This is one-sided love - Part 27 in Hindi Love Stories by Ankit Khatri books and stories PDF | एकतरफा प्यार है ये - भाग 27

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एकतरफा प्यार है ये - भाग 27

शाम के लगभग सात बज चुके थे।

ऑफिस की ज्यादातर लाइटें बंद हो चुकी थीं। कर्मचारियों की आवाजें धीरे-धीरे खत्म हो गई थीं और कुछ ही देर पहले तक जिस जगह पर लोगों की चहल-पहल थी, वहां अब एक अजीब-सी खामोशी फैल चुकी थी।

लेकिन अंजलि अभी भी अपनी केबिन में बैठी थी।

उसके सामने लैपटॉप खुला था।

स्क्रीन पर कुछ फाइलें थीं, लेकिन पिछले आधे घंटे से उसकी नजर उन फाइलों पर नहीं थी।

उसका ध्यान बार-बार सामने रखी एक पुरानी तस्वीर पर जा रहा था।

तस्वीर थोड़ी पुरानी थी।

किनारे हल्के-से मुड़ चुके थे।

लेकिन तस्वीर में मौजूद दो चेहरे आज भी उतने ही साफ थे।

एक चेहरा अंजलि का था।

और दूसरा...

राहुल का।

अंजलि ने कांपती उंगलियों से तस्वीर को उठाया।

कुछ पल तक वह उसे देखती रही।

फिर उसकी आंखें नम हो गईं।

“तुम्हें कुछ याद क्यों नहीं है, राहुल?”

उसने बहुत धीमी आवाज में खुद से पूछा।

“तुम्हें हमारा वो रिश्ता क्यों याद नहीं...?”

उसने तस्वीर को अपने सीने से लगा लिया।

कई सालों से उसके दिल में बंद एक कहानी आज उसके होंठों तक आ गई थी।

वह राहुल को सब कुछ बताना चाहती थी।

बताना चाहती थी कि राहुल उसके लिए सिर्फ एक कर्मचारी नहीं था।

सिर्फ कोई ऐसा लड़का नहीं था जिसे उसने मुसीबत में देखकर नौकरी दी थी।

सिर्फ कोई ऐसा इंसान नहीं था जिसे उसने अपने घर में रहने की जगह दी थी।

राहुल उसके अतीत का हिस्सा था।

उसकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा।

लेकिन समस्या सिर्फ इतनी थी कि राहुल को कुछ भी याद नहीं था।

उसके सामने बैठा राहुल अतीत वाला राहुल नहीं था।

वह उसे पहचानता तक नहीं था।

उसके लिए अंजलि...

सिर्फ उसकी बॉस थी।

उसकी मैम।

और यही बात अंजलि के दिल को हर दिन थोड़ा-थोड़ा तोड़ रही थी।

अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई।

अंजलि ने जल्दी से तस्वीर वापस फाइल के अंदर रख दी।

“Come in.”

दरवाजा खुला।

राहुल अंदर आया।

“मैम, आपने बुलाया था?”

अंजलि कुछ सेकंड तक उसे देखती रही।

वही आंखें।

वही आवाज।

वही चेहरा।

लेकिन यादें नहीं थीं।

“हां...” अंजलि ने खुद को संभालते हुए कहा, “बैठो।”

राहुल सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया।

“कोई काम था, मैम?”

अंजलि ने सिर हिलाया।

“काम तो है... लेकिन जरूरी नहीं है।”

राहुल थोड़ा हैरान हुआ।

“फिर?”

अंजलि कुछ बोल नहीं पाई।

उसने पानी का गिलास उठाया।

एक घूंट पिया।

फिर गिलास वापस रख दिया।

“राहुल... क्या तुमने कभी महसूस किया है कि तुम्हारी जिंदगी में कुछ ऐसा है जिसे तुम भूल चुके हो?”

राहुल का चेहरा गंभीर हो गया।

“मतलब?”

