बांसुरी की धुन भाग : 10 in Hindi Moral Stories by prem chand hembram books and stories PDF | बांसुरी की धुन - भाग 10

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बांसुरी की धुन - भाग 10

भाग : 10
तापस दा के घर का वातावरण कुछ देर पहले की अपेक्षा अब शांत था।
बरामदे में बैठे लोगों के सामने चाय के नए कुल्हड़ रखे जा चुके थे। बातचीत का स्वर भी बदल गया था। थोड़ी देर पहले जहाँ शब्दों में तनाव था, अब वहाँ प्रश्न थे—और उन प्रश्नों के भीतर उत्तर खोजने की बेचैनी।
लेकिन किसी को पता नहीं था कि बरामदे से कुछ दूर खड़ा वह अनजान व्यक्ति अभी भी गाँव की सीमा पर था।
उसने पीछे मुड़कर एक बार तापस दा के घर की ओर देखा।
फिर अपनी मुट्ठी में दबे कागज को कसकर पकड़ लिया।
और तेज कदमों से जंगल की ओर बढ़ गया।
उधर तापस दा की बेटी ने सबको चाय देते हुए कहा—
“रावण दा, आपकी चाय।”
रावण दा ने कुल्हड़ हाथ में लिया।
लेकिन उनकी दृष्टि दूर कहीं टिकी थी।
लाल दा ने उनकी ओर देखा।
लाल दा: “क्या सोच रहे हैं रावण दा?”
रावण दा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
रावण: “कुछ नहीं लाल दा।”
लाल दा ने उनकी आँखों में देखा।
लाल दा: “आप जब ‘कुछ नहीं’ कहते हैं, तब समझ जाता हूँ कि भीतर बहुत कुछ चल रहा है।”
रावण दा मुस्कुराए।
तापस दा ने भी दोनों की ओर देखा।
तापस: “क्या बात है?”
रावण दा ने चाय का एक छोटा घूँट लिया।
फिर बोले—
रावण: “आज जो हुआ, वह केवल आज की घटना नहीं है। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं।”
तापस दा कुछ पूछते, उससे पहले बाहर से किसी के तेज कदमों की आवाज सुनाई दी।
सभी की निगाहें दरवाजे की ओर उठ गईं।
एक किशोर हाँफता हुआ बरामदे में आया।
उसके हाथ में एक मुड़ा हुआ कागज था।
वह सीधे रावण दा के सामने आकर रुक गया।
किशोर: “रावण दा... यह आपके लिए है।”
रावण दा ने कागज की ओर देखा।
उन्होंने उसे लेने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन अचानक रुक गए।
रावण: “यह तुम्हें किसने दिया?”
किशोर ने कुछ क्षण झिझककर कहा—
“मुझे नहीं मालूम।”
रावण: “कहाँ मिला?”
किशोर: “गाँव के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे।”
रावण दा ने कागज ले लिया।
कागज पुराना था।
उस पर केवल कुछ शब्द लिखे थे—
“रावण हेंब्रम यहाँ पहुँच चुका है।”
और नीचे—
“देवघर।”
बरामदे में फिर सन्नाटा छा गया।
रामलाल ने कागज को देखते हुए पूछा—
रामलाल: “देवघर से कोई आया है क्या?”
रावण दा ने उत्तर नहीं दिया।
उन्होंने कागज को दोबारा पढ़ा।
फिर मोड़कर अपने पास रख लिया।
लाल दा ने धीरे से पूछा—
लाल दा: “यह वही बात है जिसकी आपको आशंका थी?”
रावण दा ने उनकी ओर देखा।
कुछ क्षण मौन रहने के बाद बोले—
रावण: “शायद।”
तापस दा ने बेचैनी से पूछा—
तापस: “क्या आप दोनों हमें कुछ छिपा रहे हैं?”
