ek Anjana Sa Ishq in Hindi Love Stories by trisha books and stories PDF | एक अनजाना सा इश्क - भाग 6

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एक अनजाना सा इश्क - भाग 6



वह रात जो सुहागरात नहीं, सज़ा की रात बन गई थी, धीरे-धीरे सीख की रात बन गई थी। बाहर वर्षा हो रही थी, अंदर दो हृदय एक दूसरे को समझने का प्रयत्न कर रहे थे। न कोई सजावट काम आई थी, न कोई फूल। काम आया था तो केवल एक हाथ का दूसरे हाथ को थाम लेना।


रात भर दोनों सोए नहीं। उसी मेज पर बैठे रहे जिस पर रेयांश की किताब रखी थी। आराध्या लाल जोड़े में थी, पर अब उसे जोड़े का भार नहीं लग रहा था। रेयांश सफेद कुर्ते में था, पर अब उसके चेहरे पर अपराध बोध नहीं था।


सुबह छह बजे माँ ने द्वार खटखटाया।


"आराध्या बेटा, रेयांश... उठ गए क्या? नीचे सब इंतज़ार कर रहे हैं। आज बहू की पहली रसोई है।"


आराध्या घबरा गई। उसने कभी सोचा नहीं था कि जीवन में यह दिन इतनी जल्दी आएगा। वह तो अभी तक पुस्तकालय वाली आराध्या थी, जिसे केवल किताबों से प्रेम था। अब उसे एक पूरे परिवार के लिए खीर बनानी थी।


रेयांश ने धीरे से कहा, "तुम भयभीत मत हो। मैं नीचे हूँ।"


आराध्या तैयार हुई और नीचे आई। रसोई में सास ने पहले से ही चावल, दूध, चीनी, केसर सब निकाल कर रखा था। पूरे घर में उत्सव जैसा वातावरण था। चाची, बुआ सब आई थीं।


सास ने कहा, "बेटा, बस मीठी खीर बना दो। जैसी तुम्हारी माँ ने सिखाई हो।"


आराध्या ने कड़ाही चूल्हे पर रखी। दूध डाला। पर उसका ध्यान बार-बार बाहर बैठक में बैठे रेयांश की ओर जा रहा था। कल रात रेयांश ने कहा था - मेरे पास तुम्हें देने के लिए अधिक धन नहीं है। यह बात उसके मन में चुभ रही थी।


क्या सच में रेयांश के मन में अब भी यही भय है कि वह उसे सुख नहीं दे पाएगा?


तभी रसोई के द्वार पर रेयांश आया। हाथ में पानी का लोटा था। बहाने से आया था।


"माँ, पानी चाहिए था।"


सास बोली, "अरे बहू से माँग ले।"


रेयांश ने आराध्या की ओर देखा और धीरे से चीनी का डिब्बा उसकी ओर सरका दिया। आराध्या समझ गई। उसे चीनी मिल नहीं रही थी। दोनों की आँखें मिलीं और दोनों मुस्कुरा दिए।


खीर बनी। बहुत स्वादिष्ट बनी। सबने प्रशंसा की। पिताजी ने अपने हाथ से नेग दिया।


"बहू, तुमने घर को मीठा कर दिया।"


पर भोजन के बाद पिताजी ने रेयांश से वही प्रश्न फिर पूछा जो कल रात पूछा था।


"रेयांश, तो अब तुम भोपाल नहीं जाओगे ना? वहीं की नौकरी छोड़ दी तुमने?"


बैठक में सन्नाटा छा गया। आराध्या का हृदय तेजी से धड़कने लगा।


रेयांश ने शांत स्वर में कहा, "जी पिताजी, मैंने भोपाल की कंपनी छोड़ दी है। मैंने कांकेर के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक के पद के लिए आवेदन किया है। मेरी नियुक्ति पत्र अगले सप्ताह आ जाएगा। मैं अब यहीं रहूँगा। आप लोगों के साथ।"


पिताजी की आँखों में प्रसन्नता आ गई। "यह हुई ना बात। बड़ा बेटा घर में रहेगा तो घर का मान रहेगा। बाहर शहर में धन तो मिलता है, पर अपना गाँव तो अपना ही होता है।"


आराध्या वहीं खड़ी सब सुन रही थी। उसे अब समझ में आया कि रेयांश ने कितना बड़ा त्याग किया है। भोपाल में उसे पच्चीस हजार वेतन मिलता था। यहाँ उसे केवल बारह हजार मिलेगा। पर उसने एक बार भी इस बात की चर्चा आराध्या से नहीं की।


दोपहर हुई। घर के सब लोग अपने-अपने कमरे में विश्राम करने चले गए।


आराध्या अपने कमरे में आई। रेयांश खिड़की के पास खड़ा था। वही खिड़की जहाँ से कोमलदेव पुस्तकालय की सड़क दिखती थी।


आराध्या ने पीछे से कहा, "तुमने मुझे बताया क्यों नहीं कि तुमने भोपाल की नौकरी मेरे कारण छोड़ी?"


