Aaine me Badalta Jivan in Hindi Love Stories by Chandni choudhary books and stories PDF | आईने में बदलता जीवन - भाग 9

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आईने में बदलता जीवन - भाग 9


भाग 9 — आवाज़ के उस पार

जब विभा ने पहली बार उस व्यक्ति की आवाज़ सुनी थी, तभी से उसके मन में एक अनजाना-सा एहसास जन्म लेने लगा था। उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था, जो विभा के मन को छू गया था। वह स्वयं भी नहीं समझ पा रही थी कि उस अनजान व्यक्ति की आवाज़ ने उसके मन में इतनी उत्सुकता क्यों जगा दी थी।

धीरे-धीरे उसके मन में उसे जानने की प्रबल इच्छा उत्पन्न होने लगी। वह बार-बार सोचती, आख़िर वह कौन है? उसका परिचय क्या है? वह उसके बारे में कैसे जान सकती है? कहीं उसे जानने का प्रयास किसी दूसरे के लिए परेशानी का कारण तो नहीं बन जाएगा?

इन तमाम प्रश्नों के बावजूद विभा ने अपने प्रयास जारी रखे। वह किसी तरह उस अनजान व्यक्ति का परिचय जानना चाहती थी। आख़िरकार, बहुत मशक्कत के बाद उसे अपने प्रयास में सफलता मिली और उस व्यक्ति का नाम पता चल गया।

उसका नाम एकार्थ्य था।

नाम जानने के बाद विभा की जिज्ञासा और बढ़ गई। अब वह केवल उसकी आवाज़ ही नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व, विचारों और स्वभाव को भी समझना चाहती थी। वह जानना चाहती थी कि उस व्यक्ति में ऐसा क्या था, जो बिना देखे ही उसके मन में एक अलग-सी जगह बना चुका था।

एकार्थ्य का व्यक्तित्व प्रभावशाली था। पढ़ाई-लिखाई हो या अन्य गतिविधियाँ, वह हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा और योग्यता का परिचय देता था। उसकी बातचीत करने की शैली सबसे अलग थी। उसकी बातों में एक सहज आकर्षण था, जो सुनने वाले को अपनी ओर खींच लेता था। वह इस तरह बातें करता कि लोग सहज ही उससे प्रभावित हो जाते और उसके व्यक्तित्व के प्रति आकर्षण अनुभव करने लगते।

कुछ ऐसा ही विभा के साथ भी हुआ।

उसने अभी तक एकार्थ्य का चेहरा नहीं देखा था, फिर भी उसकी आवाज़ विभा के हृदय में अपनी एक अलग जगह बना चुकी थी। वह आवाज़ उसके मन में इस तरह उतर गई थी कि विभा चाहकर भी उसके प्रभाव से स्वयं को अलग नहीं कर पा रही थी।

एक दिन विभा ने उससे पूछ ही लिया—

“तुम कौन हो? तुम्हारा परिचय क्या है? तुम कहाँ हो? अपने बारे में कुछ बताओ, ताकि मैं तुम्हें थोड़ा और समझ सकूँ।”

एकार्थ्य ने सहजता और सरलता से उत्तर दिया—

“मैं एकार्थ्य हूँ। अच्छा हूँ या बुरा, यह आपके विचार हैं। लोग मुझे जिस दृष्टिकोण से देखते हैं, उनके लिए मैं वैसा ही होता हूँ। मैं स्वयं यह दावा नहीं करता कि मैं ऐसा हूँ या वैसा। हर व्यक्ति के जीवन में अलग-अलग परिस्थितियाँ होती हैं और हर किसी का देखने का अपना एक नज़रिया होता है।”

एकार्थ्य की बातें विभा को बहुत अच्छी लगीं। उसके शब्दों में जीवन को देखने का एक अलग दृष्टिकोण था। विभा को लगा कि किसी व्यक्ति के प्रति हमारी धारणा केवल उसके व्यक्तित्व से ही नहीं, बल्कि हमारे अपने विचारों और दृष्टिकोण से भी बनती है।

उस समय विभा का मन कर रहा था कि वह एकार्थ्य से बातें करती रहे—एक के बाद एक, बिना किसी विराम के। उसके मन में अनेक प्रश्न थे और हर उत्तर के साथ उसे कुछ नया जानने की उत्सुकता होती थी।