“मतलब...”

अंजलि कुछ क्षण रुकी।

“क्या तुम्हें कभी ऐसा लगता है कि तुम्हारी जिंदगी में कोई बहुत अपना था... लेकिन अब तुम्हें उसका चेहरा याद नहीं?”

राहुल ने कुछ देर सोचा।

फिर धीरे से बोला,

“कभी-कभी।”

अंजलि की धड़कन तेज हो गई।

“क्या याद आता है?”

“पता नहीं।”

“कुछ आवाज?”

“नहीं।”

“कोई जगह?”

राहुल ने सिर हिलाया।

“कभी-कभी सपने में कुछ धुंधला-सा दिखाई देता है। लेकिन सुबह उठने के बाद कुछ याद नहीं रहता।”

अंजलि की आंखें चमक उठीं।

“कैसा सपना?”

राहुल ने उसकी तरफ देखा।

“एक लड़की होती है।”

अंजलि का दिल जैसे एक पल के लिए रुक गया।

“लड़की?”

“हां।”

“वो कैसी दिखती है?”

राहुल ने आंखें बंद कर लीं।

“चेहरा साफ नहीं दिखता।”

अंजलि की सांस अटक गई।

“लेकिन...”

“लेकिन?”

“उसकी आवाज सुनाई देती है।”

अंजलि ने कांपते हुए पूछा,

“क्या कहती है?”

राहुल ने आंखें खोलीं।

“मुझे याद नहीं।”

अंजलि की उम्मीद फिर थोड़ी टूट गई।

राहुल ने पूछा,

“मैम, आप ये सब क्यों पूछ रही हैं?”

अंजलि कुछ नहीं बोली।

राहुल ने फिर पूछा,

“क्या आप उस लड़की को जानती हैं?”

अंजलि ने उसकी आंखों में देखा।

उसकी आंखों में एक सवाल था।

और अंजलि के पास उस सवाल का जवाब था।

लेकिन वह जवाब बोलने से डर रही थी।

क्योंकि उसे डर था कि अगर उसने सच बता दिया...

तो राहुल उससे और दूर हो जाएगा।

“शायद...” अंजलि ने धीरे से कहा।

राहुल चौंका।

“शायद?”

अंजलि ने नजरें झुका लीं।

“राहुल, अगर मैं तुमसे तुम्हारे पुराने जीवन के बारे में बात करूं... तो क्या तुम सुनोगे?”

“क्यों नहीं?”

“चाहे वो बात तुम्हारे लिए परेशान करने वाली हो?”

“हां।”

“चाहे उसमें कुछ ऐसा हो जिसे जानकर तुम्हारी जिंदगी बदल सकती है?”

राहुल कुछ क्षण चुप रहा।

फिर बोला,

“अगर वो मेरी जिंदगी का हिस्सा है तो मुझे जानना चाहिए।”

अंजलि की आंखों में आंसू आ गए।

उसने उन्हें रोक लिया।

“ठीक है।”

कुछ सेकंड कमरे में सिर्फ घड़ी की आवाज सुनाई देती रही।

टिक...

टिक...

टिक...

फिर अंजलि ने कहा,

“राहुल, तुम मुझे सिर्फ अपनी बॉस मानते हो न?”

राहुल ने तुरंत जवाब दिया,

“जी।”

अंजलि ने हल्की मुस्कान दी।

“और मैम?”

“जी।”

“अगर मैं कहूं कि कभी मैं तुम्हारी बॉस नहीं थी... तो?”

राहुल का चेहरा बदल गया।

“क्या मतलब?”

अंजलि ने उसकी तरफ देखा।

“कभी मैं तुम्हारे लिए कुछ और थी।”

राहुल चुप रहा।

अंजलि ने अपने हाथ कसकर पकड़ लिए।

“बहुत कुछ।”

राहुल ने धीरे से पूछा,

“हम पहले मिल चुके हैं?”

