Chhathi Maiya ka Aashirvad - 3 in Hindi Motivational Stories by Aloka Patel books and stories PDF | छठी मैया का आशीर्वाद - भाग 3

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छठी मैया का आशीर्वाद - भाग 3

भाग ३ — छठ व्रत का संकल्प

लेखिका: अलोका पटेल

सावित्री की आँखों में उस रात नींद नहीं थी।

गंगा घाट पर मिली वह छोटी-सी चाँदी की मूर्ति उसके सामने रखी थी। दीये की लौ लगातार जल रही थी।

वह बार-बार उसी कागज़ को पढ़ रही थी—

“जहाँ विश्वास होता है, वहाँ इंतज़ार कभी व्यर्थ नहीं जाता।”

वृद्ध महिला के शब्द भी उसके कानों में गूँज रहे थे—

“छठ पूजा के दिन सूर्योदय से पहले गंगा किनारे आना।”

आखिर वह वृद्धा कौन थी?

और उसे सावित्री के मन की बात कैसे पता थी?

इन सवालों का कोई जवाब उसके पास नहीं था।

लेकिन एक चीज़ उसके मन में बिल्कुल साफ थी—

इस बार वह छठ व्रत का संकल्प जरूर लेगी।

सुबह होते ही सावित्री ने माधव को सारी बात बता दी।

माधव कुछ देर तक चुप बैठा रहा।

“तुमने वह मूर्ति घर में रख ली?”

“हाँ।”

“और उस वृद्धा ने तुम्हें छठ के दिन घाट पर आने को कहा?”

सावित्री ने सिर हिलाया।

माधव ने गहरी साँस ली।

“सावित्री, मैं तुम्हारी श्रद्धा को रोकना नहीं चाहता। लेकिन हमें किसी अनजान व्यक्ति की बात पर…”

सावित्री ने उसकी बात बीच में ही रोक दी।

“माधव, मैं किसी चमत्कार के पीछे नहीं भाग रही।”

उसकी आवाज़ में अजीब-सा विश्वास था।

“मैं बस अपनी मन्नत पूरी करना चाहती हूँ।”

माधव ने उसकी ओर देखा।

दस सालों में उसने सावित्री को बहुत बार रोते देखा था।

लेकिन आज उसकी आँखों में आँसू नहीं थे।

आज उनमें उम्मीद थी।

माधव ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।

“ठीक है। जो तुम्हारा विश्वास है, मैं तुम्हारे साथ हूँ।”

सावित्री की आँखें भर आईं।

“सच?”

“हाँ।”

“चाहे व्रत कितना भी कठिन क्यों न हो?”

माधव मुस्कुराया।

“तुम व्रत रखोगी, तो मैं भी तुम्हारे साथ रहूँगा।”

सावित्री ने हाथ जोड़ लिए।

“जय छठी मैया।”

🌅 छठ की तैयारी

अगले दिन से सावित्री ने छठ पूजा की तैयारी शुरू कर दी।

घर की सफाई हुई।

पूजा का स्थान साफ किया गया।

गेहूँ धोकर सुखाया गया।

गुड़ और आटे से प्रसाद बनाने की तैयारी होने लगी।

सावित्री की पड़ोसन कमला भी उसके घर आई।

“इस बार तुम छठ व्रत कर रही हो?”

सावित्री ने मुस्कुराकर कहा—

“हाँ।”

कमला ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

“मन से करना। छठी मैया के सामने दिल की बात कह देना।”

सावित्री की आँखें नम हो गईं।

“मैं दस साल से यही तो कर रही हूँ कमला…”

कमला कुछ पल चुप रही।

फिर बोली—

“कभी-कभी भगवान हमारी प्रार्थना सुनने में देर करते हैं… लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने हमारी प्रार्थना सुनी नहीं।”

ये शब्द सावित्री के दिल में उतर गए।

उस रात सावित्री ने पूजा के स्थान पर बैठकर छठी मैया के सामने संकल्प लिया।

उसने दीपक जलाया।

हाथ जोड़कर आँखें बंद कीं।

“छठी मैया…”

उसकी आवाज़ काँप रही थी।

“मैं नहीं जानती कि मेरे जीवन में क्या लिखा है। मैं यह भी नहीं जानती कि मेरी गोद में कभी बच्चा आएगा या नहीं।”

