Veydran - ek Ishq ek shrap in Hindi Horror Stories by Sandhu Sandhu books and stories PDF | वेद्रान - एक इश्क़, एक श्राप - 9

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वेद्रान - एक इश्क़, एक श्राप - 9

अध्याय 9


मीरा और दिया सो गईं। अगली सुबह दोनों तैयार थीं। दिया ने ब्लैक जींस और पिंक टॉप पहना था। मीरा ने ब्लू जींस के साथ व्हाइट टॉप पहना था। दोनों बिल्कुल सिंपल थीं, पर बहुत प्यारी लग रही थीं।


दरवाज़े पर दस्तक हुई। दिया ने दरवाज़ा खोला, तो सामने सादे-से कपड़े पहने राजू खड़ा था।


दिया को देखते ही उसका चेहरा खिल गया, पर दिया ने उस पर ध्यान न देकर कहा।


दिया: मीरा! चल। ताँगा आ गया है।


मीरा आ गई। दोनों राजू के साथ ताँगे के पास आ गईं।


राजू: बैठिए, मैडम! और बताइए, कहाँ चलना है?


मीरा: चंद्रगढ़ ले चलो।


कहते हुए वह बैठने लगी, तो राजू ने उसे रोक लिया।


राजू: क्या कहा आपने? चंद्रगढ़? आपको वहाँ क्या काम है?


दिया: हमें वहाँ काम है। तभी तो जा रहे हैं। तुम चलोगे? बताओ। रास्ता पता नहीं है क्या?


राजू: रास्ता अच्छे से पता है मुझे। पर वहाँ कोई नहीं जाता। वहाँ पर सिवाय भयानक, डरावने जंगल के कुछ नहीं है। झील के पास ही एक पुरानी हवेली है। बस! वो भी वीरान और खंडहर है।


मीरा: राजू भैया! हमें वहाँ पर अपनी पुश्तैनी ज़मीन देखने जाना है। ये ज़रूरी है।


राजू: मैडम! आप समझने की कोशिश कीजिए। वहाँ कोई गाँव वाला नहीं जाता। आप अकेले वहाँ पर... नहीं! बिल्कुल नहीं।


मीरा: हम अपना ख्याल रख सकते हैं। हमने अफ़वाहें सुनी हैं, पर हम नहीं मानते।


दिया: तुम बताओ। चलोगे या नहीं?


राजू दोनों को घूर रहा था। 


कुछ पलों बाद


राजू: ठीक है, मैडम! मैं ले चलूँगा, पर सरहद तक। उससे आगे मेरा ताँगा एक कदम भी नहीं जाएगा।


मीरा: मंज़ूर है। चलो।


दोनों बैठ गईं। राजू ने ताँगा चला दिया।

पूरे रास्ते किसी ने कुछ नहीं कहा। ख़ामोशी के करीब पैंतालीस मिनट बाद ताँगा रुक गया।


राजू: लीजिए, हम पहुँच गए।


मीरा और दिया चुपचाप नीचे उतरीं। दोनों घने जंगल की सरहद पर थीं। कच्ची सड़क वहीं खत्म होती थी।


मीरा: राजू भैया! ये जगह हमारी धरती पर ही है या आप हमें किसी दूसरे प्लैनेट पर ले आए हो?


राजू मुस्कुराया, पर चुप रहा। वह हाथ बाँधे खड़ा था।


दिया अपने फोन से आसपास के नज़ारों की वीडियो बना रही थी।


वो जगह थी ही इतनी सुंदर कि दोनों खो-सी गईं। चारों तरफ हरियाली थी, पंछियों की तरह-तरह की आवाज़ें थीं और कुदरती खुशबू हवा में हर तरफ फैली हुई थी।


मीरा: (एकाएक) लो, भैया! मैं तो फिर भूल ही जाती। ये पैसे पकड़ो। आप हमें यहाँ तक लाए। हमारी बहुत मदद की है।


राजू ने पैसे ले लिए और हैरानी से पूछा।


राजू: वापस कब चलना है?


दोनों ने चौंककर उसे देखा।


दिया: हम वापस क्यों जाने लगे? हम उस हवेली में जाकर सब देखेंगे।


राजू के होश उड़ गए।


राजू: आप उस शापित हवेली में जाएँगी? हो क्या गया है शहर वालों को? कोई बात समझते ही नहीं!


दिया: तुम गाँव वाले अनपढ़ होते हो। साइंस किस चिड़िया का नाम है, तुम्हें पता नहीं। जो चीज़ मुश्किल लगे, समझ न आए, उसे शापित मान लेते हो या अफ़वाहें उड़ाते रहते हो।


राजू: Mind your language, madam!


हम पढ़े-लिखे भी हैं और साइंस भी समझते हैं। And by the way, साइंस किसी चिड़िया का नाम नहीं है।


दिया की आँखें हैरानी से फैल गईं। मीरा भी चौंक गई थी।


राजू: मैं ग्रेजुएट हूँ और पहलवानी में नेशनल लेवल चैंपियन भी रह चुका हूँ। इंटरनेशनल लेवल तक कॉम्पिट करने के लिए लाखों रुपये की रिश्वत माँगी गई। मैं दे नहीं पाया, तो ताँगा थाम लिया।


मीरा: हमें अफ़सोस है, भैया!


राजू: कोई बात नहीं। अब तो आदत हो गई है। अब चलिए, वापस चलें।


मीरा: हम वापस नहीं जा सकते। ये ज़मीन, ये प्रोजेक्ट मेरी आखिरी उम्मीद है। मैं इसे छोड़ नहीं सकती।


राजू: ये शापित जगह है। यहाँ सदियों से वेद्रान नाम का एक डेविल रह रहा है। मुझे तो कंपकंपी-सी हो रही है।


मीरा: हरगिज़ नहीं! मैं नहीं जाने वाली। चल, दिया!


राजू: (गुस्से से) ठीक है, जाइए मौत के मुँह में! कोई बचाने नहीं आएगा। मैं अपनी जान क्यों गँवाऊँ भला? मैं अपनी माँ-बाप का इकलौता बेटा हूँ। चल, राजू! निकल ले!


कहकर वह ताँगे पर सवार हुआ और वहाँ से चला गया।


मीरा और दिया सरहद के भीतर दाखिल हुईं।


जैसे ही उन्होंने वहाँ कदम रखा, मौसम बदल

गया।


अचानक हवा तेज़ हो गई। चारों तरफ ठंडक-सी फैल गई।


दोनों हैरानी से एक-दूसरे को देखने लगीं।