अंजलि की आंखों से आखिरकार एक आंसू निकल आया।

“हां।”

राहुल कुछ पल उसे देखता रहा।

“कब?”

“बहुत पहले।”

“कहां?”

अंजलि के होंठ कांपे।

“यही तो मैं तुम्हें बताना चाहती हूं।”

राहुल थोड़ा आगे झुका।

“तो बताइए।”

अंजलि ने गहरी सांस ली।

“तुम मुझे पहली बार नहीं मिले थे जब मैंने तुम्हें सड़क से उठाकर अस्पताल पहुंचाया था।”

राहुल के चेहरे पर हैरानी दिखाई दी।

“क्या?”

“हम उससे बहुत पहले मिल चुके थे।”

“लेकिन मुझे कुछ याद नहीं।”

“मुझे पता है।”

“आपने मुझे पहले कहां देखा था?”

अंजलि ने आंखें बंद कर लीं।

और उसके सामने अतीत की तस्वीरें घूमने लगीं।

---

कई साल पहले...

अंजलि तब इतनी मजबूत नहीं थी जितनी आज दिखाई देती थी।

वह कॉलेज में थी।

उसकी जिंदगी में सपने थे।

परिवार की उम्मीदें थीं।

और एक ऐसा लड़का था जिसकी वजह से उसकी दुनिया पूरी लगती थी।

राहुल।

वह समय अलग था।

राहुल के पास ज्यादा पैसे नहीं थे।

अंजलि एक बड़े परिवार से थी।

दोनों की दुनिया अलग थी।

लेकिन प्यार...

दुनिया नहीं देखता।

राहुल हमेशा अंजलि का ख्याल रखता था।

वह उसकी छोटी-छोटी बातों को याद रखता।

अंजलि को बारिश पसंद थी तो वह बारिश में उसके साथ घंटों खड़ा रहता।

अंजलि को डर लगता तो वह कहता,

“मैं हूं ना।”

अंजलि नाराज होती तो राहुल घंटों उसे मनाता।

और जब अंजलि पूछती,

“अगर एक दिन मैं तुम्हारे साथ नहीं रही तो?”

राहुल हमेशा मुस्कुराकर कहता,

“ऐसा दिन आएगा ही नहीं।”

लेकिन जिंदगी को शायद यही बात पसंद नहीं थी।

एक दिन सब कुछ बदल गया।

राहुल अचानक गायब हो गया।

एक हादसा हुआ।

अंजलि ने उसे खोजा।

बहुत खोजा।

लेकिन उसे बताया गया कि राहुल...

मर चुका है।

उस दिन अंजलि की दुनिया खत्म हो गई थी।

लेकिन आज...

वही राहुल उसके सामने बैठा था।

जिंदा।

सांस लेता हुआ।

उससे बात करता हुआ।

लेकिन उसकी यादों में अंजलि के लिए कुछ भी नहीं था।

---

“मैम?”

राहुल की आवाज सुनकर अंजलि वर्तमान में लौट आई।

“हां?”

“आप ठीक हैं?”

अंजलि ने जल्दी से आंसू पोंछे।

“हां।”

“आप रो क्यों रही हैं?”

“कुछ नहीं।”

“आप मुझसे कुछ छिपा रही हैं?”

अंजलि ने उसे देखा।

“हां।”

राहुल चुप हो गया।

“क्या?”

“एक ऐसी बात जो मैंने बहुत सालों से अपने अंदर छिपा रखी है।”

राहुल की नजरें गंभीर हो गईं।

“मुझसे जुड़ी हुई है?”

अंजलि ने सिर हिलाया।

“हां।”

राहुल ने धीमे स्वर में पूछा,

“क्या मैं आपका अपना था?”

अंजलि की आंखों से फिर आंसू निकल पड़े।

उसने कोई जवाब नहीं दिया।

लेकिन उसकी खामोशी ही जवाब थी।

राहुल की भौंहें सिकुड़ गईं।

“मैम...”

