dhadkne dil ki in Hindi Love Stories by Shravan Gore books and stories PDF | धड़कने दिल की - 7

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धड़कने दिल की - 7

'धांय!'
गोली की गूंज वेयरहाउस की हर लोहे की चादर से टकराकर एक भयानक सन्नाटे में बदल गई। बारूद की तीखी, कड़वी गंध हवा में फैल गई।
सिया का शरीर धक्के के कारण गीली कंक्रीट की जमीन पर जा गिरा था। उसका सिर एक खाली लोहे के ड्रम से टकराया, जिससे कुछ पलों के लिए उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। लेकिन जैसे ही उसने नजरें ऊपर उठाईं, उसके हलक से एक ऐसी दिल दहला देने वाली चीख निकली जिसने पुलिस के लाउडस्पीकरों के शोर को भी दबा दिया।
"आदित्य!"
आदित्य वहीं खड़ा था। उसकी आंखें चौड़ी थीं, पुतलियां जैसे किसी शून्य में ठहर गई थीं। उसके कंधे और सीने के बीच, जैतून रंग के उस खादी के कुर्ते पर एक गहरा, गाढ़ा लाल धब्बा तेजी से फैलने लगा। खून की गर्म धारा कपड़े को चीरती हुई बाहर निकली और कंक्रीट पर टपकने लगी—टप... टप... टप।
आदित्य के होंठ कुछ बुदबुदाने के लिए हिले, लेकिन आवाज के बजाय मुंह से खून की एक पतली लकीर बह निकली। उसके पैर कांपे, घुटने मुड़े और वह भारी पेड़ की तरह सीधे जमीन पर आ गिरा।
"फायर! कोई हिलेगा नहीं!" पुलिस कमिश्नर की दहाड़ गूंजी।
कमांडो की एक टुकड़ी ने पलक झपकते ही कबीर पर धावा बोल दिया। कबीर भागने के लिए मुड़ा, लेकिन एक पुलिस अफसर की भारी बूट की लात सीधे उसकी पीठ पर पड़ी। कबीर मुंह के बल कीचड़ में गिरा और दो कमांडो ने उसकी दोनों बाहें मरोड़कर हथकड़ियां कस दीं। धनराज महाजन ने हाथ ऊपर उठा लिए थे, उसका घमंड मिट्टी में मिल चुका था।
लेकिन प्रोफेसर वी. के. जोशी... आदित्य के चाचा।
उस बूढ़े के चेहरे पर कोई पछतावा नहीं था। जब पुलिस की टीम आगे बढ़ रही थी, चाचाजी ने धीरे से अपने हाथ में पकड़े उस लकड़ी के बक्से को अपनी बग़ल में और कस लिया। उनकी नजरें जमीन पर गिरते हुए आदित्य पर टिकी थीं। उनके चेहरे पर ममता का एक कतरा भी नहीं था, बल्कि उनकी आंखों में एक खूंखार चमक थी।
"सब खत्म हो गया, जोशी! हथियार फेंक दो!" एसीपी कदम ने अपनी सर्विस पिस्टल तानते हुए चेतावनी दी।
लेकिन ठीक उसी सेकंड, वेयरहाउस की जर्जर छत से लटकता एक भारी लोहे का गर्डर चरमराया। शायद गोली के झटके या पुरानी जंग की वजह से, वह गर्डर ठीक पुलिस और चाचाजी के बीच आ गिरा। धूल और धुएं का एक विशाल गुबार उठा। जब तक पुलिस ने रास्ता साफ किया, प्रोफेसर जोशी वेयरहाउस के पिछले गुप्त निकास से क्रीक के दलदली पानी की तरफ गायब हो चुके थे।
सिया को दुनिया में क्या हो रहा है, इसका कोई होश नहीं था।
वह घिसटती हुई, घुटनों के बल चलती हुई आदित्य के पास पहुंची। उसने अपने दोनों हाथों से आदित्य के बहते हुए जख्म को दबाने की कोशिश की, लेकिन खून उसकी उंगलियों के बीच से फव्वारे की तरह रिस रहा था।
"आदित्य... प्लीज आंखें खोलो! तुम्हें कुछ नहीं हो सकता!" सिया पागलों की तरह चीख रही थी। उसकी आंखों से बहते आंसुओं ने आदित्य के चेहरे पर जमी धूल को धो दिया था। "तुमने ऐसा क्यों किया? मेरी जान बचाने के लिए खुद को क्यों मिटा दिया?"
