Veydran - ek Ishq ek shrap in Hindi Horror Stories by Sandhu Sandhu books and stories PDF | वेद्रान - एक इश्क़, एक श्राप - 4

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वेद्रान - एक इश्क़, एक श्राप - 4

अध्याय 4

मीरा हल्का-सा मुस्कुराई। दिया चुप थी।

मीरा: जी, अंकल। जरूर। वैसे आप यहाँ पापा के पास आते-जाते रहिएगा। क्योंकि मैं कुछ दिनों के लिए चन्द्रगढ़ जा रही हूँ।

ये सुनते ही गीता काकी, जो सूप के बर्तन उठाकर जा रही थी, उसके कदम वहीं थम गए। और बर्तन फर्श पर गिर गए। सब चौंककर उसे देखने लगे।
काकी के हाथ काँप रहे थे।



दिया: काकी! क्या हुआ? आप ठीक हैं?
मीरा: आप बैठिए। यहाँ, लीजिए पानी पीजिए।

गीता को बैठाकर मीरा ने उसे पानी पिलाया। गीता की आँखें खौफ से भरी हुई थीं।

हरीश: गीता बहन! अब तुम्हारी उम्र हो चली है। अपनी सेहत पर ध्यान दो।

दिया: हाँ। अंकल ने ठीक कहा।

गीता काकी: मीरा बेटी! तुम चन्द्रगढ़ मत जाओ।

मीरा: काकी! वहाँ पापा की थोड़ी-सी जमीन है। मैं उस पर काम करूँगी। मेरा मतलब, मैंने बॉटनी और एग्रीकल्चर की पढ़ाई की है। मैं वहाँ गुलाब की खेती करूँगी। यही मेरा स्टार्टअप होगा।

हरीश: ये आसान नहीं होगा, बेटा! तुम अनुभवी नहीं हो। और फिर अकेले कैसे करोगी?

मीरा: अब अकेले ही कोशिश करनी होगी, अंकल! मैंने किसी से उम्मीद लगाना छोड़ दिया है।

हरीश उसका इशारा समझ रहा था, पर वह कुछ कह नहीं पाया।

दिया: मैं इसके साथ ही जा रही हूँ। आप चिंता मत कीजिए।

गीता काकी: आप दोनों समझती क्यों नहीं? वहाँ जाना ठीक नहीं है।

मीरा: क्यों? क्या वहाँ लोग नहीं रहते? बताइए।

गीता काकी: भाई साहब! आप ही रोकिए मीरा बेबी को।

विशम्बर: गीता बहन ठीक कह रही है। तू वहाँ जाने का ख्याल मन से निकाल दे।

मीरा: पापा! मैं ठान चुकी हूँ। मुझे खुद को साबित करना है। किसी को समझाना है कि मैं भी घाटे का सौदा नहीं करती। आप दोनों मुझे आशीर्वाद दीजिए। मैं कामयाब होकर लौटूँ।

गीता काकी: नहीं। वहाँ नहीं।

बात काटकर हरीश ने पूछा।

हरीश: तुम्हें क्या दिक्कत है, गीता बहन? तुम्हारा चेहरा डर से सफेद क्यों पड़ गया है? क्या कोई ऐसी बात है जो…?

विशम्बर! बात क्या है? तेरे चेहरे की भी हवाइयाँ उड़ी हुई हैं।

बिशम्बर ने आँखें झुका लीं। गीता भी सिर झुकाए बैठी थी। मीरा और दिया दोनों उलझन में थीं।

बिशम्बर: मेरे परदादा के भी शायद दादा रहे होंगे वो। उन्होंने बहुत बड़ी गलती कर दी थी। हरीश! ये कई दशकों पुरानी बात है। आज मेरे पूर्वजों की एक गलती के कारण हमें…

कहकर वह चुप हो गया।

गीता सिर झुकाए सुबक रही थी।

मीरा: पापा! क्या गलती की थी उन्होंने?

विशम्बर: उनका नाम महेश था। उस वक्त जवान थे। इंग्लैंड से पढ़ाई पूरी करके आए थे। हमारी पुश्तैनी जमीन पर अंग्रेजों जैसी खेती का कारोबार करना चाहते थे। उनके साथ उनके कुछ दोस्त भी थे।

वो चन्द्रगढ़ के मोरवन की झील पर रोज जाते थे। उनके दो दोस्त बहुत अच्छे तैराकी के खिलाड़ी थे।

एक दिन सब झील में तैरने का मज़ा ले रहे थे।

और तभी…

तभी उन्होंने फूलों से लदा हुआ एक अजीब-सा पेड़ देखा, जो झील में से ही निकल रहा था।

सबकी सिट्टी-पिट्टी गुल हो गई।

वो हैरानी से एक-दूसरे को देख रहे थे। कोई कुछ कहता या समझ पाता, इससे पहले ही उस पेड़ के नीचे सफेद फूलों की एक चादर बिछ गई।

और फिर अचानक……


उनकी नजर एक बेहद खूबसूरत इंसानी लड़की पर पड़ी, जो उन फूलों के बीच बैठी झील के पानी से खेल रही थी।