“मुझे मैम मत कहो।”

राहुल चौंका।

“क्या?”

अंजलि ने खुद को संभालते हुए कहा,

“कम से कम आज नहीं।”

“तो क्या कहूं?”

अंजलि के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई।

“वही... जो तुम कभी कहा करते थे।”

राहुल ने कोशिश की।

“अंजलि?”

अंजलि की आंखें भर आईं।

इतने साल बाद अपने नाम को उसके मुंह से उस तरह सुनना...

उसके लिए बहुत बड़ा पल था।

लेकिन राहुल के लिए वह सिर्फ एक नाम था।

“हां,” अंजलि ने कहा, “अंजलि।”

राहुल कुछ देर उसे देखता रहा।

“तो हम क्या थे?”

अंजलि ने जवाब देने के लिए होंठ खोले।

लेकिन आवाज नहीं निकली।

वह उठकर खिड़की के पास चली गई।

बाहर अंधेरा हो चुका था।

शहर की रोशनी दूर तक दिखाई दे रही थी।

“हम...”

वह रुक गई।

“हम बहुत करीब थे।”

राहुल ने पूछा,

“दोस्त?”

अंजलि ने धीरे से सिर हिलाया।

“उससे भी ज्यादा।”

राहुल समझ नहीं पाया।

“रिश्तेदार?”

“नहीं।”

“फिर?”

अंजलि ने आंखें बंद कर लीं।

“हम एक-दूसरे से प्यार करते थे।”

कमरे में जैसे अचानक सब कुछ शांत हो गया।

राहुल के चेहरे पर अविश्वास था।

“क्या?”

अंजलि ने उसकी तरफ देखा।

“हां।”

राहुल कुर्सी से थोड़ा पीछे हो गया।

“मैं... और आप?”

“हां।”

“लेकिन मुझे कुछ याद नहीं।”

“मुझे पता है।”

“मैंने आपको कभी ऐसा महसूस नहीं कराया।”

“क्योंकि तुम्हें याद नहीं।”

“क्या ये सच है?”

अंजलि ने मेज से पुरानी तस्वीर निकाली।

वह तस्वीर राहुल के सामने रख दी।

राहुल ने तस्वीर उठाई।

उसमें अंजलि और राहुल साथ खड़े थे।

दोनों मुस्कुरा रहे थे।

राहुल तस्वीर को घूरता रहा।

“ये... मैं हूं?”

“हां।”

“और ये आप?”

“हां।”

“हम इतने करीब थे?”

“हां।”

राहुल ने तस्वीर को उलट-पलटकर देखा।

पीछे कुछ लिखा था।

“क्या लिखा है?”

अंजलि ने तस्वीर अपने हाथ में ले ली।

पीछे लिखा था—

“जहां भी रहोगे, मेरा इंतजार करना।”

राहुल का चेहरा अचानक बदल गया।

उसकी आंखों के सामने कुछ चमका।

एक सड़क...

बारिश...

एक लड़की...

और किसी की आवाज—

“राहुल, वापस आना...”

उसने तुरंत अपना सिर पकड़ लिया।

“आह!”

अंजलि घबरा गई।

“राहुल!”

वह उसके पास दौड़ी।

“क्या हुआ?”

राहुल ने आंखें बंद कर लीं।

“मुझे... कुछ दिखाई दिया।”

“क्या?”

“बारिश...”

अंजलि की धड़कन तेज हो गई।

“और?”

“एक लड़की।”

“कौन?”

“पता नहीं।”

“उसने क्या कहा?”

राहुल ने माथा दबाया।

“वो कह रही थी... वापस आना।”

अंजलि की आंखों से आंसू बह निकले।

यही शब्द...

यही आखिरी शब्द थे जो उसने राहुल से उस रात कहे थे।

“राहुल...”