आदित्य ने बहुत मुश्किल से अपनी भारी पलकें उठाईं। उसकी भूरी आंखें, जो हमेशा शांत रहती थीं, अब धुंधला रही थीं। उसने कांपते हुए हाथ को ऊपर उठाया और सिया के गाल पर फेरा। उसकी लहूलुहान उंगलियों ने सिया के आंसुओं को छुआ।
"सिया..." आदित्य की आवाज इतनी धीमी थी कि हवा का झोंका भी उसे उड़ा ले जाए। "वो... वो डायरी... सिर्फ एक हिस्सा थी..."
"कुछ मत बोलो, आदित्य! एम्बुलेंस आ रही है, प्लीज हिम्मत मत हारो!" सिया ने अपनी कुर्ती का पल्लू फाड़कर उसके घाव पर बांधने की कोशिश की।
आदित्य ने अपनी बची-खुची ताकत समेटी। उसने सिया का हाथ कसकर अपनी जैकेट की उस अंदरूनी जेब की तरफ खींचा, जहां उसका कैमरा ट्रांसमीटर बंधा था।
"चाचाजी... वो सिर्फ फाइलों के लिए नहीं आए थे..." आदित्य ने खून थूकते हुए फुसफुसाया। "उस लकड़ी के बक्से में... तुम्हारे पापा के अस्पताल के लाइफ सपोर्ट का... मेन मास्टर रिमोट है... वो तुम्हारे पापा को... आज रात जिंदा नहीं छोड़ेंगे..."
यह कहते ही आदित्य का सिर एक तरफ लुढ़क गया। उसकी उंगलियां सिया के हाथ से छूटकर बेजान होकर जमीन पर गिर पड़ीं। उसकी आंखें आधी खुली रह गईं।
"आदित्य! नहीं! आदित्य!!"
सिया की चीख माहिम क्रीक के सन्नाटे में दूर तक गूंज गई।
तभी पैरामेडिक्स की टीम स्ट्रेचर लेकर अंदर दौड़ी। आदित्य को तुरंत स्ट्रेचर पर डाला गया। ऑक्सीजन मास्क उसके चेहरे पर लगाया गया।
"पल्स बहुत गिर रही है! बीपी ट्रेस नहीं हो रहा! तुरंत लीलावती शिफ्ट करो!" डॉक्टर ने चिल्लाकर कहा।
सायरन की गूंजती आवाज के साथ एम्बुलेंस रात के अंधेरे को चीरती हुई अस्पताल की तरफ भागी। सिया एम्बुलेंस के अंदर आदित्य का ठंडा पड़ता हाथ पकड़े बैठी थी। मॉनिटर पर चलती ईसीजी की लाइनें तेजी से सपाट होने की कगार पर थीं—'बीप... बीप... बीप...' हर बीप के साथ सिया की रूह कांप रही थी।
अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड का दरवाजा झटके से खुला।
डॉक्टरों की एक बड़ी टीम आदित्य को लेकर सीधे ऑपरेशन थिएटर की ओर दौड़ी।
"गंभीर स्थिति है, गोली दिल से महज दो सेंटीमीटर की दूरी पर अटकी है। इंटरनल ब्लीडिंग बहुत ज्यादा है," सर्जन ने नर्सों को निर्देश देते हुए कहा।
ओटी का लाल बल्ब जल उठा। दरवाजा सिया के मुंह पर बंद हो गया।
सिया वहीं ठंडी संगमरमर की दीवार के सहारे फर्श पर बैठ गई। उसके कपड़े, उसके हाथ, उसका चेहरा—सब कुछ आदित्य के खून से रंगा हुआ था। कॉलेज का वो लड़का, जो कल सुबह तक उसके लिए एक अजनबी था, जिसने सिर्फ एक बार कट्टे पर उससे आंखें मिलाई थीं... आज वो उसके लिए जिंदगी और मौत की दहलीज पर खड़ा था।
तभी अस्पताल के गलियारे में भारी कदमों की आवाज आई।
एसीपी कदम तेजी से सिया की तरफ आए। उनके हाथ में एक प्लास्टिक की सीलबंद थैली थी, जिसमें आदित्य का वह विंटेज कैमरा रखा था।
"मिस कुलकर्णी," एसीपी कदम ने गंभीर स्वर में कहा। "आदित्य ने जो ट्रांसमीटर अपने कैमरे में लगाया था, उसने पूरा काम कर दिया है। धनराज महाजन और कबीर के खिलाफ मर्डर, भ्रष्टाचार और आतंकी साजिश के पुख्ता सबूत हमारे पास आ चुके हैं। वेयरहाउस नंबर १२ के बेसमेंट से वो सारी मूल फाइलें बरामद कर ली गई हैं जो आपके पिता ने छिपाई थीं। आपके पिता अब कानून की नजर में पूरी तरह बेकसूर साबित हो चुके हैं।"
