Aaine me Badalta Jivan in Hindi Love Stories by Chandni choudhary books and stories PDF | आईने में बदलता जीवन - भाग 10

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आईने में बदलता जीवन - भाग 10



भाग 10 — पहले प्रेम का एहसास

जब विभा ने एकार्थ्य के सामने अपने मन की सारी बातें और भावनाएँ व्यक्त की थीं, तब एकार्थ्य ने उसे समझाया था कि उसके मन में उसके प्रति केवल आकर्षण नहीं, बल्कि प्रेम की भावना भी उत्पन्न हो चुकी है। उस समय विभा उसकी बात का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाई थी। वह स्वयं भी अपनी भावनाओं को पूरी तरह समझ नहीं पा रही थी।

लेकिन कुछ दिनों तक अपने मन को समझने और अपने एहसासों पर विचार करने के बाद विभा को धीरे-धीरे महसूस होने लगा कि एकार्थ्य के प्रति उसके मन में सचमुच प्रेम था। यह उसके जीवन का पहला ऐसा एहसास था, जिसे वह चाहकर भी पूरी तरह शब्दों में व्यक्त नहीं कर पा रही थी।

विभा ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि किसी व्यक्ति के प्रति मन में इतनी गहरी भावनाएँ उत्पन्न हो सकती हैं। किसी की आवाज़, उसके विचार और उसकी बातें मन को इस तरह प्रभावित कर सकती हैं कि व्यक्ति बार-बार उसी के बारे में सोचने लगे। यह अनुभव विभा के लिए नया था और उसे अच्छा भी लगता था।

अब उसका मन हर समय एकार्थ्य से बातें करने को करता। वह चाहती थी कि वह उसके साथ अधिक समय बिताए, उसके बारे में जाने और उसके व्यक्तित्व को पूरी तरह समझ सके। उसके मन में अनेक प्रश्न थे, जिनके उत्तर वह एकार्थ्य से पाना चाहती थी।

लेकिन एकार्थ्य धीरे-धीरे उसकी भावनाओं को समझने लगा था। वह जान चुका था कि विभा का उससे लगाव सामान्य परिचय तक सीमित नहीं रहा। शायद इसी कारण उसने विभा से दूरी बनानी शुरू कर दी।

एकार्थ्य पहले ही कह चुका था कि वह नहीं चाहता कि उसके जीवन से चले जाने पर कोई दुखी हो। वह किसी के मन में ऐसी भावनाएँ उत्पन्न नहीं करना चाहता था, जिनका अंत दूसरे व्यक्ति के लिए पीड़ादायक हो। अपने इसी विचार के कारण वह प्रेम के संबंध में बहुत सतर्क रहता था।

विभा यह सब जानती थी। वह समझती थी कि एकार्थ्य के अपने विचार और परिस्थितियाँ थीं, फिर भी वह अपने मन में उठती भावनाओं को रोक नहीं पा रही थी। वह स्वयं भी नहीं जानती थी कि ऐसा क्यों हो रहा था। वह चाहती थी कि इन विचारों से बाहर निकल आए, लेकिन उसका मन बार-बार उसी की ओर लौट जाता।

जब वह एकार्थ्य से अपने मन की बात सीधे नहीं कह पाती, तो अपनी भावनाओं को शब्दों का रूप देने लगती। कभी शायरी लिखती, कभी कविता और कभी कोई छोटी-सी रचना। जो कुछ वह उससे कह नहीं पाती थी, उसे अपनी रचनाओं के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयास करती।

उसकी रचनाएँ उसके मन में छिपे उन भावों की अभिव्यक्ति थीं, जिन्हें वह सामान्य बातचीत में कहने का साहस नहीं जुटा पाती थी।

जब कभी एकार्थ्य उसकी कोई रचना पढ़ता, तो उसकी भावनाओं की क़द्र करते हुए कहता—

“बहुत अच्छी कविता है आपकी।”

एकार्थ्य के मुँह से अपनी रचना की प्रशंसा सुनकर विभा बहुत खुश हो जाती। उसके लिए वे कुछ शब्द भी बहुत मायने रखते थे। उसे लगता कि कम-से-कम उसकी लिखी हुई पंक्तियों के माध्यम से उसकी भावनाएँ एकार्थ्य तक पहुँच तो रही हैं।

विभा हर पल उससे बातचीत होने की प्रतीक्षा करती रहती। उसके मन में कहीं न कहीं यह इच्छा भी थी कि जिस तरह वह एकार्थ्य के बारे में सोचती है, उसी तरह एकार्थ्य भी उसके बारे में सोचे। वह चाहती थी कि उसके मन में भी उसके लिए कुछ ऐसी भावनाएँ उत्पन्न हों, जिन्हें वह अपने मन में सँजोकर रख सके।

विभा के जीवन में पहले से ही मित्रता का अभाव था। वह अपने ही संसार में रहती थी और अपने मन की बहुत-सी बातें किसी से साझा नहीं कर पाती थी। ऐसे में एकार्थ्य का उसके जीवन में आना उसके लिए एक नया अनुभव बन गया था।

उसके जीवन में कई बदलाव आने लगे थे। वह पहले से अधिक सोचने लगी थी। उसके मन में भावनाओं को समझने और उन्हें शब्दों में ढालने की इच्छा जाग उठी थी। एकार्थ्य के बारे में सोचते-सोचते कभी वह स्वयं से प्रश्न करती—

आख़िर तुम कौन हो? कैसे हो? तुम्हारे विचार कैसे हैं? तुम क्या करते हो? तुम्हारी दुनिया कैसी है?