उसने उसका हाथ पकड़ लिया।

“वो लड़की मैं थी।”

राहुल ने आंखें खोल दीं।

दोनों की नजरें मिलीं।

कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।

राहुल ने धीरे से अपना हाथ उसके हाथ से अलग कर लिया।

अंजलि का दिल टूट गया।

“तुमने हाथ क्यों हटाया?”

राहुल ने नजरें झुका लीं।

“क्योंकि मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।”

“तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं?”

“मुझे नहीं पता।”

“मैं झूठ बोल रही हूं?”

“मैं ऐसा नहीं कह रहा।”

“फिर?”

राहुल ने कहा,

“मेरी याददाश्त ने मुझे धोखा दिया है। मैं किसी ऐसी चीज को कैसे अपना सच मान लूं जो मुझे खुद याद नहीं?”

अंजलि कुछ पल चुप रही।

फिर उसने सिर हिलाया।

“तुम सही कह रहे हो।”

“मैम... मेरा मतलब—अंजलि...”

अंजलि ने हल्की मुस्कान दी।

“कोई बात नहीं।”

राहुल उठ गया।

“मुझे थोड़ा समय चाहिए।”

“ले लो।”

“मैं अभी इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर सकता।”

अंजलि की आंखों में दर्द था।

“मैंने तुमसे स्वीकार करने के लिए नहीं कहा।”

“फिर?”

“सिर्फ इतना चाहती हूं कि तुम सच जानो।”

राहुल दरवाजे की तरफ बढ़ा।

फिर अचानक रुक गया।

“एक बात पूछूं?”

“हां।”

“अगर मैं सच में आपका... तुम्हारा अपना था।”

अंजलि ने उसकी तरफ देखा।

“तो?”

“फिर तुमने मुझे इतने सालों तक ढूंढा क्यों नहीं?”

अंजलि का चेहरा सफेद पड़ गया।

यह सवाल उसके दिल के सबसे पुराने घाव पर लगा था।

“मैंने ढूंढा था।”

“कितना?”

“हर दिन।”

“फिर?”

“मुझे बताया गया था कि तुम मर चुके हो।”

राहुल चुप हो गया।

अंजलि ने कहा,

“मैंने तुम्हारी मौत पर विश्वास नहीं किया था।”

“फिर?”

“लेकिन मेरे पास कोई रास्ता नहीं था।”

“और अब?”

अंजलि ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

“अब तुम मेरे सामने हो।”

राहुल ने कुछ नहीं कहा।

वह कमरे से बाहर चला गया।

दरवाजा बंद हो गया।

अंजलि वहीं खड़ी रही।

उसकी आंखों से आंसू बहते रहे।

“मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूंगी, राहुल...”

उसने धीरे से कहा।

“लेकिन मैं तुम्हें तुम्हारी पूरी कहानी जरूर बताऊंगी।”

---

राहुल ऑफिस से बाहर निकला।

उसके कदम धीमे थे।

उसके दिमाग में एक ही बात घूम रही थी।

“हम एक-दूसरे से प्यार करते थे।”

वह खुद से सवाल कर रहा था।

क्या सच में?

क्या वह अंजलि से प्यार करता था?

अगर करता था...

तो उसे कुछ याद क्यों नहीं?

उसने फोन निकाला।

स्क्रीन पर उसका चेहरा दिखाई दिया।

उसे अचानक अपनी पुरानी जिंदगी के बारे में जानने की बेचैनी होने लगी।

उसने इंटरनेट पर अपना नाम खोजने की कोशिश की।

कुछ खास नहीं मिला।

फिर उसने पुराने दस्तावेज देखने शुरू किए।

कुछ नाम...

कुछ तारीखें...

कुछ जगहें...

लेकिन सब धुंधला था।

अचानक उसे एक फाइल दिखाई दी जो उसके कमरे में कुछ दिनों पहले मिली थी।

उसमें एक पुराना अस्पताल का कागज था।

राहुल ने उसे खोला।

उस पर लिखा था—

Patient: Rahul Sharma

और नीचे एक तारीख थी।

वही तारीख...