यह सुनकर किसी भी बेटी की आंखों में खुशी के आंसू आ जाते, लेकिन सिया के चेहरे पर खौफ का एक नया तूफान उमड़ पड़ा।
"एसीपी साहब!" सिया ने झटके से उठकर कदम का हाथ पकड़ लिया। उसकी आवाज कांप रही थी। "आप नहीं जानते! खेल खत्म नहीं हुआ है! प्रोफेसर जोशी फरार हैं... और आदित्य ने बेहोश होने से ठीक पहले मुझे बताया कि जोशी के पास कोई लकड़ी का बक्सा है। उस बक्से में मेरे पापा के लाइफ सपोर्ट का रिमोट कंट्रोल है!"
एसीपी कदम की आंखें चौंककर बड़ी हो गईं। "क्या?! लेकिन अस्पताल का आईसीयू तो पूरी तरह सिक्योर है—"
"नहीं!" सिया ने बीच में ही बात काटी। "पापा इसी अस्पताल के चौथे माले पर हैं! आईसीयू रूम नंबर ४०२! प्रोफेसर जोशी कॉलेज के डीन होने के साथ-साथ इस अस्पताल के ट्रस्टी बोर्ड के वाइस प्रेसिडेंट भी हैं! उनके पास हर कमरे का एक्सेस कोड है!"
उसी पल, पूरे अस्पताल की बत्तियां एक साथ बुझ गईं।
'क्लिक... भनन्न!'
अस्पताल का मुख्य जनरेटर चालू होने में जो दस सेकंड का वक्त लगा, उस दस सेकंड के घुप अंधेरे में अस्पताल के चौथे माले पर एक साया चुपचाप सीढ़ियों से ऊपर चढ़ा।
चौथी मंजिल—न्यूरो-आईसीयू।
वार्ड के बाहर तैनात दो पुलिस कॉन्स्टेबल फर्श पर बेसुध पड़े थे। उनके मुंह से झाग निकल रहा था, जैसे किसी ने पीछे से क्लोरोफॉर्म का भारी कपड़ा उनके मुंह पर दबा दिया हो।
आईसीयू का दरवाजा खुला।
अंदर की नीली, ठंडी रोशनी में सिर्फ मॉनिटर्स की 'बीप-बीप' की आवाज गूंज रही थी। बेड पर सिया के पिता, मिस्टर कुलकर्णी, बेजान पड़े थे। उनके मुंह पर वेंटिलेटर की नली लगी थी और छाती बहुत धीमी रफ्तार से ऊपर-नीचे हो रही थी।
बेड के सिरहाने एक साया आकर रुका।
सफेद कड़क कुर्ता, जिस पर माहिम के कीचड़ के छींटे लगे थे। चेहरे पर वही सोने का चश्मा। प्रोफेसर वी. के. जोशी।
चाचाजी ने अपनी बग़ल से वह पुराना लकड़ी का बक्सा निकाला। बक्सा खोला। अंदर कोई बम नहीं था। अंदर एक डिजिटल जैमर और अस्पताल के मेनफ्रेम से जुड़ा एक हैकिंग डिवाइस था।
"तुमने बहुत कोशिश की कुलकर्णी," चाचाजी की आवाज उस सन्नाटे में किसी जहरीले सांप की फुसफुसाहट जैसी लगी। "तुमने सोचा तुम्हारी वो डायरी और तुम्हारा वो नक्शा मुझे बर्बाद कर देगा? धनराज भले ही जेल चला जाए, कबीर भले ही सड़ जाए... लेकिन वी. के. जोशी कभी हार नहीं मानता। अगर मैं डूबूंगा, तो तुम्हें अपने साथ कब्र में ले जाऊंगा।"
चाचाजी ने अपनी उंगली उस लाल बटन पर रखी, जो वेंटिलेटर की मुख्य बिजली सप्लाई को एक सेकंड में शॉर्ट सर्किट कर सकता था।
"और तुम्हारे उस नए रक्षक... मेरे प्यारे भतीजे आदित्य का क्या हुआ? वो तो नीचे ओटी में अपने आखिरी सांसें गिन रहा है। आज की रात कुलकर्णी और जोशी दोनों के चिराग बुझ जाएंगे।"
चाचाजी का अंगूठा उस लाल बटन को दबाने ही वाला था कि—
"रुक जाओ, प्रोफेसर!"