अभी तक विभा ने एकार्थ्य का चेहरा नहीं देखा था। उनके बीच परिचय का आधार केवल उसकी आवाज़ और बातें थीं, फिर भी विभा का मन उसी में उलझा रहता। दिन-रात वह उसके बारे में सोचती रहती। कभी उसकी कही बातें याद करती, तो कभी उसके व्यक्तित्व को समझने का प्रयास करती।

धीरे-धीरे समय बीतता गया, लेकिन विभा के विचारों में एकार्थ्य की उपस्थिति बनी रही। उसकी स्थिति ऐसी हो गई थी कि न वह ठीक से पढ़ाई कर पाती और न ही उसका मन खाने-पीने में लगता। उसके विचार बार-बार एकार्थ्य की ओर लौट जाते। वह स्वयं भी नहीं समझ पा रही थी कि उसके मन में उठने वाली यह अनुभूति आखिर क्या थी।

आख़िरकार, एक दिन विभा ने हिम्मत जुटाई और अपने मन की बात एकार्थ्य के सामने रख दी।

उसने झिझकते हुए कहा—

“एकार्थ्य, तुम हमें बहुत अच्छे लगते हो। तुम्हारी आवाज़ हमें बेहद पसंद है। वह इतनी अच्छी लगती है कि हम चाहकर भी उसे अपने ख़यालों से दूर नहीं कर पाते। तुम्हारी बातें भी हमें बहुत अच्छी लगती हैं। पता नहीं, तुम्हारे व्यक्तित्व में ऐसा क्या है, जो हमें तुम्हारी ओर आकर्षित करता है। हम तुम्हें ठीक से जानते भी नहीं, फिर भी तुम्हारी आवाज़ और तुम्हारी बातें हमारे मन में एक अलग जगह बना चुकी हैं।”

विभा ने अपने मन की बात तो कह दी, लेकिन उसके भीतर अभी भी संकोच था। वह नहीं जानती थी कि एकार्थ्य उसकी भावनाओं को किस रूप में समझेगा।

एकार्थ्य ने उसकी बात सुनी और सहजता से उत्तर दिया—

“मैं जो भी हूँ, एकार्थ्य हूँ। लेकिन आपने मुझमें ऐसी कौन-सी ख़ूबी देख ली, जिससे आपके मन में मेरे प्रति इतनी भावनाएँ उत्पन्न हो गईं?

मैं नहीं चाहता कि कोई मुझसे इतना लगाव रखे कि मेरे चले जाने पर उसे बहुत दुख पहुँचे। मैं नहीं चाहता कि मेरे जाने से कोई इतना दुखी हो कि उसके लिए उस पीड़ा से बाहर निकलना कठिन हो जाए।

मैं आपकी भावनाओं की क़द्र करता हूँ। आपका सम्मान करता हूँ कि आपने इतनी हिम्मत जुटाकर अपने मन की बात मुझसे कही। हर व्यक्ति के लिए अपनी भावनाओं को व्यक्त करना आसान नहीं होता। लेकिन मुझे ऐसा लग रहा है कि आपको मुझसे बहुत अधिक लगाव हो गया है। शायद आप इसे प्रेम भी समझने लगी हैं।”

एकार्थ्य की बात सुनकर विभा झिझका गई।

वह तुरंत बोल उठी—

“नहीं, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है!”

लेकिन उसके चेहरे पर उभरती मुस्कान उसके शब्दों से कुछ अलग ही भाव व्यक्त कर रही थी।

एकार्थ्य की बात सुनकर विभा के मन में एक नया प्रश्न जन्म लेने लगा।

क्या सचमुच यह प्रेम था?

क्या किसी व्यक्ति को बिना देखे, केवल उसकी आवाज़ सुनकर और उसकी बातें समझकर उससे इतना लगाव हो सकता है? क्या किसी के विचारों से प्रभावित होकर मन में ऐसी अनुभूति जन्म ले सकती है, जिसे हम स्वयं भी ठीक से समझ न पाएँ?

विभा अपने ही मन के प्रश्नों में उलझ गई थी। जिस अनुभूति को वह अब तक केवल आकर्षण या एक अनजानी जिज्ञासा समझती आई थी, क्या वह वास्तव में प्रेम था?

वह एकार्थ्य को जानने निकली थी, लेकिन अब उसके सामने एक नया प्रश्न खड़ा था—क्या वह एकार्थ्य को समझने की कोशिश कर रही थी, या इस प्रक्रिया में अपने ही मन को समझने लगी थी?

उसके पास अभी इन प्रश्नों के उत्तर नहीं थे। बस एक अनकहा एहसास था, जो धीरे-धीरे उसके मन में अपनी जगह बना रहा था।