लाल दा ने रावण दा की ओर देखा।
रावण दा ने सिर झुका लिया।
फिर बोले—
रावण: “कुछ बातें ऐसी होती हैं तापस, जिन्हें समय से पहले बता दिया जाए तो उनका अर्थ बदल जाता है।”
तापस दा चुप हो गए।
रामलाल को अब बेचैनी होने लगी थी।
रामलाल: “लेकिन दादा, यदि कोई खतरा है तो हमें जानने का अधिकार है।”
रावण दा ने उसकी ओर देखा।
रावण: “खतरा है या नहीं, यह अभी कहना जल्दबाजी होगी।”
उन्होंने कागज अपनी मुट्ठी में दबा लिया।
रावण: “लेकिन इतना जरूर समझ लो—आज यहाँ जो प्रश्न उठे हैं, वे केवल तुम्हारे घर तक सीमित नहीं रहने वाले।”
रामलाल की आँखों में चिंता दिखाई देने लगी।
सलमा ने धीरे से अपनी बेटियों को अपने पास बुला लिया।
तभी सिनाराम मुर्मू ने पूछा—
सिनाराम: “देवघर का नाम क्यों लिखा है?”
रावण दा ने उनकी ओर देखा।
कुछ क्षण तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर रावण दा बोले—
रावण: “क्योंकि मेरी यात्रा वहीं से शुरू हुई थी।”
सिनाराम चौंक गए।
सिनाराम: “तुम्हारी यात्रा?”
रावण दा ने धीरे से कहा—
रावण: “हाँ। लेकिन वह यात्रा किसी एक स्थान की यात्रा नहीं थी। वह प्रश्नों की यात्रा थी।”
लाल दा ने बात आगे बढ़ाई—
लाल दा: “रावण दा ने वर्षों पहले एक प्रश्न पूछा था—मनुष्य मनुष्य से अलग क्यों है?”
रावण दा ने उनकी ओर देखा।
लाल दा चुप हो गए।
सिनाराम ने पूछा—
सिनाराम: “और उसका उत्तर मिला?”
रावण दा मुस्कुराए।
रावण: “मिला... लेकिन उत्तर ने मेरे सामने दस नए प्रश्न खड़े कर दिए।”
तापस दा ने पूछा—
तापस: “कौन-से प्रश्न?”
रावण दा ने बरामदे के बाहर देखा।
सूरज अब काफी ऊपर आ चुका था।
रावण: “क्या धर्म जन्म से मिलता है?
क्या धर्म मनुष्य चुनता है?
क्या प्रकृति किसी मनुष्य को दूसरे से छोटा बनाती है?
और सबसे बड़ा प्रश्न...”
उन्होंने रुककर सबकी ओर देखा।
रावण: “क्या मनुष्य भगवान को बाँट सकता है?”
सिनाराम के चेहरे पर फिर गंभीरता उतर आई।
रावण दा ने आगे कहा—
रावण: “इन प्रश्नों के उत्तर खोजते-खोजते मैं कई लोगों से मिला। कुछ ने मुझे शास्त्र बताए। कुछ ने परंपराएँ बताईं। कुछ ने डर दिखाया। कुछ ने प्रेम दिया।”
उन्होंने धीरे से कहा—
रावण: “लेकिन अंततः मुझे लगा कि सत्य को किसी एक व्यक्ति के हाथ में कैद नहीं किया जा सकता।”
लाल दा ने धीमे स्वर में कहा—
लाल दा: “और इसी कारण आपकी राह आसान नहीं रही।”
रावण दा ने कोई उत्तर नहीं दिया।
सिनाराम ने कागज की ओर देखा।
फिर पूछा—
सिनाराम: “क्या देवघर में कोई ऐसा व्यक्ति है जो तुम्हें रोकना चाहता है?”
