भाग 4 — बदलते मन और टूटता विश्वास
समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा था। विभा अब किशोरावस्था में प्रवेश कर चुकी थी। भाग तीन में उसके मन में जीवन को लेकर अनेक प्रश्न उठने लगे थे। अब उसके भीतर विचारों का एक ऐसा तूफ़ान उठने लगा था, जिसे समझ पाना उसके लिए आसान नहीं था।
कभी वह कुछ सोचती, कभी कुछ करना चाहती और कभी अपने ही विचारों में इतनी खो जाती कि उसे आसपास की दुनिया का ध्यान ही नहीं रहता। उसके मन में बड़े-बड़े सपने जन्म लेने लगे थे। कभी वह सोचती कि उसे जीवन में यह करना है, कभी लगता कि वह कुछ ऐसा करेगी जिससे उसका जीवन दूसरों से अलग होगा। लेकिन इन सपनों के साथ ही उसके मन में अनेक उलझनें भी थीं।
इस उम्र में उसे अक्सर ऐसा लगता कि सभी लोग उसे देख रहे हैं। वह क्या पहन रही है, कैसे बोल रही है, कैसे चल रही है और दूसरों के सामने कैसा व्यवहार कर रही है—मानो हर कोई इन बातों पर ध्यान दे रहा हो।
धीरे-धीरे वह अपने पहनावे और व्यक्तित्व को लेकर भी पहले से अधिक सजग होने लगी। वह चाहती थी कि लोग उसे अच्छा समझें, उसकी प्रशंसा करें और उसके बारे में अच्छी बातें कहें।
लेकिन वह यह नहीं समझ पा रही थी कि जिन बातों को लेकर वह इतनी चिंतित रहती है, दूसरे लोग शायद उन पर उतना ध्यान देते ही नहीं। यह उसके अपने मन के विचार थे, जो कभी उसे उत्साहित करते तो कभी उलझन में डाल देते।
विभा के साथ ही नहीं, इस उम्र से गुजरने वाले अनेक बच्चों के मन में ऐसे विचार आते हैं। बचपन से किशोरावस्था की ओर बढ़ते हुए शरीर के साथ-साथ विचारों, भावनाओं और व्यवहार में भी बदलाव आने लगते हैं। कभी अपनी ही आवाज़ अलग लगती, कभी अपने व्यवहार में परिवर्तन महसूस होता और कभी छोटी-छोटी बातें भी मन को गहराई से छू जातीं।
विभा के साथ भी यही हो रहा था।
उसकी पढ़ाई चल रही थी, विद्यालय जाना और घर लौटकर पढ़ना उसकी दिनचर्या का हिस्सा था। लेकिन अब पढ़ाई के साथ उसके मन में कई नए प्रश्न भी जुड़ गए थे। वह अपने भीतर होने वाले परिवर्तनों को समझना चाहती थी, पर उसे यह समझ नहीं आता था कि आखिर उसके साथ ऐसा क्यों हो रहा है।
कभी कोई उसे समझाने की कोशिश करता, तो उसे लगता कि कोई उसकी बात समझ ही नहीं रहा। और जब कोई अच्छी बात समझाता भी, तब वह उसे पूरी तरह समझ नहीं पाती।
उस उम्र में भावनाएँ बहुत कोमल होती हैं। कभी किसी की छोटी-सी प्रशंसा मन को खुश कर देती है, तो कभी किसी का एक वाक्य भीतर तक चुभ जाता है।
यदि कोई उसके बारे में कह देता कि वह अच्छी नहीं दिखती, उसका व्यवहार ठीक नहीं है या वह पढ़ाई में उतनी अच्छी नहीं है, तो विभा को बहुत बुरा लगता। वह उन बातों को बार-बार सोचती रहती। कभी उसे गुस्सा आता, कभी रोना आ जाता और कभी वह स्वयं से ही नाराज़ हो जाती।
कभी-कभी घर में भी ऐसा हो जाता। मम्मी-पापा किसी बात पर उसे समझाते या उसकी किसी गलती की ओर ध्यान दिलाते, तो वह तुरंत नाराज़ हो जाती। कभी गुस्से में कुछ ऐसा कह देती, जिसका उसे बाद में पछतावा होता।
जब उसका गुस्सा शांत होता, तो वह स्वयं से पूछती—
“मैंने ऐसा क्यों कहा? मम्मी-पापा तो मुझे समझा रहे थे, फिर मुझे इतना गुस्सा क्यों आया? मैं छोटी-छोटी बातों पर इतनी परेशान क्यों हो जाती हूँ?”