दरवाजे पर सिया खड़ी थी।
उसकी सांसें फूल रही थीं। उसके हाथ में कोई बंदूक या लाठी नहीं थी। उसके हाथ में वही भूरे रंग की पुरानी लेदर डायरी थी।
चाचाजी धीरे से मुड़े। उनके चेहरे पर एक घिनौनी, बेरहम मुस्कान उभरी।
"अरे... छोटी कुलकर्णी। तुम यहां आ गईं? बड़ी अच्छी बात है। अपने बाप को अपनी आंखों के सामने मरते हुए देखना ज्यादा दर्दनाक होगा।"
"अगर तुमने वो बटन दबाया, जोशी," सिया की आवाज में अब कोई डर नहीं था। उसकी आवाज में एक ऐसी सर्द, जानलेवा स्थिरता थी जिसने चाचाजी को एक पल के लिए चौंका दिया। "तो तुम कभी उस स्विस बैंक के खाते का पासवर्ड नहीं जान पाओगे, जिसमें धनराज महाजन ने तुम्हारे हिस्से के ढाई सौ करोड़ रुपये ट्रांसफर किए हैं।"
चाचाजी की उंगली लाल बटन पर ही जम गई। उनकी आंखों में लालच और संदेह की एक बिजली सी कौंधी।
"क्या बकवास कर रही हो तुम?"
"यह बकवास नहीं है," सिया ने डायरी को हवा में लहराया। "पापा सिर्फ इस पुल के घोटाले की जांच नहीं कर रहे थे। उन्होंने तुम्हारे उस बेनामी विदेशी खाते की पूरी ट्रेल निकाल ली थी। धनराज ने तुम्हें धोखा दिया था, जोशी! उस खाते का एक्सेस सिर्फ एक डिजिटल 'हार्डवेयर की' से हो सकता है। और वो की... इस डायरी के अंदर छिपी है।"
चाचाजी की सांसें तेज हो गईं। ढाई सौ करोड़! यही वो रकम थी जिसके लिए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी, अपने उसूल और अपने परिवार को दांव पर लगा दिया था।
"डायरी इधर फेंक!" चाचाजी ने गुर्राते हुए कहा।
"पहले वो रिमोट नीचे रखो," सिया ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए कहा।
चाचाजी ने कुछ सेकंड तक सिया के चेहरे को घूरा। लालच ने उनके दिमाग के हर तर्क को कुंद कर दिया था। उन्होंने धीरे से उस लकड़ी के बक्से को साइड टेबल पर रख दिया।
"अब डायरी दे," चाचाजी ने हाथ फैलाया।
सिया धीरे-धीरे आगे बढ़ी। वह चाचाजी से महज दो फीट की दूरी पर थी। उसने डायरी आगे बढ़ाई। जैसे ही चाचाजी ने डायरी पर अपनी उंगलियां जमाईं, सिया ने अपनी दूसरी हथेली खोली।
उसकी हथेली में कोई डिजिटल की नहीं थी।
उसकी हथेली में अस्पताल के इमरजेंसी ट्रे से उठाया गया एक बड़ा, नुकीला सर्जिकल ब्लेड (स्कैल्पल) था!
सिया ने बिना एक पल गंवाए, अपनी पूरी ताकत से वह स्कैल्पल चाचाजी के उस हाथ में घोंप दिया जिससे वो रिमोट उठाने वाले थे।
"आह्ह्ह!" चाचाजी के मुंह से दर्द की एक भयानक चीख निकली। उनका हाथ खून से लथपथ हो गया और वो लड़खड़ाकर पीछे गिरे।
उसी सेकंड, आईसीयू का दरवाजा लात मारकर खोला गया। एसीपी कदम और पुलिस कमांडोज अंदर दाखिल हुए।
"हैंड्स अप, प्रोफेसर!"