रावण दा ने तुरंत उत्तर नहीं दिया।
उनके चेहरे पर पहली बार एक हल्की चिंता दिखाई दी।
उन्होंने धीमे और अत्यंत चिंतित स्वर में कहा—
रावण: “जब भगवान कृष्ण आए, तब भी कितने लोग उन्हें पहचान नहीं सके। राम के जीवन में भी ऐसी विपरीत परिस्थितियाँ आईं, जब माता सीता का हरण हुआ। महापुरुषों के जीवन में आने वाली ये घटनाएँ केवल कथा नहीं हैं। वे मनुष्य को धर्म की राह दिखाने के लिए परिस्थितियों को रचती हैं।”
सभी चुपचाप सुन रहे थे।
रावण दा ने आगे कहा—
रावण: “जब परिस्थिति विपरीत हो, तब भी मनुष्य को अनुकूल रास्ता खोजने की कला सीखनी चाहिए। ज्ञान की यही परंपरा रही है।”
उन्होंने लाल दा की ओर देखा।
उनकी आवाज अब कुछ शांत हो गई थी।
रावण: “खैर... मैं और लाल, दोनों ने ज्ञानदान को सर्वोपरि माना है। आगे ठाकुर जी की इच्छा।”
लाल दा ने सिर झुका दिया।
कुछ क्षण तक दोनों के बीच कोई शब्द नहीं हुआ।
मानो दोनों जानते थे कि आगे का रास्ता उनके हाथ में पूरी तरह नहीं है।
सिनाराम ने धीरे से पूछा—
सिनाराम: “क्या तुम्हें डर लगता है?”
रावण दा ने उसकी ओर देखा।
फिर हल्की मुस्कान के साथ बोले—
रावण: “डर तो मनुष्य होने की निशानी है, सिनाराम दा। लेकिन डर के कारण सत्य की खोज छोड़ देना—यह मेरे लिए संभव नहीं।”
उन्होंने कहा—
रावण: “व्यक्ति आता है और चला जाता है। विचार उससे अधिक समय तक जीवित रहते हैं।”
तभी रामलाल की नजर बाहर पड़ी।
वह अचानक उठ खड़ा हुआ।
रामलाल: “दादा... वहाँ देखिए!”
सभी ने बाहर देखा।
पीपल के पेड़ के नीचे मिट्टी पर किसी के पैरों के निशान साफ दिखाई दे रहे थे।
एक नहीं...
दो अलग-अलग व्यक्तियों के पैरों के निशान थे।
और दोनों निशान जंगल की ओर जा रहे थे।
रामलाल वापस बरामदे में आया।
उसने कुछ कहना चाहा, लेकिन तभी उसकी नजर रावण दा पर पड़ी।
रावण दा पहले से ही सब समझ चुके थे।
उन्होंने केवल इतना कहा—
“अब हमें सावधान रहना होगा।”
सिनाराम ने पूछा—
“क्यों?”
रावण दा ने उस पुराने कागज को फिर से खोला।
इस बार उसके पीछे की ओर एक और पंक्ति दिखाई दी, जो पहले किसी की नजर में नहीं आई थी।
उन्होंने उसे पढ़ा।
उनका चेहरा गंभीर हो गया।
कागज पर लिखा था—
“जिस दिन तुमने उन्हें प्रश्न करना सिखाया, उसी दिन से तुम्हें रोकने वाले पैदा हो गए।”
कुछ क्षण तक रावण दा उस पंक्ति को देखते रहे।
फिर उन्होंने कागज मोड़ दिया।
लाल दा ने धीरे से पूछा—
“अब क्या होगा?”
रावण दा ने बाहर उगते सूर्य की ओर देखा।
रावण: “अब असली परीक्षा शुरू होगी।”
दूर जंगल में अचानक किसी पक्षी ने तेज आवाज में पुकारा।
और उसी क्षण...
पीपल के पेड़ के पीछे से किसी की परछाईं धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
वह कुछ क्षण रुकी।
फिर गायब हो गई।
लेकिन जाते-जाते उसने मिट्टी में कुछ गिरा दिया था।
एक छोटी-सी काली माला।
और उसके साथ बंधा था एक लाल धागा।
रहस्य अब केवल देवघर तक सीमित नहीं था।
कोई यहाँ था।
और वह सबकी बातें सुन रहा था।

क्रमशः......