भाग 5 — जीवन की तलाश
दसवीं कक्षा के बाद भी विभा के जीवन में बहुत कुछ बदल रहा था। उम्र के साथ उसका मन भी गहराई की ओर बढ़ रहा था। अब वह केवल अपने आसपास होने वाली घटनाओं को देखकर संतुष्ट नहीं होती थी, बल्कि उनके पीछे छिपे कारणों को भी समझना चाहती थी।
उसके मन में अक्सर कुछ प्रश्न उठते रहते—
जीवन क्या है?
हम क्यों जी रहे हैं?
हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है?
आख़िर जीवन का वास्तविक अर्थ क्या है?
ये प्रश्न उसके मन में बार-बार आते। वह कभी इनके उत्तर स्वयं खोजने की कोशिश करती, तो कभी सोचती कि शायद कोई ऐसा व्यक्ति हो, जो उसे इन प्रश्नों का सही उत्तर दे सके।
एक दिन उसने अपने हिंदी के अध्यापक से जीवन के बारे में पूछने का निश्चय किया।
उसके हिंदी के अध्यापक बहुत अच्छे थे। वे विद्यार्थियों की बात ध्यान से सुनते और उनके प्रश्नों का उत्तर सहानुभूति से देने की कोशिश करते थे। विभा को विश्वास था कि शायद वे उसके मन की उलझन को समझ पाएँगे।
उसने उनसे पूछा, “सर, जीवन क्या है? हम क्यों जी रहे हैं? हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है? हम इस संसार में क्यों आए हैं? क्या जीवन केवल जन्म लेने, पढ़ने, काम करने और फिर एक दिन इस दुनिया से चले जाने का नाम है? क्या जीवन का कोई गहरा अर्थ भी है?”
अध्यापक ने उसकी बात सुनी और कुछ देर सोचने के बाद कहा,
“विभा, जीवन वह है जिसे हम जी रहे हैं। जीवन वह भी है, जिसे हम जीना चाहते हैं। हमारे अनुभव, हमारे विचार, हमारे निर्णय और समय के साथ स्वयं में किए गए परिवर्तन भी हमारे जीवन का हिस्सा हैं। हम अपने जीवन को जिस दिशा में ले जाते हैं, वह दिशा हमारे जीवन को आकार देती है।”
विभा ने उनकी बात सुनी और कहा, “जी सर, अब मुझे समझ में आ गया।”
लेकिन सच तो यह था कि वह पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुई थी।
अध्यापक की बातें अच्छी थीं, उनमें जीवन को समझने का एक दृष्टिकोण भी था, लेकिन विभा के मन में एक कसक रह गई। वह सोचती रही कि क्या सच में जीवन केवल वही है, जिसे हम जी रहे हैं? क्या जीवन का अर्थ केवल अपने अनुभवों और निर्णयों से बनता है? या इसके पीछे कोई ऐसा सत्य भी है, जिसे वह अभी समझ नहीं पा रही?
वह उस समय अपने प्रश्नों का उत्तर नहीं खोज पाई। फिर भी उसके भीतर जीवन को जानने की इच्छा बनी रही।
इसी बीच विभा की रुचि भूगोल में बहुत बढ़ गई।
उसे यह जानना अच्छा लगता था कि पृथ्वी कैसी बनी, महाद्वीपों का निर्माण कैसे हुआ, दुनिया इतने सारे देशों में कैसे बँटी और अलग-अलग स्थानों की भौगोलिक परिस्थितियाँ एक-दूसरे से इतनी भिन्न क्यों हैं। वह चट्टानों, मिट्टी, पर्वतों और पृथ्वी की बनावट के बारे में पढ़ती, तो उसके मन में नए-नए प्रश्न जन्म लेने लगते।
किसी विषय को पढ़ते समय वह केवल यह जानकर संतुष्ट नहीं होती थी कि कोई चीज़ क्या है। वह यह भी जानना चाहती थी कि वह ऐसी क्यों है और उसके पीछे क्या कारण हैं।
यही उसकी विशेषता थी।
विभा के लिए पढ़ाई केवल परीक्षा में अच्छे अंक लाने का साधन नहीं रह गई थी। उसके लिए पढ़ना संसार को समझने का एक रास्ता बनने लगा था। वह अपनी पाठ्यपुस्तकों में उत्तर खोजती और उन उत्तरों से नए प्रश्न पैदा हो जाते।
