Chhathi Maiya ka Aashirvad - 2 in Hindi Motivational Stories by Aloka Patel books and stories PDF | छठी मैया का आशीर्वाद - भाग 2

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छठी मैया का आशीर्वाद - भाग 2

भाग २ — छठी मैया की पहली परीक्षा

सूरज धीरे-धीरे ढलने लगा था।

आसमान में लालिमा छा रही थी और गाँव के हर घर में छठ पूजा की तैयारियाँ शुरू हो गई थीं। गलियों में साफ-सफाई हो रही थी। घरों के आँगन में रंगोली बनाई जा रही थी और चारों तरफ छठी मैया के मधुर गीत सुनाई दे रहे थे।

सावित्री भी अपने आँगन में पूजा की तैयारी कर रही थी।

उसने ठेकुआ बनाए थे, फल रखे थे और पूजा की टोकरी तैयार कर ली थी।

लेकिन इन सबके बीच उसका मन एक ही जगह अटका हुआ था।

उसका छोटा बेटा आरव पिछले दो दिनों से बीमार था।

सावित्री बार-बार उसके पास जाकर उसके माथे पर हाथ रखती।

“हे छठी मैया… मेरे बच्चे को ठीक कर दीजिए।”

आरव बिस्तर पर लेटा हुआ था।

कुछ देर बाद उसने आँखें खोलीं।

“माँ…”

“हाँ बेटा?”

“आप छठी मैया की पूजा करने जाएँगी ना?”

“हाँ बेटा।”

“तो मैं भी आपके साथ चलूँगा।”

सावित्री कुछ पल के लिए चुप हो गई।

उसके चेहरे पर मुस्कान आई, लेकिन आँखों में आँसू भर गए।

“हाँ बेटा… तुम भी मेरे साथ चलोगे।”

रात होते-होते आरव का बुखार फिर बढ़ गया।

रघु घबरा गया।

“सावित्री, अब देर मत करो। इसे डॉक्टर के पास लेकर चलते हैं।”

सावित्री भी परेशान थी।

लेकिन जाने से पहले उसने छठी मैया की मूर्ति के सामने दीपक जलाया।

हाथ जोड़कर बोली,

“मैया… मैं आपके दरबार में खाली हाथ आई हूँ। मेरे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं है। बस मेरी श्रद्धा है। मेरे बच्चे को अपनी छत्रछाया में रखना।”

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

वह रात सावित्री के लिए बहुत लंबी थी।

वह आरव के पास बैठी रही।

कभी उसके सिर पर हाथ फेरती, तो कभी छठी मैया का नाम लेती।

धीरे-धीरे रात बीत गई।

सुबह सूरज की पहली किरण खिड़की से अंदर आई।

आरव ने अचानक आँखें खोल दीं।

“माँ…”

सावित्री तुरंत उसके पास गई।

“क्या हुआ बेटा?”

आरव ने धीरे से कहा,

“माँ… अब मुझे अच्छा लग रहा है।”

सावित्री को विश्वास नहीं हुआ।

उसने उसके माथे पर हाथ रखा।

बुखार काफी कम हो चुका था।

उसकी आँखों से खुशी के आँसू निकल पड़े।

उसने दोनों हाथ जोड़ दिए।

“छठी मैया… आपने मेरी प्रार्थना सुन ली।”

रघु भी हैरानी से आरव को देखने लगा।

“यह तो किसी चमत्कार से कम नहीं है।”

सावित्री धीरे से बोली,

“जब भक्ति सच्ची हो… तो मैया अपने भक्त को कभी अकेला नहीं छोड़तीं।”

शाम होते ही गाँव के घाट पर लोग इकट्ठा होने लगे।

कोई सिर पर पूजा की टोकरी लेकर जा रहा था, तो कोई हाथ में फल लिए हुए था।

महिलाएँ छठी मैया के गीत गाती हुई घाट की ओर जा रही थीं।

सावित्री भी आरव का हाथ पकड़कर घाट की ओर चल पड़ी।

रास्ते में अचानक उसकी नजर एक वृद्ध महिला पर पड़ी।

वह महिला अकेली खड़ी थी।

उसके कपड़े पुराने थे और चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी।

उसने सावित्री की ओर देखकर धीरे से कहा,

“बेटी… थोड़ा प्रसाद मिलेगा?”

सावित्री की टोकरी में प्रसाद बहुत कम था।

उसे पता था कि अर्घ्य के बाद परिवार के लिए भी प्रसाद बचाना जरूरी था।

लेकिन उस वृद्ध महिला की आँखों में ऐसी विनती थी कि सावित्री मना नहीं कर पाई।

उसने टोकरी से एक ठेकुआ निकाला और वृद्ध महिला के हाथ में रख दिया।

वृद्ध महिला ने ठेकुआ लिया और सावित्री की ओर देखकर मुस्कुराई।

“बेटी, तुमने आज सिर्फ मुझे प्रसाद नहीं दिया…”

सावित्री हैरानी से उसकी ओर देखने लगी।

वृद्ध महिला ने आगे कहा,

“तुम अपनी भक्ति की परीक्षा में सफल हुई हो।”

सावित्री के शरीर में जैसे सिहरन दौड़ गई।

“काकी… आप क्या कह रही हैं?”

वृद्ध महिला ने कोई जवाब नहीं दिया।

बस इतना कहा,

“आज घाट पर जो होगा… वह तुम्हारी पूरी जिंदगी बदल देगा।”

इतना कहकर वह भीड़ में आगे बढ़ गई।

सावित्री कुछ देर तक उसे देखती रही।

फिर उसने रघु से पूछा,

“यह महिला कौन थी?”

रघु ने पीछे मुड़कर देखा।

लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

वह वृद्ध महिला जैसे अचानक गायब हो गई थी।

सावित्री के मन में एक अजीब-सी भावना पैदा हुई।

उसके कदम घाट की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन उसके मन में सिर्फ एक सवाल था—

“क्या वह सच में एक साधारण वृद्ध महिला थी… या फिर छठी मैया स्वयं मेरी परीक्षा लेने आई थीं?”

और सावित्री को पता नहीं था कि कुछ ही देर में घाट पर ऐसा कुछ होने वाला था…

जो उसके परिवार के वर्षों पुराने एक छिपे हुए रहस्य का दरवाजा खोलने वाला था।