जिसके बाद उसकी जिंदगी की सारी यादें गायब थीं।

राहुल का दिल तेज धड़कने लगा।

उसने कागज को पलटा।

पीछे डॉक्टर की एक टिप्पणी थी।

“Patient has severe memory loss. Emotional triggers may help recover fragmented memories.”

राहुल की आंखें फैल गईं।

“Emotional triggers...”

उसने बुदबुदाया।

फिर उसे अंजलि की बात याद आई।

“वो लड़की मैं थी।”

क्या अंजलि ही उसकी खोई हुई यादों की चाबी थी?

---

उधर अंजलि अभी भी ऑफिस में थी।

उसने अपनी दराज खोली।

उसमें एक छोटा-सा डिब्बा रखा था।

डिब्बे में कुछ पुरानी चीजें थीं।

एक छोटी-सी चाबी।

एक पुराना कागज।

एक सूखा हुआ फूल।

और एक अंगूठी।

अंजलि ने अंगूठी उठाई।

वह वही अंगूठी थी जो राहुल ने उसे कभी दी थी।

उस दिन राहुल ने कहा था—

“ये कोई महंगी अंगूठी नहीं है।”

अंजलि ने हंसकर पूछा था—

“तो?”

“बस एक वादा है।”

“कैसा वादा?”

“कि चाहे कुछ भी हो जाए, मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगा।”

अंजलि ने तब मजाक में कहा था,

“और अगर जिंदगी ने हमें अलग कर दिया तो?”

राहुल ने उसका हाथ पकड़कर कहा था,

“तो मैं तुम्हें फिर ढूंढ लूंगा।”

अंजलि की आंखों से आंसू गिरने लगे।

“तुमने ढूंढ तो लिया, राहुल...”

उसने अंगूठी को देखते हुए कहा।

“बस तुम मुझे पहचान नहीं पाए।”

---

अगली सुबह राहुल ऑफिस आया तो उसका व्यवहार सामान्य था।

वह अपने काम में लगा रहा।

अंजलि ने दूर से उसे देखा।

वह उसके पास जाना चाहती थी।

लेकिन उसने खुद को रोक लिया।

राहुल को समय चाहिए था।

उसे मजबूर करना सही नहीं था।

दोपहर में राहुल उसके केबिन में आया।

“अंजलि।”

अंजलि ने सिर उठाया।

“हां?”

“कल आपने जो कहा था...”

अंजलि का दिल धड़कने लगा।

“हां?”

“क्या आपके पास मेरे और अपने पुराने रिश्ते का कोई और सबूत है?”

अंजलि ने कुछ पल उसे देखा।

फिर बोली,

“हां।”

“क्या?”

“बहुत कुछ।”

“मैं देख सकता हूं?”

“अभी?”

“हां।”

अंजलि ने सिर हिलाया।

“ठीक है।”

उसने एक फाइल निकाली।

उसमें कई तस्वीरें थीं।

कॉलेज की।

एक छोटी-सी चाय की दुकान की।

बारिश में दोनों की तस्वीर।

एक मंदिर के बाहर की तस्वीर।

और एक तस्वीर जिसमें राहुल अंजलि के माथे पर हल्के से हाथ रखकर मुस्कुरा रहा था।

राहुल एक-एक तस्वीर देखता गया।

उसके चेहरे पर कोई स्पष्ट भाव नहीं था।

लेकिन उसकी उंगलियां कांप रही थीं।

“ये सब कब की हैं?”

“लगभग छह साल पुरानी।”

“हम इतने समय तक साथ थे?”

“नहीं।”

“तो?”

“हमारे बीच बहुत कुछ था... लेकिन सब कुछ आसान नहीं था।”

राहुल ने उसकी तरफ देखा।

“क्या हमारे रिश्ते में कोई समस्या थी?”

