Aaine me Badalta Jivan in Hindi Love Stories by Chandni choudhary books and stories PDF | आईने में बदलता जीवन - भाग 11

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आईने में बदलता जीवन - भाग 11



भाग 11 — क्या यही प्रेम है?

एकार्थ्य की बातें सुनकर विभा ने उसके सामने तो कह दिया था कि वह उसकी परिस्थितियों को समझती है और उसके निर्णय का सम्मान करती है, लेकिन उसके भीतर कुछ टूट-सा गया था।

जिस व्यक्ति को उसने अपने मन में इतनी जगह दी थी, जिसके बारे में सोचकर उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी, जिसकी आवाज़ और बातें उसे अच्छी लगती थीं, उसी के जीवन में कभी कोई और भी था।

यह जानकर विभा को बहुत दुख हुआ।

उसके मन में बार-बार एक ही प्रश्न उठ रहा था—क्या यही प्रेम है?

जिसे हम चाहें, वह किसी और को चाहे। जिसे हम अपने मन में सबसे विशेष स्थान दें, उसके मन में पहले से किसी और की यादें बसी हों। क्या प्रेम में ऐसा ही होता है? क्या जिसे हम पूरे मन से चाहें, उसका मन किसी दूसरे के लिए धड़क सकता है?

विभा ने कभी नहीं सोचा था कि जिस व्यक्ति के प्रति उसके मन में पहली बार इतनी गहरी भावनाएँ जागेंगी, उसके बारे में उसे यह जानना पड़ेगा कि वह भी कभी किसी को चाह चुका है।

उसने एकार्थ्य से अपने मन की बात कही थी, लेकिन अपने दुख को उसके सामने व्यक्त नहीं कर पाई। वह नहीं चाहती थी कि एकार्थ्य को लगे कि वह उसके अतीत से नाराज़ है या उसके निर्णय को समझना नहीं चाहती। फिर भी, उसके मन में उठती पीड़ा को दबाना उसके लिए कठिन हो रहा था।

कुछ समय बाद, अपने मन को रोक न पाते हुए उसने एकार्थ्य से कहा—

“एकार्थ्य, आप मुझसे ये बातें मत कहा कीजिए कि आपको भी पहले किसी से प्रेम हुआ था। मैं समझ रही थी कि मेरा प्रेम मेरा पहला प्रेम है और शायद आपका भी। लेकिन अब जब आप बताते हैं कि आप भी किसी को चाह चुके हैं, तो न जाने क्यों मुझे बहुत दुख होता है।”

विभा ने यह बात कह तो दी, लेकिन उसके शब्दों में छिपी पीड़ा को पूरी तरह व्यक्त करना उसके लिए संभव नहीं था।

एकार्थ्य ने उसकी बात सुनी और कहा—

“विभा, मेरी भी भावनाएँ हैं। मैं भी एक इंसान हूँ। मुझे भी कभी किसी से प्रेम हुआ था। जिस तरह आज तुम अपने मन में मेरे लिए भावनाएँ रखती हो, उसी तरह कभी मेरे मन में भी किसी के लिए भावनाएँ थीं। लेकिन हर भावना अपनी इच्छा के अनुसार पूरी नहीं हो जाती।

मैं तुम्हारी भावनाओं को समझता हूँ, लेकिन मैं चाहकर भी तुमसे प्रेम नहीं कर पाऊँगा।”

एकार्थ्य के ये शब्द सुनकर विभा को बहुत दुख हुआ। उसने कभी नहीं सोचा था कि जिस व्यक्ति को वह अपने जीवन में इतना महत्त्व देने लगी है, एक दिन वही उससे कहेगा कि वह उससे प्रेम नहीं कर पाएगा।

उसके मन में जैसे अनगिनत प्रश्न एक साथ उठने लगे।

क्या यही जीवन है?

क्या इसी एक जीवन में हम उसे भी नहीं पा सकते, जिसे हमने इतनी शिद्दत से चाहा?

विभा सोचने लगी कि उसने एकार्थ्य को जिस तरह चाहा था, शायद वह स्वयं भी अपनी भावनाओं की गहराई को पूरी तरह नहीं समझ पाई थी। उसके लिए एकार्थ्य केवल एक व्यक्ति नहीं रह गया था। उसकी आवाज़, उसकी बातें, उसका सोचने का ढंग और जीवन को देखने का नज़रिया—सब कुछ विभा के मन पर अपनी छाप छोड़ चुके थे।

वह जहाँ भी देखती, उसे एकार्थ्य का ख़याल आ जाता। उसकी कही हुई बातें याद आतीं और उन बातों में उसे जीवन की अच्छाइयों की ओर बढ़ने का मार्ग दिखाई देता। उसे लगता था कि एकार्थ्य के विचार उसे कुछ नया समझने, स्वयं को पहचानने और जीवन को एक अलग दृष्टि से देखने में सहायता करते हैं।

उसने कभी यह नहीं सोचा था कि किसी को चाहना उसके लिए इतना गहरा अनुभव बन जाएगा। वह तो बस उसकी आवाज़ सुनना चाहती थी, उससे बातें करना चाहती थी, उसके विचारों को समझना चाहती थी। धीरे-धीरे यही चाहत उसके मन में ऐसी जगह बना गई, जहाँ से लौटना अब आसान नहीं लग रहा था।

लेकिन एकार्थ्य की अपनी कहानी थी, अपनी स्मृतियाँ थीं और अपना निर्णय था। विभा उन बातों को बदल नहीं सकती थी। वह उसके अतीत को मिटा नहीं सकती थी और न ही उससे ऐसी भावना की अपेक्षा कर सकती थी, जिसे वह स्वयं अपने भीतर जन्म लेने देने के लिए तैयार नहीं था।

फिर भी, विभा के मन में एक प्रश्न बार-बार उठता रहा—

मैंने तो तुम्हें अपने जीवन का पहला प्रेम समझा था। क्या तुम्हारे लिए भी मैं कभी वैसी बन पाऊँगी, जैसी तुम मेरे लिए बन गए हो?

इस प्रश्न का उत्तर उसके पास नहीं था।

वह एकार्थ्य से अपने दुख की गहराई छिपाए रही। बाहर से उसने उसकी बात समझने की कोशिश की, लेकिन भीतर उसका मन अपने ही एहसासों से जूझ रहा था।

पहली बार उसे समझ में आ रहा था कि किसी को चाहना और किसी का अपना बन जाना दो अलग-अलग बातें हैं। प्रेम मन में जन्म ले सकता है, लेकिन उसे पाने का अधिकार किसी के पास नहीं होता।

और शायद यही बात विभा को सबसे अधिक दुख दे रही थी—उसने एकार्थ्य को अपने मन से चाहा था, लेकिन वह उसके मन में अपने लिए वही स्थान नहीं बना सकती थी।

विभा के लिए यह केवल अधूरे प्रेम का दुख नहीं था। यह उस भावना को समझने की शुरुआत भी थी, जिसे उसने पहली बार अपने भीतर इतनी गहराई से महसूस किया था।