भाग 12 — एक ख़ामोश फ़ासला
एक दिन बातचीत के दौरान एकार्थ्य ने विभा से कहा—
“विभा, जिस व्यक्ति से मैंने कभी प्रेम किया था, अब मैं उसे भूल चुका हूँ। वह बहुत पुरानी बात है। उस समय मैं नादान था। उस बात को बीते कई साल हो चुके हैं। अब मुझे याद भी नहीं रहता कि कभी मैंने किसी से प्रेम किया था। लेकिन अब मैं किसी से प्रेम नहीं कर पाऊँगा।”
एकार्थ्य की यह बात सुनकर विभा को थोड़ी सांत्वना मिली। उसके मन को यह जानकर कुछ सुकून मिला कि एकार्थ्य अपने अतीत से आगे बढ़ चुका है। उसके मन में जो प्रश्न बार-बार उठता था, उसे कुछ पल के लिए शांति मिली।
लेकिन इसी के साथ विभा के मन में एक और विचार जन्म लेने लगा।
क्या मनुष्य अपने पहले प्रेम को सचमुच कभी भूल पाता है?
विभा को लगने लगा कि जीवन में कुछ स्मृतियाँ ऐसी होती हैं, जो समय के साथ धुँधली तो पड़ सकती हैं, लेकिन पूरी तरह मिटती नहीं। परिस्थितियाँ बदल जाती हैं, जीवन आगे बढ़ जाता है और मनुष्य अपनी राह पर चलने लगता है, फिर भी अतीत के कुछ पल मन के किसी कोने में बसे रहते हैं।
शायद जीवन के अंतिम समय में भी मनुष्य को अपने जीवन के कुछ अनमोल पल याद आते होंगे—वे पल, जिनमें उसने सच्चे मन से किसी को चाहा हो, किसी के लिए कुछ अच्छा किया हो या किसी भावना को पहली बार अपने भीतर महसूस किया हो।
विभा के लिए यह समय बहुत अजीब था। एक ओर वह एकार्थ्य से बातें करके खुश होती थी, वहीं दूसरी ओर उसके मन में कई अनकहे प्रश्न रहते थे। पहली बार एकार्थ्य ने उसके सामने अपने अतीत और अपनी भावनाओं को इतने स्पष्ट रूप से व्यक्त किया था। विभा के लिए यह अनुभव नया था। वह उससे बातें करती, उसकी बातों में खो जाती और कभी-कभी अपने ही ख़यालों में उसके साथ एक अलग दुनिया बसा लेती।
एक दिन विभा ने एकार्थ्य से पूछा—
“कहाँ हो तुम? कौन हो तुम?”
एकार्थ्य ने उत्तर दिया—
“मैं यहीं हूँ।”
उसके इस छोटे-से उत्तर में भी विभा को एक अपनापन महसूस हुआ। वह उससे और बातें करना चाहती थी, उसे और जानना चाहती थी। अब उसके मन में एक नई इच्छा जन्म लेने लगी थी—वह एकार्थ्य की आवाज़ के साथ-साथ उसकी सूरत भी देखना चाहती थी।
जिस आवाज़ ने उसके दिल में अपनी जगह बना ली थी, वह उस आवाज़ के पीछे छिपे चेहरे को देखना चाहती थी। उसके मन में जिज्ञासा थी कि आख़िर वह व्यक्ति दिखता कैसा होगा, जिसकी बातें और विचार उसे इतने अच्छे लगते थे।
एक दिन उसने एकार्थ्य से कहा—
“मुझे तुम्हारी प्यारी-सी सूरत देखनी है। तुम्हारी आवाज़ ने तो पहले ही मेरे दिल में जगह बना ली है। अब मैं तुम्हें देखना भी चाहती हूँ।”
एकार्थ्य ने जवाब दिया—
“नहीं, पहले तुम अपनी सूरत दिखाओ, फिर मैं दिखाऊँगा।”
विभा अपनी बात पर अड़ी रही और एकार्थ्य अपनी बात पर। दोनों के बीच इस बात को लेकर बहस बढ़ने लगी। विभा चाहती थी कि एकार्थ्य पहले अपनी सूरत दिखाए, जबकि एकार्थ्य चाहता था कि विभा पहले ऐसा करे।
बातचीत के दौरान एक समय ऐसा आया, जब एकार्थ्य ने कहा—
“तुम मुझे क्रोध क्यों दिला रही हो?”