अंजलि चुप हो गई।

“हां।”

“क्या?”

“मेरे परिवार की।”

राहुल समझ गया।

“उन्हें मैं पसंद नहीं था?”

“तुम्हें नहीं... तुम्हारी हैसियत पसंद नहीं थी।”

राहुल कुछ देर चुप रहा।

फिर हल्का-सा मुस्कुराया।

“तो मैं गरीब था?”

“हां।”

“और तुम अमीर?”

“हां।”

“फिर तुमने मुझे चुना?”

अंजलि ने बिना झिझक कहा,

“हां।”

“क्यों?”

अंजलि ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

“क्योंकि मुझे तुम्हारे पैसे नहीं चाहिए थे।”

राहुल कुछ नहीं बोला।

“मुझे तुम चाहिए थे।”

राहुल की आंखों में पहली बार एक अजीब-सी बेचैनी दिखाई दी।

जैसे उसके अंदर कहीं कुछ हल रहा हो।

“अंजलि...”

“हां?”

“तुम मुझे अभी भी प्यार करती हो?”

अंजलि के पास इस सवाल का जवाब बहुत पहले से था।

उसने धीरे से कहा,

“हां।”

राहुल ने नजरें झुका लीं।

“लेकिन मैं तुम्हें प्यार नहीं करता।”

अंजलि की आंखें बंद हो गईं।

यह सुनना आसान नहीं था।

लेकिन उसने खुद को संभाला।

“मुझे पता है।”

“फिर भी?”

“फिर भी।”

“क्यों?”

अंजलि ने उसकी तरफ देखा।

“क्योंकि प्यार याददाश्त से खत्म नहीं होता।”

राहुल चुप रहा।

“लेकिन मैं तुमसे कोई उम्मीद नहीं रखती।”

“सच?”

“सच।”

“अगर मुझे कभी कुछ याद नहीं आया तो?”

अंजलि की आंखें नम थीं।

“तो भी मैं तुम्हें दोष नहीं दूंगी।”

“और अगर मुझे सब याद आ गया?”

अंजलि कुछ पल उसे देखती रही।

फिर मुस्कुराकर बोली,

“तब फैसला तुम करना।”

राहुल ने पहली बार उसकी तरफ बिना किसी औपचारिक दूरी के देखा।

“तुम बहुत अजीब हो।”

अंजलि हल्का-सा हंसी।

“तुम हमेशा यही कहते थे।”

राहुल अचानक चुप हो गया।

“हमेशा?”

अंजलि की मुस्कान रुक गई।

राहुल ने अपना सिर पकड़ लिया।

“मुझे... कुछ याद आ रहा है।”

“क्या?”

“तुम हंस रही हो।”

अंजलि की आंखें फैल गईं।

“और?”

“मैं कह रहा हूं...”

वह आंखें बंद करके याद करने की कोशिश करने लगा।

“तुम बहुत अजीब हो।”

अंजलि की सांस रुक गई।

यही वाक्य...

यही आवाज...

यही अंदाज...

राहुल ने फिर आंखें खोलीं।

लेकिन याद फिर धुंधली हो चुकी थी।

“क्या हुआ?”

अंजलि ने उसकी तरफ कदम बढ़ाया।

“तुम्हें याद आया।”

“कुछ सेकंड के लिए।”

“यही शुरुआत है।”

राहुल ने कुछ नहीं कहा।

लेकिन उसके चेहरे पर पहली बार उम्मीद थी।

---

शाम को राहुल अकेला घर लौट रहा था।

उसके दिमाग में तस्वीरें घूम रही थीं।

अंजलि।

बारिश।

चाय।

कॉलेज।

एक अंगूठी।

एक आवाज।

और फिर...

