Ankaha sach ( Part - 15) in Hindi Fiction Stories by Vishakha Pareek books and stories PDF | अनकहा सच ( भाग - 15)

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अनकहा सच ( भाग - 15)

अनकहा सच___


हितेश के पापा के यह सब बताने के बाद राजू बस सुन्न सा खड़ा रहता है। उसके अंदर एक अजीब सी घबराहट भर जाती है, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा होता कि क्या करे और क्या न करे।
हितेश उसे संभालता है और कहता है, "राजू..., तू ठीक तो है ना?"
राजू हितेश की तरफ देखता है और जैसे ही वह हितेश को देखता है, वह फूट-फूट कर रोने लगता है। हितेश उसे गले लगाता है और सँभालता है। हितेश के माँ-पापा भी राजू को संभालने की कोशिश करते हैं।
राजू एकटक खड़ा रहता है और हितेश से कहता है, "यार हितेश... तू मुझे मेरे घर ले जा।"
हितेश पूछता है, "राजू, तू ठीक तो है ना?"
राजू रोते हुए बस यही दोहराता है, "नहीं हितेश यार... तू मुझे मेरे घर ले जा, मुझे मेरे घर जाना है! बस मुझे मेरे घर ले जा..."
हितेश के माँ-पापा राजू से फिर से हाथ जोड़कर माफी माँगते हैं। राजू उन्हें देखता है और भारी मन से कहता है, "अंकल-आंटी, प्लीज... आप यह सब मत कीजिए। मुझे नहीं पता क्या सही है और क्या गलत, लेकिन आप मेरे दोस्त के माता-पिता हैं, मेरे लिए भी मम्मी-पापा जैसे ही हैं। आप मेरे सामने बार-बार हाथ जोड़कर माफी मत माँगिए। उस वक्त जो आपकी हालत थी... अगर शायद मैं भी आपकी जगह होता, तो शायद मैं भी डरकर यही कर देता। लेकिन यह सब गलत था अंकल, ऐसा नहीं करना चाहिए था... हमारे बारे में तो किसी ने सोचा ही नहीं! पीछे हम भी तो थे... लेकिन प्लीज, आप मेरे सामने ऐसे हाथ मत जोड़िए।"
हितेश के माँ-पापा आंसुओं से भीगी आँखों से कहते हैं, "राजू बेटा... हम आज तक इस पाप के बोझ को उठाए फिर रहे हैं। हमें समझ नहीं आ रहा था कि हम क्या करें। बाहर से चाहे कुछ न दिखता हो, लेकिन अंदर ही अंदर हमें यह बात आज भी खाए जा रही थी कि उस औरत के पीछे उसके बच्चों का क्या हुआ होगा? सब कैसे चल रहा होगा? और जब गाँव वालों ने सब कह दिया कि वह भाग गई... तो तुम्हारी मां पर कैसे-कैसे लांछन लगाए गए, उन्हें कैसे दोषी ठहरा दिया गया! हम घुटते रहे पर कुछ न कह सके... हमें माफ कर दो बेटा!"
राजू अब और कुछ नहीं कहता। वह बस हितेश की तरफ देखता है और कहता है, "चल यार... तू मुझे मेरे घर ले जा।"
हितेश राजू के चेहरे का दर्द देखता है, फिर बिना कुछ कहे राजू के साथ उसके घर जाने के लिए हाँ कह देता है।
हितेश राजू को बाइक पर बैठाकर उसके घर लेकर जाता है। पूरे रास्ते राजू खामोश रहता है और उसकी आँखों से लगातार आँसू बहते रहते हैं। हितेश की आँखों में भी आँसू होते हैं, लेकिन वह खुद को सँभालते हुए राजू को safe घर पहुँचाता है।
यूँ अचानक राजू को इस हालत में घर आया देखकर उसके दादा-दादी और बहन परेशान हो जाते हैं। उसकी माँ भी घबरा जाती हैं।
राजू की ऐसी हालत देखकर वे सब उससे पूछने लगते हैं, "क्या हुआ राजू?! तू अचानक ऐसे कैसे आ गया? यह क्या हाल बना रखा है? तू रो क्यों रहा है? क्या हुआ हितेश, इसे तू ऐसे क्यों ला रहा है? क्या हुआ है?"
घर में सवालों की बारिश सी होने लगती है।
तभी राजू अपनी बहन की तरफ देखता है और दौड़कर उसके गले लग जाता है! वह अपनी बहन के कंधे पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोना शुरू कर देता है।
उसकी बहन पूरी तरह घबरा जाती है कि अचानक भाई को क्या हो गया। वह रोते हुए राजू से पूछती है, "भैया क्या हुआ?" वह हितेश से पूछती है। उसकी माँ और दादा-दादी सब घबराकर राजू को संभालने की कोशिश करते हैं। हितेश भी राजू को सँभालने में लगा होता है, पर राजू कुछ नहीं बोल पाता... वह बस रोए जा रहा था, रोए जा रहा था...
कि तभी अचानक... घर के अंदर से एक कर्कश और जहरीली चीख की आवाज़ आती है—
"कौन रो रहा है बे बाहर?! क्यों मर गया कोई?!"
और ऐसा चिल्लाते हुए, राजू का पिता हाथ में शराब की बोतल लिए नशे में धुत होकर घर के कमरे से बाहर निकलता है...