Pinku ki Pari - 3 in Hindi Fiction Stories by Deepak Kumar Tiwari Deeptansh books and stories PDF | पिंकू की परी - 3

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पिंकू की परी - 3

अम्मा की तोरई और स्पेसशिप का गियर'


सूं-सूं... खटर-पटर...'पिंकू पांडे उस पतले, अंधेरे लोहे के पाइप के अंदर अपने घुटनों और कोहनियों के बल रेंग रहे थे। कंधे का गमछा अब उनके मुँह पर बंधा हुआ था ताकि धूल मुँह में न जाए। बनारस की तंग गलियों में छुपकर भागने का अनुभव आज अंतरिक्ष में पिंकू के बहुत काम आ रहा था। पिंकू पांडे बस सरपट आगे की ओर बढ़ते जा रहे थे। पाइप में घुप्प अंधेरा था पिंकू पांडे की हालत पतली हो गई थी पर हिम्मत करके बाबा भोलेनाथ का नाम लेते हुए धीरे धीरे आगे बढ़ने लगे।




पिंकू पांडे:(मन ही मन बुदबुदाते हुए)"हे बजरंग बली! आज बचाए लो बाबा। अगर यहाँ से ज़िंदा लौटे ना, तो संकट मोचन मंदिर में पूरे पांच किलो का बूंदी का लड्डू चढ़ाएंगे। साला हाई स्कूल का इम्तिहान भी इस लोहे के चूहेदानी में रेंगने से ज़्यादा आसान था!"पिंकू अभी कुछ दूर और रेंगते कि अचानक उनके आगे की ज़मीन खत्म हो गई। पाइप का सिरा नीचे की तरफ खुला था। 





पिंकू ने नीचे झाँका—वहाँ एक बहुत बड़ा, आलीशान और चमचमाता हुआ गोल कमरा था। कमरे के बीचों-बीच एक विशाल स्टील की कुर्सी थी, जिसके सामने किसी हवाई जहाज़ के कॉकपिट जैसा बहुत बड़ा 'कंट्रोल पैनल' लगा था। उस पैनल पर हज़ारों रंग-बिरंगे बटन जुगनू की तरह भुक-भुक जल रहे थे। पूरे कमरे में लाल आपातकालीन (Emergency) बत्तियां घूम रही थीं और साइरन की आवाज़ गूँज रही थी।पिंकू ने गहरी सांस ली और पाइप से सीधे नीचे छलांग लगा दी—'धड़ाम!'वे सीधे उस मुख्य कुर्सी पर जा गिरे। कुर्सी इतनी मुलायम थी जैसे बनारस के किसी सेठ का सोफा हो।




पिंकू झटके से खड़े हुए और सामने के नज़ारे को देखकर उनका मुँह खुला का खुला रह गया। सामने कोई लोहे की दीवार नहीं थी, बल्कि एक विशाल कांच की खिड़की थी, जिसके पार नीले-काले अंतरिक्ष में लाखों तारे और चमकते हुए ग्रह तैर रहे थे। दूर एक बड़ा सा नीला गोला दिख रहा था—उनकी अपनी पृथ्वी!




पिंकू पांडे:आँखें फाड़कर देखते हुए)"अरे दादा रे! ई तो सचमुच का आसमान है बे! हम तो सोचे रहे कि कोई हमको नींद की दवाई खिलाकर रामनगर के किले में बंद कर दिया है। ई हरी चटनी वाले तो हमको सीधे ब्रह्मांड के पार ले आए!"तभी अचानक पूरी स्पेसशिप ज़ोर से हिली—'कड़कड़ड़ड़!'कांच के पार पिंकू ने देखा कि दूर से तीन-चार छोटी, काली उड़नतश्तरियां उनकी इस बड़ी स्पेसशिप की तरफ तेज़ी से बढ़ रही थीं और उनसे नीली लेज़र बीम (मिसाइल जैसी रोशनी) निकल रही थी।



स्पेसशिप का कंप्यूटर रोबोटिक आवाज़ में चिल्लाया—"वार्निंग! एनिमी शिप्स अप्रोचिंग! शील्ड कैपेसिटी 20%!"पिंकू पांडे कुर्सी पर वापस गिरे। उनके सामने कंट्रोल पैनल पर लाल, पीले, नीले, हरे रंग के हज़ारों बटन थे। उन्हें गाड़ी चलाना तो दूर, साइकिल की चेन चढ़ानी भी ठीक से नहीं आती थी।




पिंकू पांडे:(घबराकर अपना सिर पकड़ते हुए)"अरे बाप रे! ई तो बिना ड्राइवर की गाड़ी है! कौन सा बटन दबाएं? ई लाल वाला दबाएं का? नहीं-नहीं, लाल मतलब खतरा होता है। साला खोपड़िया एकदम कन्फुसिया गई है रे बाबा हमारी!"