यह सुनकर विभा को आश्चर्य हुआ। उसने तो केवल अपनी इच्छा व्यक्त की थी। उसके मन में एकार्थ्य को क्रोधित करने का कोई विचार नहीं था।
उसने कहा—
“मैंने ऐसा क्या कहा? मैंने तो कभी कोई ऐसी बात नहीं कही, जिससे आपको क्रोध आए।”
लेकिन बात यहीं समाप्त नहीं हुई। एकार्थ्य ने आगे कहा—
“जो कुछ भी बोलो, सौ बार सोचकर बोलो।”
एकार्थ्य के ये शब्द विभा के मन को बहुत गहराई तक चोट पहुँचा गए।
जिस व्यक्ति की बातों में उसे जीवन की अच्छाइयों का मार्ग दिखाई देता था, जिसकी आवाज़ सुनने के लिए वह प्रतीक्षा करती थी, उसी के मुँह से ऐसे शब्द सुनना उसके लिए बहुत कठिन था।
उसे लगा, जैसे किसी ने उसके कोमल विश्वास को एक झटके में तोड़ दिया हो। उसके मन में जो अपनापन था, जो सहजता थी, वह अचानक कहीं खो गई। जिस बातचीत में वह अपने मन की खुशी खोजती थी, उसी बातचीत ने उसे भीतर तक दुखी कर दिया।
विभा ने कभी नहीं चाहा था कि उसकी किसी बात से एकार्थ्य को ठेस पहुँचे। वह तो केवल उसे देखना चाहती थी, उस व्यक्ति की छवि को अपने मन में उतारना चाहती थी, जिसकी आवाज़ से वह जुड़ चुकी थी। लेकिन उसकी एक छोटी-सी इच्छा इतनी बड़ी नाराज़गी का कारण बन जाएगी, यह उसने सोचा भी नहीं था।
उस दिन के बाद एकार्थ्य और विभा के बीच कोई बातचीत नहीं हुई।
न विभा ने उससे कुछ कहा, न एकार्थ्य ने उससे बात करने की कोशिश की। दोनों के बीच एक ख़ामोशी आ गई, जिसका कारण शायद एक छोटी-सी बहस थी, लेकिन जिसका असर उनके मन पर बहुत गहरा पड़ा था।
विभा के मन में अब भी कई प्रश्न थे।
क्या एकार्थ्य सचमुच उससे नाराज़ था? क्या उसकी किसी बात ने उसे इतना दुखी कर दिया था? क्या यह दूरी कुछ दिनों की थी या अब उनके बीच पहले जैसा संवाद कभी नहीं हो पाएगा?
वह नहीं जानती थी।
जिस व्यक्ति से बात करना कभी उसके दिन का सबसे अच्छा पल बन जाता था, अब उसी से बात हुए कितने दिन बीत जाएँगे, इसका उसे कोई अंदाज़ा नहीं था।
विभा प्रतीक्षा में थी, लेकिन उसे यह भी नहीं पता था कि किस बात की प्रतीक्षा करे—एकार्थ्य के लौटकर बात करने की, उसकी नाराज़गी दूर होने की या उस पुराने सहज संबंध के फिर से लौट आने की।
यह दूरी कब तक बनी रहेगी, दोनों कब फिर से बात करेंगे, क्या उनके बीच की नाराज़गी कभी समाप्त होगी—इन प्रश्नों का उत्तर न विभा के पास था, न उसे एकार्थ्य की ओर से कोई संकेत मिल रहा था।
कभी-कभी जीवन में एक छोटी-सी बात भी मनुष्य के भीतर बहुत बड़ा बदलाव ले आती है। कुछ शब्द ऐसे होते हैं, जिन्हें कहने वाला शायद कुछ ही पलों में भूल जाए, लेकिन सुनने वाले के मन में वे लंबे समय तक गूँजते रहते हैं।
विभा के लिए भी वे शब्द केवल शब्द नहीं रह गए थे। वे उसके विश्वास, उसके लगाव और उसके मन में जन्मे पहले प्रेम के साथ जुड़ गए थे।
अब उनके बीच केवल ख़ामोशी थी—और इस ख़ामोशी के आगे क्या होगा, यह किसी को नहीं मालूम था।