लेकिन उसके पास इन प्रश्नों के उत्तर नहीं थे।
एक दिन मम्मी ने उसे प्यार से समझाने की कोशिश की।
उन्होंने कहा, “बेटा, जीवन में बदलाव आते रहते हैं। बचपन के बाद जब हम बड़े होने लगते हैं, तो हमारे शरीर, विचारों और भावनाओं में भी बदलाव आते हैं। कभी हमें स्वयं ही समझ नहीं आता कि हम ऐसा क्यों सोच रहे हैं या ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं। लेकिन इन परिवर्तनों से घबराना नहीं चाहिए। धीरे-धीरे हम अपने आपको समझने लगते हैं।”
मम्मी की बातें अच्छी थीं, लेकिन उस समय विभा उन्हें पूरी तरह समझ नहीं पाई। उसे लगा कि शायद मम्मी उसकी उलझनों को सामान्य बात मानकर समझा रही हैं, जबकि उसके लिए वे उलझनें बहुत बड़ी थीं।
समय बीतता गया। विभा भी अपने अनुभवों से गुजरते हुए आगे बढ़ती रही। देखते ही देखते वह दसवीं कक्षा में पहुँच गई।
दसवीं कक्षा में उसकी मुलाकात रिद्धि से हुई।
रिद्धि के विचार खुले हुए थे। वह बहुत-सी बातों पर खुलकर अपनी राय रखती थी। विभा को उसकी बातें अच्छी लगती थीं। जब भी विभा के मन में कोई प्रश्न उठता और वह रिद्धि से पूछती, तो रिद्धि उसे अपने ढंग से उत्तर देती। विभा को लगता कि शायद उसे एक ऐसा साथी मिल गया है, जिसके सामने वह बिना किसी डर के अपने मन की बातें रख सकती है।
धीरे-धीरे दोनों के बीच दोस्ती बढ़ने लगी।
विभा ने रिद्धि पर विश्वास करना शुरू कर दिया। उसने अपने मन की वे बातें भी उसके साथ साझा कीं, जिन्हें वह अब तक किसी से कह नहीं पाई थी। वह उसे बताती कि उसके मन में क्या चल रहा है, उसे जीवन के बारे में क्या समझ नहीं आता और अपने भीतर होने वाले बदलावों को लेकर वह कितनी उलझन में रहती है।
विभा को लगता था कि रिद्धि उसकी बातों को समझती है। उसे विश्वास था कि जो बातें वह अपनी दोस्त को बता रही है, वे उन्हीं दोनों के बीच रहेंगी।
लेकिन कभी-कभी हम जिसे अपना समझकर अपने मन की बातें बताते हैं, वह हमारे विश्वास की गहराई को समझ नहीं पाता।
एक दिन विभा ने रिद्धि को अपने दोस्तों के समूह में उसकी बातों का मज़ाक उड़ाते हुए सुन लिया।
रिद्धि कह रही थी, “विभा न जाने कैसी-कैसी बातें करती रहती है। उसके अजीब-अजीब सवाल होते हैं। पता नहीं क्या सोचती रहती है!”
उसकी बातें सुनकर वहाँ मौजूद कुछ दोस्त हँस रहे थे।
विभा वहीं ठिठक गई।
जिस लड़की को वह अपना अच्छा दोस्त समझती थी, जिसके सामने उसने अपने मन की उलझनें रखी थीं, वही उन बातों को दूसरों के सामने मज़ाक बनाकर सुना रही थी।
उस पल विभा को केवल रिद्धि की बातों से दुख नहीं हुआ, बल्कि अपने विश्वास के टूटने का भी एहसास हुआ।
उसने कभी नहीं सोचा था कि कोई उसकी सच्ची भावनाओं को इस तरह दूसरों के सामने रख सकता है। जिन बातों को बताते हुए उसने अपने मन का बोझ हल्का महसूस किया था, वही बातें अब उसके लिए शर्मिंदगी और दुख का कारण बन गई थीं।
उसके मन में एक प्रश्न उठा—
“क्या किसी पर विश्वास करना गलत है? क्या अपने मन की बात किसी से कहना इतनी बड़ी गलती है? अगर हम किसी को अपना समझें, तो क्या वह हमारी भावनाओं को समझने के बजाय हमारा मज़ाक भी बना सकता है?”
उस दिन के बाद विभा के मन में दोस्ती को लेकर एक डर बैठ गया। उसने धीरे-धीरे दूसरों से अपने मन की बातें कहना बंद कर दिया। उसे लगने लगा कि यदि उसने फिर किसी पर विश्वास किया, तो शायद उसके साथ दोबारा ऐसा ही हो सकता है।
वह अब किसी से जल्दी घुलती-मिलती नहीं थी। लोग उससे बात करते, लेकिन वह अपने मन की दुनिया को अपने तक ही सीमित रखती। उसने जैसे यह तय कर लिया था कि अब किसी को इतना करीब नहीं आने देगी कि वह उसकी भावनाओं को चोट पहुँचा सके।
समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा।
विभा ने अपनी पढ़ाई पर ध्यान दिया। दसवीं कक्षा में उसके अच्छे अंक आए। उसे अपनी मेहनत पर खुशी हुई, लेकिन अब उसकी खुशियाँ भी पहले जैसी नहीं थीं। वह अपनी उपलब्धियों को अपने तक रखती और स्वयं ही स्वयं को समझाने की कोशिश करती।
बाहर से देखने पर उसका जीवन सामान्य था। वह पढ़ती थी, आगे बढ़ रही थी और अपने भविष्य के लिए मेहनत कर रही थी।
लेकिन उसके भीतर कुछ बदल चुका था।
अब वह पहले की तरह हर किसी पर सहजता से विश्वास नहीं कर पाती थी। उसके मन में उठने वाले प्रश्न अब भी थे, सपने अब भी थे और भावनाएँ भी थीं—बस उन्हें किसी के सामने व्यक्त करने का साहस पहले जैसा नहीं रहा था।
विभा धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी। जीवन उसे बहुत कुछ सिखा रहा था, लेकिन हर सीख सुखद नहीं थी।
शायद उसे अभी यह समझना बाकी था कि एक व्यक्ति के व्यवहार से पूरी दुनिया को नहीं समझा जा सकता और एक दोस्त के विश्वासघात का अर्थ यह नहीं कि हर दोस्त ऐसा ही होगा।
लेकिन उस समय विभा इतनी परिपक्व नहीं हुई थी कि इन बातों को समझ पाती।
वह बस अपने अनुभवों को मन में समेटे आगे बढ़ती रही।
और आईने में दिखने वाली विभा के साथ-साथ उसके भीतर रहने वाली विभा भी बदलती जा रही थी।