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

“लेकिन आज से मैं शिकायत नहीं करूँगी।”

माधव दूर खड़ा उसकी बात सुन रहा था।

सावित्री ने आगे कहा—

“मैं आपकी पूजा पूरे विश्वास से करूँगी। अगर मेरी इच्छा पूरी होनी है तो आपकी कृपा से होगी… और अगर नहीं भी होनी है, तो मुझे उसे स्वीकार करने की शक्ति देना।”

माधव की आँखें भी नम हो गईं।

सावित्री ने सिर झुका दिया।

“बस एक बार अपनी कृपा का संकेत दे देना, मैया।”

अचानक कमरे में हल्की-सी हवा चली।

दीये की लौ काँपी।

और चाँदी की मूर्ति पर पड़ी रोशनी अचानक चमक उठी।

सावित्री ने आँखें खोल दीं।

वह कुछ क्षण मूर्ति को देखती रही।

माधव भी आगे आया।

दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा।

“देखा?” सावित्री ने धीमे से कहा।

माधव ने कुछ नहीं कहा।

उसके पास भी कोई जवाब नहीं था।

🌸 छठ का पहला दिन

छठ पूजा का पहला दिन आ गया।

सुबह से ही गाँव में उत्साह था।

घरों से लोकगीतों की आवाज़ आ रही थी।

बच्चे घाट की सजावट देख रहे थे।

महिलाएँ प्रसाद तैयार कर रही थीं।

सावित्री ने भी पूरे नियम और श्रद्धा से पूजा की तैयारी की।

लेकिन दोपहर होते-होते अचानक उसके सिर में तेज दर्द होने लगा।

माधव घबरा गया।

“सावित्री, तुम आराम कर लो।”

“नहीं।”

“तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है।”

सावित्री मुस्कुराई।

“मैय्या का व्रत है। मैं पीछे नहीं हटूँगी।”

माधव ने उसे देखा।

“लेकिन तुम्हारी तबीयत…”

सावित्री ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“माधव, इस बार मैं डरना नहीं चाहती।”

उसकी आवाज़ में दृढ़ता थी।

“दस साल मैंने इंतज़ार किया है। अब कुछ दिन श्रद्धा से भी इंतज़ार कर लूँगी।”

माधव चुप हो गया।

शाम होते ही सावित्री पूजा की सामग्री लेकर घाट की ओर चल पड़ी।

गंगा का पानी सुनहरी रोशनी में चमक रहा था।

हजारों दीपक जल रहे थे।

हर तरफ एक ही आवाज़ सुनाई दे रही थी—

“छठी मैया की जय!”

सावित्री ने पानी की ओर देखा।

उसके हाथ अपने आप जुड़ गए।

तभी उसे सामने वही सफेद साड़ी वाली वृद्ध महिला दिखाई दी।

सावित्री का दिल जोर से धड़कने लगा।

“माता…”

वृद्धा ने उसकी ओर देखा।

लेकिन इस बार उनके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

उन्होंने सिर्फ हाथ उठाकर गंगा की ओर इशारा किया।

सावित्री ने पीछे मुड़कर नदी की ओर देखा।

पानी में सूर्य की आखिरी किरणें चमक रही थीं।

जब उसने दोबारा पीछे देखा…

वृद्धा वहाँ नहीं थीं।

सावित्री हैरान रह गई।

माधव ने पूछा—

“क्या हुआ?”

सावित्री ने धीरे से कहा—

“वही माता थीं…”

“कौन?”

“जिन्होंने मुझे मूर्ति दी थी।”

माधव ने चारों ओर देखा।

लेकिन वह महिला कहीं दिखाई नहीं दी।

तभी सावित्री की नजर पानी पर पड़ी।

लहरों के बीच उसे कुछ दिखाई दिया।

एक छोटा-सा दीया धीरे-धीरे उसकी ओर बहता हुआ आ रहा था।

सावित्री ने हाथ जोड़ लिए।

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

उसके मन में एक ही बात आई—

“मैया ने मेरा संकल्प स्वीकार कर लिया है।”

लेकिन वह नहीं जानती थी कि अगले दिन…

उसके जीवन में ऐसा कुछ होने वाला था,

जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।