पिंकू के हाथ कांप रहे थे। तभी उनकी नज़र पैनल के बिल्कुल बीचों-बीच चमक रहे एक बड़े, गोल 'हरे बटन' पर पड़ी। हरा रंग देखते ही पिंकू के दिमाग की बत्ती जली। उनके कानों में बनारस वाले घर की रसोई से आती अपनी अम्मा की कड़क आवाज़ गूँज उठी—"हरी सब्जी खाओ पिंकू, इससे शरीर और दिमाग में एनर्जी आवत है!




"पिंकू पांडे ने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कीं, मुँह का थूक निगला और मुस्कुराए।पिंकू पांडे:"अरे! अम्मा कहती रही कि हरे रंग में एनर्जी होती है। तो साला ई हरा बटन दबाई देई, तो ई लोहे के डिब्बे जैसे प्लेन मा भी सुपर-फास्ट एनर्जी आ जाए का? दबाई देते हैं बजरंग बली का नाम लेके! जो होगा देखा जाएगा!"पिंकू ने पूरी ताकत से अपनी हथेली उस चमकीले हरे बटन पर दे मारी—'ठाँय!'बटन दबते ही स्पेसशिप के भीतर एक भयानक गड़गड़ाहट हुई। एक तेज़ झटका लगा और अजीब सी आवाज आई।




—'भूंऊऊऊऊऊ!' कुर्सी के पीछे से दो लोहे के बेल्ट निकले और उन्होंने पिंकू को कुर्सी से कसकर बांध दिया। स्पेसशिप के पीछे लगे विशाल रॉकेट बूस्टर्स ने नीली आग छोड़ी। अगले ही पल, वो बड़ी स्पेसशिप किसी बुलेट ट्रेन की रफ़्तार से सीधे उन विलेन एलियंस की शिप्स को चीरती हुई, अंतरिक्ष की गहराइयों में गायब हो गई।रफ़्तार इतनी तेज़ थी कि पिंकू का मुँह पीछे की तरफ खिंच गया और उनकी आँखें चौंधिया गईं। वे चिल्लाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन मुँह से आवाज़ नहीं निकल रही थी।जब रफ़्तार थोड़ी थमी, तो स्पेसशिप एक शांत, नए ग्रह की कक्षा में तैर रही थी। पिंकू की सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। वे कुर्सी पर बंधे हुए थे और हिल भी नहीं पा रहे थे।तभी, कंट्रोल रूम का मुख्य दरवाज़ा एक धीमी आवाज़ के साथ खुला—'सूं...




'पिंकू ने डरते-डरते अपनी गर्दन घुमाई। दरवाज़े पर कोई डरावना, तरबूज के बीज जैसा हरा एलियन नहीं खड़ा था। वहाँ सफेद और चमकीले सिल्वर रंग के स्पेस सूट में एक बेहद खूबसूरत, सुनहरे बालों वाली लड़की खड़ी थी, जिसकी आँखों में नीली चमक थी। वह किसी परी जैसी दिख रही थी। उसके हाथ में एक अजीब सी लेज़र गन थी जो सीधे पिंकू की छाती पर तनी हुई थी।पिंकू पांडे:(फटी आँखों से उसे देखते हुए, धीरे से)"अरे दादा... ई अंतरिक्ष में अप्सरा कहाँ से अवत है बे? परी लोक आ गए का हम?





"लड़की ने अपनी गन को थोड़ा और पास लाया और अपनी कलाई पर बंधी स्क्रीन पर उंगली चलाते हुए रोबोटिक, लेकिन सुरीली आवाज़ में बोली—"आई एम कोड नेम: P-444। तुम कौन हो और हमारे शिप पर क्या कर रहे हो? तुम्हे पहले तो यहां कभी नहीं देखा 

पिंकू की और अजीब नज़रों से देख P-444 यह सोचने लगी कि यह अनोखा जीव कौन है। यह इस गृह का तो लगता नहीं है इसकी वेशभूषा और इसकी भाषा यहां की तो लगती नहीं है 




इन्हीं सब ख्यालों में खोई P-444 एकटक पिंकू पांडे को निहारने लगी। उसके अंदर यह ख्याल बार-बार आ रहा था कि यह दोस्त है या दुश्मन। इन्हीं विचारों में खोई हुई पी-444 ने अपनी गन को पिंकू की तरफ सीधा ताने हुए आगे बढ़ने लगी।




उधर पिंकू पांडे अपनी बड़ी-बड़ी आँखें खोलकर पी-444 को ऐसे देखने लगे, जैसे कोई ऐसी चीज़ देख ली हो जिसकी कल्पना भी न की हो। अजीब सी सनसनाहट पिंकू की खोपड़ी में होने लगी, पर वह किसी डर की वजह से नहीं, बल्कि पी-444 की सुंदरता को देखते हुए एक सुखद अनुभव की थी।











(भाग 3 समाप्त - आगे क्या होगा? क्या पिंकू पांडे इस अंतरिक्ष की परी P444 से दोस्ती कर पाएंगे।