चाचाजी जमीन पर गिर पड़े थे। उनका हाथ लहूलुहान था। पुलिस ने उन्हें दबोच लिया और हथकड़ियां उनकी कलाइयों में ठोक दीं।
"तुम... तुमने मुझे धोखा दिया!" चाचाजी फर्श पर तड़पते हुए चिल्लाए। "कोई स्विस बैंक नहीं है!"
सिया ने नफरत से उस बूढ़े दरिंदे की तरफ देखा। "तुमने सही कहा था जोशी... आदित्य को तुमने फोटोग्राफी सिखाई थी, लेकिन सच के लिए लड़ना उसे उसके जमीर ने सिखाया था। और उसी आदित्य ने मुझे सिखाया कि तुम जैसे भेड़ियों का शिकार कैसे किया जाता है।"
चाचाजी को पुलिस घसीटते हुए बाहर ले गई। उनका घमंड, उनका रसूख और उनका नाम हमेशा के लिए खाक में मिल चुका था।
सिया अपने पिता के बेड के पास घुटनों के बल बैठ गई। उसने अपने पिता के ठंडे हाथ को चूमा। मॉनिटर पर उनके दिल की धड़कनें स्थिर चल रही थीं। वो सुरक्षित थे।
तभी पीछे से किसी नर्स की घबराई हुई आवाज गलियारे में गूंजी।
"डॉक्टर! ओटी टू में पेशेंट आदित्य जोशी का कार्डियक अरेस्ट हो गया है! डिफाइब्रिलेटर लाओ, जल्दी!"
सिया के पैरों तले से जमीन फिर से खिसक गई। वह अपने पिता का हाथ छोड़कर पागलों की तरह सीढ़ियों से नीचे ओटी की तरफ भागी।
ओटी के बाहर की लाल बत्ती अब पागलों की तरह टिमटिमा रही थी। अंदर से डॉक्टरों की चीखें साफ सुनाई दे रही थीं—
*"चार्ज टू २००! क्लियर!"*
*'धप!'*
*"नो रिस्पॉन्स! चार्ज टू ३००! क्लियर!"*
*'धप!'*
सिया ने ओटी के कांच की छोटी सी खिड़की पर अपने दोनों हाथ रख दिए। अंदर आदित्य का शरीर झटके से ऊपर उठता और फिर बेजान होकर टेबल पर गिर जाता। मॉनिटर पर एक लंबी, सपाट, जानलेवा सीटी बज रही थी—
'पीप-पीप-पीप-पीप-पीप...'
"नहीं आदित्य... प्लीज नहीं!" सिया कांच पर अपना माथा पटकते हुए रो पड़ी। उसके आंसू कांच को धुंधला कर रहे थे। "तुमने मुझसे कहा था ना कि अगली बार रास्ते के बीच में खड़े होकर पोज मत ढूंढना... देखो, मैं रास्ते में खड़ी हूं। तुम्हें वापस आना होगा... तुम्हें उस कॉलेज के कट्टे पर वापस आना होगा!"
अंदर डॉक्टर ने अपनी मशीन नीचे रख दी। सर्जन ने अपना सिर झुका लिया। नर्स ने घड़ी की तरफ देखा, मानो मौत का वक्त दर्ज करने वाली हो।
लेकिन तभी—
उस सपाट हो चुकी हरी रेखा पर अचानक एक बहुत बारीक, नन्हीं सी हलचल हुई।
'बीप।'
सब रुक गए। डॉक्टरों ने चौंककर मॉनिटर को देखा।
'बीप... बीप... बीप...'
दिल की धड़कन वापस लौट आई थी। बहुत धीमी, बहुत नाजुक, लेकिन जिंदा!
सर्जन ने राहत की एक गहरी सांस ली। "द बुलेट इज आउट। ही इज फाइटिंग बैक। इट्स अ मिरेकल!"