वह उसके बारे में जितना सोचती, उतना ही उसे जानने की इच्छा बढ़ती जाती।

लेकिन एकार्थ्य की ओर से बातचीत कम होती जा रही थी। कई दिनों तक उसने विभा से कोई बात नहीं की। विभा प्रतीक्षा करती रही। उसके मन में अनेक प्रश्न उठते, लेकिन वह किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाती थी।

आख़िरकार, एक दिन एकार्थ्य ने उससे बात की।

उसने पूछा—

“कैसी हो तुम? ठीक हो?”

विभा ने उत्तर दिया—

“हाँ, मैं ठीक हूँ। और आप कैसे हैं?”

एकार्थ्य ने कहा—

“मैं भी ठीक हूँ।”

कुछ देर बाद एकार्थ्य ने अपने मन की एक ऐसी बात विभा के सामने रखी, जिसके बारे में उसने पहले कभी विस्तार से नहीं बताया था।

उसने कहा—

“विभा, मैं तुम्हारी भावनाओं की क़द्र करता हूँ और तुम्हारा सम्मान भी करता हूँ। लेकिन मैं तुम्हें अपने अतीत के बारे में कुछ बताना चाहता हूँ।

मेरे जीवन में भी कभी किसी के प्रति प्रेम की भावना उत्पन्न हुई थी। मैंने भी किसी को अपने मन से चाहा था, लेकिन वह मेरी भावनाओं को समझ नहीं पाई। फिर उसकी शादी किसी और से हो गई।

उस अनुभव के बाद मैंने यह निर्णय लिया कि अब मैं अपने जीवन में किसी के प्रति ऐसी भावनाओं को उत्पन्न नहीं होने दूँगा। मैं नहीं चाहता कि फिर कभी उसी तरह की परिस्थिति का सामना करूँ। तभी से मैं अपनी भावनाओं के प्रति बहुत सतर्क रहता हूँ।

मुझे माफ़ करना, विभा। मैं तुम्हारी भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाना चाहता, लेकिन मैं तुम्हें अपने मन की स्थिति से अनजान भी नहीं रखना चाहता।”

एकार्थ्य की बातें सुनकर विभा कुछ देर मौन रही। वह उसके अतीत के बारे में जानकर उसकी परिस्थिति को समझने का प्रयास कर रही थी।

उसने धीरे से कहा—

“ठीक है, जैसी आपकी मर्ज़ी। मैं आपकी भावनाओं और आपके निर्णय का सम्मान करती हूँ। मैं यह भी नहीं चाहती कि मेरी भावनाओं के कारण आपको किसी तरह की परेशानी हो।

लेकिन एकार्थ्य, मैं स्वयं भी नहीं जानती कि मेरे मन में आपके प्रति ये भावनाएँ क्यों उत्पन्न हो गईं। मैंने तो कभी नहीं चाहा था कि मैं किसी के प्रति इस तरह का लगाव महसूस करूँ। मैं चाहती हूँ कि अपने मन को समझ सकूँ और इन भावनाओं से बाहर निकल पाऊँ, लेकिन न जाने क्यों ऐसा कर नहीं पाती।

मैं नहीं जानती कि इस अनुभूति को क्या नाम दूँ। बस इतना जानती हूँ कि मैं इसे जान-बूझकर अपने मन में नहीं लाई थी। यह अपने आप मेरे भीतर जन्म लेती चली गई।

मैं आपकी परिस्थिति समझती हूँ, लेकिन अपने मन की इस स्थिति को कैसे समझाऊँ, यह मुझे भी नहीं पता।”

विभा की बातें उसके मन की उलझन को व्यक्त कर रही थीं। वह एकार्थ्य के निर्णय का सम्मान करना चाहती थी, लेकिन अपने भीतर उठती भावनाओं का उत्तर उसके पास भी नहीं था।

उसके लिए यह केवल किसी व्यक्ति को पसंद करने का अनुभव नहीं था। यह अपने ही मन को पहली बार इतनी गहराई से जानने का अवसर भी था।

विभा अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ी थी, जहाँ एक ओर उसके मन में पहली बार प्रेम का एहसास जन्म ले चुका था और दूसरी ओर उसे यह समझना था कि अपनी भावनाओं का सम्मान करते हुए किसी दूसरे व्यक्ति के निर्णय को कैसे स्वीकार किया जाए।

वह एकार्थ्य को जानने की कोशिश में निकली थी, लेकिन अब जीवन उसे अपने ही मन को समझने का अवसर दे रहा था।