एक हादसा।

अचानक उसके सिर में तेज दर्द हुआ।

वह सड़क किनारे रुक गया।

उसने आंखें बंद कर लीं।

इस बार सपना नहीं था।

यह याद थी।

वह एक कार में बैठा था।

बारिश बहुत तेज थी।

उसके साथ अंजलि थी।

वह उससे कुछ कह रही थी।

“राहुल, तुम वापस आओगे ना?”

राहुल ने मुस्कुराकर कहा,

“मैं हमेशा वापस आऊंगा।”

फिर सामने तेज रोशनी दिखाई दी।

एक ट्रक।

ब्रेक की आवाज।

अंजलि की चीख।

और फिर...

अंधेरा।

राहुल ने आंखें खोल दीं।

उसकी सांसें तेज थीं।

“अंजलि...”

उसने पहली बार खुद उसके नाम को इस तरह पुकारा।

उसे समझ आने लगा था कि उसके अतीत में सिर्फ प्यार नहीं था।

कुछ बहुत बड़ा हुआ था।

और शायद...

अंजलि ने उससे पूरी सच्चाई अभी तक नहीं बताई थी।

---

उसी समय अंजलि के फोन पर एक अनजान नंबर से कॉल आया।

“हैलो?”

दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक खामोशी रही।

फिर एक पुरुष आवाज आई।

“तुमने राहुल को उसके अतीत के बारे में बताना शुरू कर दिया?”

अंजलि का चेहरा बदल गया।

“तुम कौन हो?”

आवाज आई,

“अगर राहुल को सब याद आ गया... तो बहुत लोगों की जिंदगी बदल जाएगी।”

अंजलि ने घबराकर पूछा,

“तुम्हें राहुल के बारे में कैसे पता?”

फोन कट गया।

अंजलि कुछ सेकंड तक फोन को देखती रही।

फिर उसके चेहरे पर डर उतर आया।

उसे समझ आ गया था...

राहुल की याददाश्त सिर्फ एक निजी कहानी नहीं थी।

उसके पीछे कोई ऐसा राज था जिसे कोई अब भी छिपाना चाहता था।

और सबसे बड़ा सवाल...

अगर राहुल को सब कुछ याद आ गया, तो सबसे ज्यादा डर किसे था?

अंजलि ने तुरंत राहुल को फोन मिलाया।

फोन नहीं उठा।

उसने दोबारा कॉल किया।

फिर भी नहीं।

अंजलि की बेचैनी बढ़ती गई।

उधर राहुल अपने कमरे में बैठा था।

उसके सामने पुरानी तस्वीर रखी थी।

उसने तस्वीर को देखा।

फिर तस्वीर में अंजलि के चेहरे पर उंगली रखी।

और बहुत धीमी आवाज में कहा—

“मुझे सब याद आएगा, अंजलि।”

उसकी आंखों में पहली बार एक अलग चमक थी।

“चाहे मेरे अतीत में कितना भी दर्द क्यों न हो...”

उसने तस्वीर को मुट्ठी में कस लिया।

“मैं सच जानकर रहूंगा।”

लेकिन उसी पल उसके कमरे के दरवाजे के नीचे से एक लिफाफा अंदर सरका।

राहुल ने उसे देखा।

वह धीरे-धीरे उठा।

लिफाफा उठाया।

उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

“अगर अपना अतीत जानना है, तो अंजलि से दूर रहो।”

राहुल की आंखें फैल गईं।

उसने लिफाफा खोला।

अंदर एक पुरानी तस्वीर थी।

तस्वीर देखकर उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

क्योंकि उस तस्वीर में...

राहुल अकेला नहीं था।

उसके साथ एक तीसरा आदमी भी खड़ा था।

और उस आदमी के चेहरे को देखते ही राहुल के दिमाग में एक ही शब्द गूंजा—

“R...”

राहुल ने तस्वीर हाथ से गिरा दी।

उसके सिर में फिर तेज दर्द उठा।

और इस बार...

उसकी यादों का दरवाजा पहले से कहीं ज्यादा खुल चुका था।