटा-सा गाँव सूर्योदय के साथ ही जाग जाता था।

सुबह के पाँच बजे थे।

आसमान अभी अँधेरा था, लेकिन पूरब की दिशा में हल्की लालिमा दिखाई देने लगी थी। दूर मंदिर की घंटियों की मधुर आवाज़ सुनाई दे रही थी।

“जय छठी मैया…”

किसी घर से धीमे स्वर में छठी मैया का गीत सुनाई दे रहा था।

इसी आवाज़ के साथ सावित्री की आँखें खुल गईं।

पिछले कई दिनों से गाँव में छठ पूजा की तैयारियाँ शुरू हो चुकी थीं।

गाँव की महिलाएँ घरों की सफाई कर रही थीं। कोई घाट की सफाई कर रहा था, तो कोई प्रसाद के लिए गुड़, गेहूँ और फलों की व्यवस्था कर रहा था।

लेकिन सावित्री के घर में खुशी से ज्यादा चिंता थी।

सावित्री लगभग पैंतीस वर्ष की थी। उसकी शादी को दस साल हो चुके थे।

उसका पति माधव गाँव में एक छोटी-सी दुकान चलाता था।

दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे।

लेकिन उनके जीवन में एक खालीपन था…

संतान का।

दस साल में उन्होंने कई डॉक्टरों को दिखाया था।

कई दवाइयाँ ली थीं।

कई मन्नतें माँगी थीं।

लेकिन सावित्री की गोद खाली ही रही।

गाँव वालों की बातें अब उसके दिल को चुभने लगी थीं।

“अभी तक कोई बच्चा नहीं हुआ?”

“डॉक्टर को दिखाया है?”

“कोई व्रत करो… शायद भगवान सुन लें।”

ऐसी बातें सुनकर सावित्री बाहर से मुस्कुरा देती, लेकिन अंदर से टूट जाती।

उस दिन भी वह घर की सफाई कर रही थी।

माधव दुकान खोलने के लिए निकल रहा था। दरवाजे पर पहुँचकर उसने पीछे मुड़कर सावित्री को देखा।

“सावित्री…”

“हाँ?”

“इस बार छठ पूजा के लिए तुम ज्यादा मेहनत मत करना।”

सावित्री हल्का-सा मुस्कुराई।

“मैया की पूजा है माधव। मेहनत नहीं करूँगी तो कौन करेगा?”

माधव उसके पास आया।

“मुझे पता है तुम्हारी श्रद्धा कितनी है। लेकिन तुम पिछले कुछ दिनों से बहुत थक जाती हो।”

सावित्री ने उसकी आँखों में देखा।

“माधव, इस बार मैं छठी मैया से सिर्फ एक चीज माँगूँगी।”

माधव चुप रहा।

सावित्री की आँखों में आँसू आ गए।

“मुझे माँ बनने का सुख दे दें।”

माधव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“अगर मैया की इच्छा होगी तो जरूर देंगी।”

सावित्री ने धीमे स्वर में कहा—

“इस बार मुझे अंदर से लगता है कि कुछ बदलने वाला है।”

माधव मुस्कुराया।

“तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?”

सावित्री के पास कोई जवाब नहीं था।

“बस… ऐसा लगता है।”

शाम को सावित्री गंगा घाट पर गई।

छठ पूजा में अब कुछ ही दिन बाकी थे।

घाट पर कई महिलाएँ सफाई कर रही थीं।

सावित्री भी हाथ में झाड़ू लेकर घाट की सीढ़ियाँ साफ करने लगी।

सूरज धीरे-धीरे अस्त हो रहा था।

अचानक उसे पानी में कुछ चमकता हुआ दिखाई दिया।

वह थोड़ा आगे बढ़ी।

किनारे पर लाल कपड़े में बंधी एक छोटी-सी पोटली पड़ी थी।

सावित्री थोड़ी घबरा गई।

उसने आसपास देखा।

कोई दिखाई नहीं दिया।

उसने धीरे से पोटली उठाई।

अंदर से किसी धातु के टकराने की आवाज़ आई।

सावित्री ने पोटली खोली।

अंदर सूर्य की आकृति वाली एक छोटी-सी चाँदी की मूर्ति थी।

उसके साथ एक कागज भी था।

सावित्री ने कागज खोला।

उस पर केवल एक वाक्य लिखा था—

“जहाँ विश्वास होता है, वहाँ इंतज़ार कभी व्यर्थ नहीं जाता।”

सावित्री की आँखें फैल गईं।

इन शब्दों को पढ़ते ही उसके पूरे शरीर में एक अजीब-सी सिहरन दौड़ गई।

तभी पीछे से एक वृद्ध महिला की आवाज़ आई—

“वह तुम्हें मिल गया?”

सावित्री तुरंत पीछे मुड़ी।

सफेद साड़ी पहने एक वृद्ध महिला वहाँ खड़ी थी।

“क्या?”

वृद्धा ने पोटली की ओर देखा।

“जिसका तुम इंतज़ार कर रही थीं।”

सावित्री को कुछ समझ नहीं आया।

“माता, आप क्या कह रही हैं?”

वृद्धा धीरे से मुस्कुराईं।

“यह तुम्हारे लिए है।”

“लेकिन… इसे यहाँ कौन रखकर गया?”

वृद्धा ने कोई जवाब नहीं दिया।

उन्होंने केवल इतना कहा—

“छठ पूजा के दिन सूर्योदय से पहले गंगा किनारे आना।”

सावित्री कुछ और पूछती, उससे पहले ही वृद्धा वहाँ से जाने लगी।

“माता! आप कौन हैं?”

वृद्धा ने पीछे मुड़कर देखा।

“जिसका नाम तुम रोज़ लेती हो… उस पर विश्वास रखना।”

और फिर वह भीड़ में कहीं गायब हो गई।

सावित्री बहुत देर तक वहीं खड़ी रही।

उसके हाथ में चाँदी की छोटी-सी मूर्ति थी।

दिल में हजारों सवाल थे।

लेकिन एक बात साफ थी—

शायद छठी मैया ने उसे कोई संकेत दिया था।

उस रात सावित्री को नींद नहीं आई।

उसने मूर्ति को अपने पूजा स्थान पर रखा।

दीया जलाया।

हाथ जोड़कर आँखें बंद कर लीं।

“मैया… अगर यह सच में आपका संकेत है, तो मुझे रास्ता दिखाइए।”

दीये की लौ अचानक तेज हो गई।

सावित्री की आँखों से आँसू बहने लगे।

उसी क्षण बाहर से किसी बच्चे के हँसने की आवाज़ आई।

सावित्री चौंक गई।

उसने दरवाजा खोला।

बाहर कोई नहीं था।

सिर्फ चाँदनी रात…

और दूर गंगा के किनारे से आती एक आवाज़—

“जय छठी मैया…”

सावित्री के दिल में पहली बार उम्मीद का दीपक जला।

लेकिन उसे पता नहीं था…

यह तो केवल शुरुआत थी।