Ankaha sach ( Part - 14) in Hindi Fiction Stories by Vishakha Pareek books and stories PDF | अनकहा सच ( भाग - 14)

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अनकहा सच ( भाग - 14)

अनकहा सच_


हितेश के पापा के अचानक बोलते-बोलते चुप हो जाने से राजू की घबराहट और ज्यादा बढ़ने लगती है। वह बिल्कुल चुप हो जाता है। हितेश और उसकी माँ दोनों मिलकर उन्हें संभालते हैं। राजू को भी हितेश संभालता है और अपने पापा से आगे बोलने के लिए कहता है।

थोड़ा माहौल सामान्य होने और राजू को संभालने के बाद, हितेश के पापा आगे बताना शुरू करते हैं।

वे कहते हैं, "फिर उस रात हम सब बहुत डर गए थे। हमें समझ नहीं आ रहा था कि हम क्या करें। फिर हमारे साथ खडे एक शख़्स ने हमसे कहा कि हम यह सब पुलिस को नहीं बता सकते, क्योंकि अगर हम पुलिस को बताएंगे तो हम सब फँस जाएंगे। हमें उस बच्चे की चिंता हुई क्योंकि उसमें थोड़ी साँसें बाकी थीं। हमने उसे अस्पताल ले जाने का सोचा..."

तभी हितेश बीच में ही बोल पड़ता है, "फिर... फिर पापा, कहाँ गया वो? क्या हुआ उसका?"

हितेश के पापा एक गहरी सांस लेते हैं और कहते हैं, "उसने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। उसके शरीर में जो थोड़ी बहुत साँसें बची थीं, उसने वो भी तोड़ दीं। उसे बहुत बेरहमी से कुचला गया था, इसलिए उसका बचना बहुत मुश्किल था।"

पापा आगे बताते हैं, "अब हमें समझ नहीं आ रहा था कि हम क्या करें और क्या ना करें। सुबह होने में ज्यादा देर नहीं बची थी और हम सब अच्छे से जानते थे कि अगर यह मामला पुलिस के हाथों में गया, तो बात बहुत दूर तक जाएगी। हमारे पास न तो इतनी शक्ति थी और न ही इतना हौसला कि हम इस सब से लड़ सकें। हम सब बहुत डर गए थे।"

हितेश फिर से बेचैन होकर पूछता है, "फिर... फिर क्या हुआ पापा?"

राजू बस खामोश बैठा सब सुन रहा होता है। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा होता है, वह बस उनकी एक-एक बात को पत्थर की मूर्ति की तरह सुन रहा होता है।

हितेश के पापा कहते हैं, "फिर हम सब ने मिलकर एक फैसला किया कि उन्हें वहीं गाँव की कच्ची ज़मीन के नीचे दफना देंगे... और उसी रात हम सब ने उस औरत और उस बच्चे को वहीं ज़मीन के नीचे दफना दिया। और ऐसा बर्ताव किया जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं, जैसे उस रात कुछ हुआ ही नहीं और हमें कुछ नहीं पता।"

हितेश फिर बोल पड़ता है, "फिर... फिर क्या हुआ?"

हितेश के मम्मी-पापा एक गहरी सांस लेते हैं और राजू को संभालने की कोशिश करते हुए कहते हैं, "राजू बेटा..."

राजू झटके से बोलता है, "आपने उन्हें दफना दिया?! फिर आगे क्या? आपको कैसे पता कि वो मेरी माँ और भाई ही थे? जरूरी थोड़ी है कि वो लोग वही हों! हो सकता है ना कि वो कोई और हो... लोग तो कहते हैं कि वो मुझे छोड़कर चली गई, वो ज़िंदा है! उन्होंने हमें देखा नहीं, हालांकि हमारे लिए वो आज भी ऐसा ही है जैसे... लेकिन जरूरी थोड़ी है कि वो मेरी माँ और भाई ही हों? आप कैसे कह सकते हैं कि वो लोग वही थे? आप लोगों ने उन्हें दफना दिया, फिर आगे क्या? आप लोगों ने ज़रा भी नहीं सोचा कि इनके आगे-पीछे कोई हो सकता है? आप लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं?!"

राजू का सिर घूमने लगता है और वह एकटक नजरें घुमाने लगता है। तभी हितेश की मम्मी-पापा उसे संभालने की कोशिश करते हैं, उसे पानी देते हैं और पानी पिलाते हैं।

थोड़ी देर बाद जब राजू थोड़ा संभलता है, तो हितेश पूछता है, "पापा, आप कैसे कह सकते हैं कि वो माँ और भाई ही थे?"

हितेश के पापा आगे बताते हैं, "फिर अगले दिन...हम सब सामान्य दिखने की कोशिश कर रहे थे। हम सब बहुत घबराए हुए थे, लेकिन हम ऐसा दिखा रहे थे कि जैसे कुछ नहीं हुआ है। इस बात की भनक सिर्फ हम चार-पाँच लोगों को ही थी। लेकिन उसके पाँच दिनों के बाद पड़ोस के गाँव से यह चर्चा घर-घर होने लगी कि एक औरत और उसका बच्चा गायब हैं... और जब हमने उस औरत और उस बच्चे के बारे में सुना, तो हम इतने घबरा चुके थे कि हमारे अंदर किसी को भी यह सब बताने की हिम्मत तक नहीं हुई। हमें लगता था कि पुलिस हमें पकड़कर ले जाएगी, सारे सवाल हम पर उठेंगे... और बस, हम खामोश हो गए। हम कुछ नहीं कर सके..."

इतना कहते-कहते हितेश के पापा फूट-फूटकर रोने लगते हैं। वे राजू के सामने हाथ जोड़कर कहते हैं, "हमें माफ कर दो बेटा, हमें माफ कर दो! हमें नहीं पता था कि वो कौन था, किसने ये सब किया... बस हम कायर बन चुके थे। हमारी गलती थी कि हमने किसी को नहीं बताया... हमें माफ कर दो बेटा, हमें माफ कर दो!"

हितेश के पापा राजू के आगे रोते हुए बार-बार माफी मांगने लगते हैं। हितेश की आँखों से भी बेतहाशा आँसू निकल आते हैं।

इधर राजू बिल्कुल सुन्न पड़ा रहता है। वह बस खामोश नज़रों से उन्हें देखता रहता है। हितेश उन तीनों को भी संभालने की कोशिश करता है और खुद को भी सँभालने की जद्दोजहद कर रहा होता है!