फिर भी उसके जीवन में एक खालीपन बना रहता।
वह अपने मन की बहुत-सी बातें किसी से कह नहीं पाती थी। कभी-कभी अकेले बैठकर रोने लगती। उसे स्वयं भी समझ नहीं आता था कि वह क्यों रो रही है। कोई एक कारण सामने नहीं होता, लेकिन मन में जैसे बहुत-सी अनकही बातें इकट्ठी हो गई हों।
कभी उसे लगता कि वह स्वयं को भी पूरी तरह नहीं समझती। कभी अपने विचारों में उलझ जाती, तो कभी जीवन के बारे में सोचते-सोचते थक जाती।
वह यह नहीं जानती थी कि उसके प्रश्नों के उत्तर कहाँ मिलेंगे। लेकिन उसके भीतर उन्हें खोजने की इच्छा अब भी जीवित थी।
समय बीतता गया और विभा बारहवीं कक्षा में पहुँच गई।
इस बीच उसके भीतर एक नई रुचि जन्म लेने लगी थी—लिखने की रुचि।
वह अपने आसपास की छोटी-छोटी घटनाओं को ध्यान से देखने लगी थी। समय का बदलना, लोगों का बदलना, प्रकृति का अपना रूप बदलना और जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव—ये सब बातें उसके मन को छूने लगी थीं।
वह कभी अपनी कॉपी में कुछ पंक्तियाँ लिखती, तो कभी अपने मन में उठे किसी प्रश्न को शब्दों में ढालने की कोशिश करती।
कभी वह समय के बारे में लिखती—
वक्त क्यों बदलता है?
समय के साथ लोग क्यों बदल जाते हैं?
जब समय बदलता है, तो क्या हमें भी बदलना पड़ता है?
और यदि हम बदलते हैं, तो क्या हम पहले जैसे रह जाते हैं?
ऐसे ही प्रश्नों से उसकी छोटी-छोटी कविताएँ जन्म लेने लगीं।
कभी वह वसंत ऋतु की सुंदरता पर लिखती, कभी प्रकृति के बदलते रूप पर और कभी अपने मन की उन भावनाओं पर, जिन्हें वह किसी से कह नहीं पाती थी।
धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि लिखते समय वह अपने विचारों को पहले से अधिक स्पष्ट रूप में देख पाती है। जिन बातों को वह केवल महसूस करती थी, उन्हें शब्दों में लिखने पर उनके अर्थ को समझने का अवसर मिलता था।
शायद यही उसके जीवन का एक सुंदर मोड़ था।
जिस विभा के मन में इतने प्रश्न थे, जिसे अपने विचार किसी के सामने रखने में संकोच होता था, वह अब अपनी कॉपी के पन्नों पर अपने मन की बात लिखने लगी थी।
लिखना उसके लिए केवल कविता बनाना नहीं था। वह अपने भीतर झाँकने का एक माध्यम बन रहा था। वह अपने विचारों को शब्द देती, फिर उन्हीं शब्दों को पढ़कर स्वयं को समझने की कोशिश करती।
उसे अभी यह नहीं पता था कि भविष्य में उसका लेखन उसे कहाँ ले जाएगा। वह यह भी नहीं जानती थी कि उसके प्रश्नों के उत्तर कभी पूरी तरह मिल पाएँगे या नहीं।
लेकिन उसने लिखना शुरू कर दिया था।
और इस बार उसने अपने मन की आवाज़ को अनसुना नहीं किया।
विभा का जीवन आगे बढ़ रहा था। उसके प्रश्न अभी समाप्त नहीं हुए थे, उसकी उलझनें भी पूरी तरह सुलझी नहीं थीं। फिर भी उसके भीतर कुछ नया जन्म ले चुका था—अपने विचारों को समझने और उन्हें व्यक्त करने का साहस।
शायद जीवन को समझने की उसकी यात्रा का यह एक नया आरंभ था।
क्योंकि कभी-कभी हमें अपने सभी प्रश्नों के उत्तर एक साथ नहीं मिलते। कभी-कभी हम उत्तर खोजते-खोजते स्वयं को समझना शुरू कर देते हैं।
और शायद विभा के साथ भी यही हो रहा था।
वह जीवन को समझने निकली थी, लेकिन धीरे-धीरे अपने ही भीतर की दुनिया को पहचानने लगी थी।