कांच के उस पार खड़ी सिया फर्श पर बैठ गई। उसने अपने चेहरे को अपने खून से सने हाथों में छुपा लिया। लेकिन इस बार उसकी आंखों से जो आंसू बह रहे थे, वो खौफ के नहीं थे। वो उस मोहब्बत के थे, जिसने मौत को भी एक कदम पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था।
**तीन महीने बाद...**
दिसंबर की सुनहरी, हल्की ठंडी सुबह। मुंबई का सेंट जेवियर्स कॉलेज हमेशा की तरह गुलजार था।
अखबारों के मुख्य पन्नों पर तीन महीने तक छपी वो सनसनीखेज खबरें अब पुरानी हो चुकी थीं— *'पुल हादसे का सच उजागर, डीन जोशी और बिल्डर महाजन को उम्रकैद, चीफ ऑडिटर कुलकर्णी पूरी तरह स्वस्थ होकर पद पर लौटे।'*
कॉलेज का वही विशाल बरगद का पेड़। वही मशहूर 'कॉलेज का कट्टा'।
कट्टे के पत्थर पर आदित्य बैठा था। उसके बदन पर वही सादा खादी का कुर्ता था, लेकिन उसकी चाल में अब भी हल्की सी लंगड़ाहट बाकी थी। सीने के घाव का निशान अब भी कभी-कभी दर्द करता था, लेकिन उसके चेहरे पर वही पुरानी, गहरी और शांत मुस्कान थी। उसके हाथ में वही पुराना विंटेज कैमरा था।
वह लेंस को घुमा रहा था। धूप की एक सुनहरी किरण वटवृक्ष के पत्तों से छनकर नीचे आ रही थी।
तभी—
पीछे से किसी के दबे पांव चलने की आहट आई। कोई बहुत आहिस्ता से उसके पीछे आकर खड़ा हो गया। हवा में चमेली के इत्र की वही जानी-पहचानी, मीठी खुशबू घुल गई।
आदित्य ने बिना पीछे मुड़े मुस्कुराते हुए कहा, "अगर इस बार धक्का देने का इरादा है, तो बता दूं... इस बार कैमरा गिरा तो भरपाई तुम्हारी पूरी जिंदगी देकर भी नहीं होगी।"
पीछे से एक खिलखिलाती हुई, सुरीली हंसी गूंज उठी।
सिया उसके बगल में आकर बैठ गई। उसके कानों में वही चांदी के छोटे झुमके हल्के-हल्के बज रहे थे। उसकी आंखों में अब कोई खौफ नहीं था, कोई आंसू नहीं थे; वहां सिर्फ एक बेइंतहा, गहरा प्यार था जो लफ्जों का मोहताज नहीं था।
सिया ने अपनी बैग से वही भूरे रंग की लेदर डायरी निकाली।
उस डायरी का वो नन्हा पीतल का ताला अब हमेशा के लिए खुल चुका था। सिया ने डायरी आदित्य की गोदी में रख दी।
"अब इसका ताला बंद करने की जरूरत नहीं है," सिया ने आदित्य की आंखों में सीधे देखते हुए बहुत नर्मी से कहा। "क्योंकि इसमें जो सबसे बड़ा राज था... वो अब तुम्हारा हो चुका है।"
आदित्य ने डायरी का पहला पन्ना पलटा।
उस पन्ने पर अब सिर्फ सिया का नाम नहीं था। उस पर विंटेज कैमरे से खींची गई एक ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर चिपकी थी—कॉलेज के पहले दिन की तस्वीर, जिसमें सिया बिखरे हुए बालों के साथ गुस्से में आदित्य को घूर रही थी।
और उस तस्वीर के नीचे, सिया की खूबसूरत लिखावट में लिखा था:
*‘कुछ कहानियां किताबों में लिखी जाती हैं, कुछ दिल की धड़कनों में। मेरी धड़कन उस दिन से तुम्हारी हो गई, जिस दिन तुमने मेरे अंधेरे को अपने सीने पर झेल लिया।’
आदित्य ने नजरें उठाकर सिया को देखा।
सिया मुस्कुराई और उसने धीरे से अपना हाथ आदित्य की जख्मी कलाई पर रख दिया।
आदित्य ने अपना कैमरा उठाया, फ्रेम सेट किया और उस पल को हमेशा के लिए कैद कर लिया—जहाँ कोई खौफ नहीं था, कोई साजिश नहीं थी, सिर्फ कॉलेज का वो कट्टा था... और वो थी।