I found you when I lost myself - 8 in Hindi Love Stories by Khwaab books and stories PDF | तुम मिले, जब मैं खुद से बिछड़ गई - 8

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तुम मिले, जब मैं खुद से बिछड़ गई - 8

“कल… उसी जगह।”

Vihaan का आखिरी message पढ़ने के बाद भी Aashi काफी देर तक फोन हाथ में लिए बैठी रही।

उसके मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी। वह जानती थी कि अगले दिन उसे उस जगह जाना होगा, जहाँ उसकी जिंदगी की कोई भूली हुई कहानी शायद उसका इंतज़ार कर रही थी।

लेकिन घरवालों से क्या कहेगी?

वह पूरी रात ठीक से सो नहीं पाई।

सुबह जब उसकी आँख खुली, तो खिड़की से आती धूप कमरे में फैल चुकी थी। उसने सबसे पहले फोन देखा। Vihaan की तरफ से कोई नया message नहीं था।

शायद उसे भी पता था कि अब अगली बात आमने-सामने ही होनी थी।

Aashi तैयार होकर नीचे आई।

माँ नाश्ता लगा रही थीं और पापा हमेशा की तरह अखबार पढ़ रहे थे।

“आज कॉलेज जल्दी जाना है?” माँ ने पूछा।

Aashi कुछ पल चुप रही।

“हाँ… थोड़ा काम है।”

पापा ने अखबार से नज़र उठाई।

“किस तरह का काम?”

Aashi के हाथ रुक गए।

“बस कॉलेज का ही है।”

Rajesh ने उसे कुछ सेकंड देखा, फिर वापस अखबार पढ़ने लगे।

लेकिन Aashi को उनकी आँखों में कुछ अजीब-सा दिखाई दिया।

क्या पापा को कुछ पता था?

या फिर वह खुद ही हर बात को 22 August से जोड़ने लगी थी?

कॉलेज पहुँचते ही Meera उसके पास आ गई।

“मैडम, आज चेहरा इतना serious क्यों है? रात को फिर कोई mysterious message आया था क्या?”

Aashi ने हल्की-सी मुस्कान दी।

“नहीं।”

Meera ने उसकी तरफ ध्यान से देखा।

“तुम झूठ बोल रही हो।”

Aashi ने आखिरकार उसे सब कुछ बता दिया—पुरानी डायरी, Aarav की याद, पापा और Vihaan की उस दिन हुई बातचीत और अगले दिन मिलने का message।

Meera कुछ देर चुप रही।

“तुम अकेली मत जाना।”

Aashi ने उसकी तरफ देखा।

“मैं अकेली ही जाऊँगी। मुझे लगता है ये बात मुझे खुद समझनी होगी।”

“लेकिन अगर बात वैसी नहीं हुई जैसी तुम सोच रही हो?”

Aashi ने धीमे से कहा—

“तो कम से कम मुझे पता तो चलेगा कि सच क्या है।”

अगले दिन शाम को Aashi उसी पुरानी जगह के बाहर खड़ी थी।

वहाँ सब कुछ पहले जैसा नहीं था।

कुछ दुकानें बदल चुकी थीं, सड़क पहले से ज्यादा व्यस्त थी और बारिश की जगह हवा में हल्की ठंडक थी।

लेकिन उस कोने में बनी छोटी-सी किताबों की दुकान अब भी वहीं थी।

Aashi ने दरवाज़ा खोला।

अंदर कदम रखते ही उसे एक अजीब-सी पहचान महसूस हुई।

जैसे उसका मन उस जगह को उसके दिमाग से पहले पहचान चुका हो।

वह धीरे-धीरे उसी मेज़ तक पहुँची, जिसके बारे में Vihaan ने कहा था।

मेज़ पर एक पुरानी किताब रखी थी।

उसने किताब उठाई।

पहले पन्ने पर सिर्फ एक शब्द लिखा था—

“वापसी।”

Aashi ने पीछे से आवाज़ सुनी—

“तुम आ गई।”

वह पलटी।

Vihaan सामने खड़ा था।

कुछ सेकंड दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई।

Aashi ने सबसे पहले पूछा—

“तुमने मुझे यहाँ क्यों बुलाया?”

Vihaan ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

“क्योंकि उस दिन जो हुआ था, उसकी शुरुआत यहीं से हुई थी।”

“और मेरे पापा?”

Vihaan कुछ पल चुप रहा।

“हाँ… तुम्हारे पापा भी उस कहानी का हिस्सा थे।”

Aashi ने बेचैनी से पूछा—

“उन्होंने तुमसे क्या कहा था?”

Vihaan ने मेज़ पर रखी किताब उसकी तरफ बढ़ा दी।

“पहले इसे खोलो।”

Aashi ने किताब खोली।

बीच के एक पन्ने में वही नीली स्याही थी, जिसे वह अपनी डायरी की लिखावट से पहचानती थी।

उसमें लिखा था—

“अगर Aashi को कभी सच जानना हो, तो उसे यह मत बताना कि मैंने उससे क्या वादा किया था।”

Aashi की आँखें फैल गईं।

“ये किसने लिखा?”

Vihaan ने धीरे से कहा—

“तुम्हारी माँ ने।”

Aashi के हाथ से किताब लगभग छूट गई।

“मेरी… माँ?”

Vihaan ने सिर हिलाया।

“हाँ। लेकिन उन्होंने यह सब तुम्हारी वजह से किया था।”

Aashi कुछ समझ नहीं पा रही थी।

“मेरी वजह से? आखिर क्या हुआ था?”

Vihaan ने गहरी साँस ली।

“उस दिन तुम्हें कुछ ऐसा पता चल गया था, जिसे तुम्हारे परिवार ने तुमसे छिपाने का फैसला किया।”

“क्या?”

Vihaan ने उसकी तरफ देखा।

“मैं तुम्हें बता दूँगा… लेकिन पहले तुम्हें अपनी डायरी का आखिरी पन्ना पढ़ना होगा।”

Aashi ने तुरंत कहा—

“वो तो खाली है।”

Vihaan की आँखों में हल्की-सी गंभीरता आ गई।

“नहीं, Aashi… वो खाली नहीं है।”

“फिर?”

Vihaan ने धीमे से कहा—

“उस पन्ने की लिखावट मिटाई गई है।”

Aashi की साँस अटक गई।

वह तुरंत अपनी डायरी बैग से निकालने लगी।

लेकिन जैसे ही उसने आखिरी पन्ना खोला, उसके अंदर से एक छोटा-सा मुड़ा हुआ कागज़ नीचे गिर पड़ा।

Aashi ने उसे उठाया।

कागज़ खोलते ही उसकी आँखें एक ही जगह जम गईं।

ऊपर लिखा था—

“जिस दिन तुम्हें यह मिलेगा, समझ जाना कि अब सच छिपाना संभव नहीं है।”

और नीचे…

एक ऐसा नाम था, जिसे देखकर Aashi ने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

🌙 क्रमशः…