आराध्या और रेयांश का अधूरा मिलन। परिवार वालों ने दोनों की बात सुनकर उनका विवाह तय कर दिया था। कांकेर में ही छोटा सा विवाह हुआ।
पर विवाह के दिन ही एक ऐसी घटना हुई जिसने पूरी रात को बदल दिया।
विवाह के बाद जब आराध्या ससुराल आई तो रेयांश के पिताजी ने कहा, "रेयांश, तुमने भोपाल में नौकरी छोड़ दी, यहाँ शिक्षक की नौकरी करोगे, पर घर की जिम्मेदारी कैसे संभलेगी?"
रेयांश कुछ न बोला। आराध्या को लगा कि रेयांश फिर से अपने मन की बात उससे छुपा रहा है।
रात हुई। कमरे को सजाया गया था। फूल, दीपक, सुगंध। बाहर सब लोग सो चुके थे।
आराध्या लाल जोड़े में बैठी थी। हृदय धड़क रहा था। यह वही क्षण था जिसका उसने सपना देखा था।
रेयांश कमरे में आया। द्वार बंद किया। आराध्या ने सिर झुका लिया।
कुछ क्षण शांति रही। फिर रेयांश ने कहा, "आराध्या, मुझे क्षमा कर दो।"
आराध्या ने चौंक कर देखा, "क्षमा? किस बात के लिए?"
"आज पिताजी ने जो कहा, वह सत्य है। मेरे पास अभी अधिक धन नहीं है। तुम्हें वह सुख नहीं दे पाऊँगा जिसकी तुम अधिकारी हो। मुझे लग रहा है कि मैंने तुम्हारे साथ अन्याय किया है।"
आराध्या की आँखों में आँसू आ गए। "रेयांश, फिर वही बात? विवाह वाले दिन भी तुम धन की बात कर रहे हो? क्या मैंने कभी धन माँगा?"
"नहीं माँगा, पर मैं देना चाहता हूँ।"
"तुमने मुझसे पूछा था कि चौथे पाठ पर क्या था? चौथे पाठ पर प्रेम था। केवल प्रेम। न धन था, न सुख की वस्तुएँ थीं। केवल दो हृदय थे। आज पाँचवे पाठ पर तुम फिर से उसी भय में हो।"
रेयांश चुप हो गया। वह खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। बाहर वर्षा हो रही थी। कोमलदेव पुस्तकालय वाली सड़क पर सन्नाटा था।
आराध्या ने कहा, "आज हमारी सुहागरात है रेयांश। यह सज़ा की रात क्यों बना रहे हो? तुम वहाँ खड़े हो, मैं यहाँ बैठी हूँ। यह दूरी क्यों?"
रेयांश ने कहा, "यह सज़ा मैं तुम्हें नहीं, अपने आप को दे रहा हूँ। क्योंकि मैं तुम्हें अधूरा लग रहा हूँ।"
आराध्या उठी और उसके पास गई। उसने उसका हाथ पकड़ा।
"रेयांश, देखो मुझे। मैं आराध्या हूँ। वही आराध्या जो पुस्तकालय में तुम्हारे साथ घंटों बैठती थी। जिसे तुम्हारे साथ दो कुल्हड़ चाय में ही सुख मिल जाता था। मुझे महल नहीं चाहिए, मुझे तुम्हारा साथ चाहिए। अगर यह सज़ा है तो हम दोनों साथ भुगतेंगे, पर अलग-अलग नहीं।"
रेयांश की आँखें भर आईं। उसने पहली बार समझा कि प्रेम में सज़ा जैसी कोई बात नहीं होती। प्रेम में केवल साथ होता है।
उस रात दोनों ने कोई बड़ा वचन नहीं लिया। दोनों ने केवल एक दूसरे का हाथ पकड़ कर बैठे रहे। बाहर वर्षा होती रही। अंदर दो हृदय एक दूसरे को समझते रहे।
आराध्या ने कहा, "आज से हमारा हर दिन नया पाठ होगा। आज पाँचवा पाठ है। इसका नाम है - सुहागरात नहीं, सज़ा की रात से सीख की रात।"
रेयांश मुस्कुराया। "तुमने मुझे फिर से सिखा दिया कि प्रेम क्या है।"
"और तुमने मुझे सिखाया कि प्रतीक्षा क्या है।"
उस रात फूल वैसे ही रहे, दीपक जलते रहे, पर दो लोगों ने यह सीखा कि विवाह केवल सजावट से नहीं, समझ से बनता है।
सुबह जब माँ ने द्वार खटखटाया तो देखा कि दोनों एक ही मेज पर बैठे लिख रहे थे। एक नई कहानी। जिसका नाम था - "पाँचवे पाठ से आगे"
माँ ने पूछा, "तुम दोनों सोए नहीं?"
आराध्या ने कहा, "सोए थे माँ, पर हृदय जाग रहा था।"
और इस तरह सुहागरात, जो सज़ा की रात बनने वाली थी, वह सीख की रात बन गई।- आराध्या और रेयांश का पवित्र और सच्चा प्रेम।
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