रेयांश पलटा, "तुम्हारे कारण नहीं, हमारे कारण छोड़ी।"


"दोनों में अंतर क्या है?"


"अंतर बहुत है आराध्या। तुम्हारे कारण छोड़ता तो वह बलिदान होता। हमारे कारण छोड़ी तो वह निर्णय है। बलिदान में बोझ होता है, निर्णय में प्रेम होता है।"


आराध्या की आँखें भर आईं। "पर तुम्हारा सपना? तुम लेखक बनना चाहते थे, शहर में बड़ी-बड़ी किताबें प्रकाशित करवाना चाहते थे।"


"मेरा सपना अभी भी वही है। लेखक बनने के लिए शहर जाना आवश्यक नहीं। प्रेमचंद ने तो गाँव में रह कर ही सबसे बड़ी कहानियाँ लिखीं। और मेरी सबसे बड़ी कहानी तो तुम हो। तुम मेरे पास हो तो मैं कहीं भी लिख लूँगा।"


इतना कह कर रेयांश ने अपनी पुरानी थैली से एक छोटी सी लोहे की चाबी निकाली।


"यह क्या है?" आराध्या ने पूछा।


"यह कोमलदेव पुस्तकालय की उस कोने वाली मेज के दराज की चाबी है। जिस मेज पर हम पहली बार मिले थे। जहाँ तुमने मुझे पहली बार देखा था। मैं कल सुबह पुस्तकालय अध्यक्ष के पास गया था। मैंने उनसे कहा - काका, वह मेज मुझे दे दीजिए। उन्होंने कहा - मेज तो सबकी है, पर दराज की चाबी केवल तुम्हें दूँगा। क्योंकि उस दराज में अब केवल तुम्हारी और आराध्या की कहानी रहेगी।"


आराध्या ने वह चाबी अपने हाथ में ली। वह छोटी सी चाबी थी, पर उसका मूल्य बहुत बड़ा था।


"तो अब इस चाबी का क्या करेंगे?"


"अब हर रविवार हम दोनों पुस्तकालय जाएँगे। उसी मेज पर बैठेंगे। दो कुल्हड़ चाय मँगवाएँगे। और एक नया पाठ लिखेंगे।"


"इस छठे पाठ का नाम क्या रखें?"


रेयांश ने आराध्या का हाथ पकड़ा और कहा, "इस छठे पाठ का नाम होगा - सज़ा के बाद की सुबह।"


"क्यों?"


"क्योंकि कल रात हमने सीखा कि प्रेम में सज़ा नहीं होती। अगर दूरी है तो वह भी प्रेम की परीक्षा है। और हर परीक्षा के बाद सुबह आती है। आज वह सुबह है। जहाँ न कोई भय है, न कोई अपराध बोध। केवल हम दोनों हैं।"


आराध्या ने अपना सिर रेयांश के कंधे पर रख दिया। बाहर धूप आँगन में फैल गई थी। कांकेर की वही धूप जो पुस्तकालय की खिड़की से आती थी। वही हवा जो किताबों के पन्ने हिलाती थी।


तभी नीचे से माँ की आवाज़ आई, "अरे, नई बहू कहाँ है? उसे मंदिर ले जाना है।"


आराध्या मुस्कुराई, "चलो, सुबह का पहला काम करते हैं।"


दोनों नीचे आए। सास ने आराध्या को मंदिर की टोकरी दी। रेयांश भी साथ चलने लगा।


रास्ते में वही चाय की दुकान पड़ी। वही वृद्ध व्यक्ति।


वृद्ध ने कहा, "अरे रेयांश बेटा, शादी मुबारक हो। और बहू, तुम भी।"


रेयांश ने कहा, "काका, दो कुल्हड़ चाय।"


वृद्ध हँसा, "अब तो दो से काम नहीं चलेगा, अब तो परिवार बढ़ गया है।"


आराध्या लजा गई।


चाय पीकर दोनों मंदिर गए। मंदिर में बहुत भीड़ नहीं थी। आराध्या ने प्रार्थना की - हे ईश्वर, चौथे पाठ पर जो प्रेम था, उसे पाँचवे पाठ तक बनाए रखना और अब छठे पाठ पर उसे और गहरा कर देना।


रेयांश ने भी वही प्रार्थना की, पर मन में।


लौटते समय आराध्या ने कहा, "रेयांश, एक बात पूछूँ?"


"हाँ पूछो।"


"अगर कल रात सज़ा की रात न होती, तो क्या आज की सुबह इतनी सुंदर लगती?"


रेयांश ने कहा, "नहीं लगती। अंधेरी रात के बाद ही सुबह का मूल्य पता चलता है।"




 आराध्या और रेयांश का अनजाना सा इश्क़, जो अब सबसे जाना पहचाना इश्क़ बन गया है।

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